कहते हैं किताबें हमारे जीवन की सबसे अच्छी साथी होती हैं। जब भी हमें उनकी आवश्यकता होती है, वे हमारे लिए उपलब्ध होती हैं। किताबें हमारे आसपास की दुनिया को समझने, सही और गलत के बीच निर्णय लेने में हमारी मदद करती हैं। वे हमारे आदर्श, मार्गदर्शक या सर्वकालिक शिक्षक के रूप में भी हमारे जीवन में शामिल होती हैं। कुछ भी सीखने का सबसे विश्वसनीय स्थान किताबें ही होती हैं, लेकिन क्या हो, यदि ये किताबें ही हमें कोई गलत चीज़ सिखाने लगें तो? ये कितना बड़ा नुकसान कर सकती हैं, क्या हमने कभी इस बारे में सोचा है?
सोशल मीडिया के इस दौर में आज की पीढ़ी किताबों से पहले ही दूर हो चुकी है। इन्हें किताबों के पास रखने का एक ही तरीका है, वह है इनकी स्कूल, कॉलेज की किताबें। लेकिन, समस्या यह है कि इन किताबों में भाषा की, तथ्यों की और जानकारी की ढेर सारी गलतियाँ हैं। ऊपर से हमारे शिक्षक भी इतने जानकार या इस समस्या को लेकर इतने जागरूक नहीं हैं कि इन गलतियों को पकड़ कर इनके सुधार के लिए कोई कदम उठाएँ। नतीजन, हमारी नई पीढ़ी किताबों से कुछ अच्छा सीखने के बजाए गलत सीख ले रही है।
मेरे देखने में आया है कि हमारी पाठ्यपुस्तकों में सबसे ज्यादा गलतियाँ भाषा की होती हैं, वह भी मातृभाषा हिंदी की किताबों में ये सबसे ज्यादा हैं। एक तरफ तो हम हिंदी को मातृभाषा कहते हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारी नई पीढ़ी को इस भाषा का सही ज्ञान तक नहीं दे पा रहे हैं। विडंबना यह है कि कई हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी इस भाषा का सही ज्ञान नहीं है। नतीजन, वे किताबों की इन गलतियों को न तो पकड़ पाते हैं और न ही इसमें सुधार कर पाते हैं और हमारी नई पीढ़ी गलत ज्ञान लेकर ही आगे बढ़ रही है। यही हाल अन्य विषयों में भी है।
उदाहरण की बात करूँ, तो हमारे देश में एनसीईआरटी की किताबों को सबसे विश्वसनीय सोर्स माना जाता है। इनकी विश्वसनीयता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि देश की सबसे कठिन परीक्षा, जिसे हम यूपीएससी के नाम से भी जानते हैं, के लिए भी एनसीईआरटी की किताबों पर विश्वास जताया जाता है। इन किताबों से ही ज्ञान लेकर देश को उच्च अधिकारी मिलते हैं, लेकिन ये किताबें भी गलतियों से भरी पड़ी हैं। एनसीईआरटी की किताबों में आपको भाषा से लेकर तथ्यों और भ्रामक जानकारियों तक की हजारों गलतियाँ मिल जाएँगी। इसके बावजूद इन किताबों से देश के अधिकतम स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है। क्या यह हमारी आने वाली पीढ़ी के साथ हम गलत नहीं कर रहे हैं?
एक समय अपने ज्ञान के कारण विश्वगुरु के नाम से पहचाने जाने वाले इस देश में आज दशा यह है कि हम आने वाली पीढ़ी को सही आधारभूत ज्ञान तक नहीं दे पा रहे हैं। क्या यह हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है? जरा सोचिए इस नुकसान का जिम्मेदार आखिर कौन है?