सूरज अपनी हल्की किरणें बिखेर रहा था और मैं बालकनी में बैठकर अखबार के पन्ने पलट रहा था। एक हेडलाइन पर नज़र ठिठक गई: “भारत अब गरीबी मुक्त देश बन चुका है!”
मेरी आँखें चमक उठीं। क्या यह सच में संभव हो गया? क्या अब कोई भी सड़क किनारे भूखा नहीं सोता? क्या अब किसी भी माँ को अपने बच्चे को भर पेट भोजन कराकर खुद भूखा नहीं सोना पड़ता? क्या सच में कोई हाथ अब भीख माँगने के लिए नहीं फैलते?
मन में हज़ारों सवाल उठने लगे, लेकिन जो मैं देख रहा था, वह तो बिल्कुल अलग ही दुनिया थी। हर चेहरे पर मुस्कान.. गली-मोहल्लों में तो एक अलग ही नज़ारा था। पहले जहाँ बच्चे नंगे पाँव, फटे कपड़ों में भीख माँगते दिखते थे, वहीं अब हर बच्चा स्कूल जा रहा था। और सिर्फ स्कूल ही नहीं, बल्कि उनके बैग में हर किताब थी, यूनिफॉर्म एकदम साफ-सुथरी और चेहरे पर वह मासूम मुस्कान थी, जो हर बच्चे के चेहरे पर होनी चाहिए।
बाजारों में रौनक थी, लेकिन यह पहले जैसी नहीं थी। अब लोग जरूरतों से समझौता नहीं कर रहे थे। दुकानों में हर कोई बिना सौदेबाजी किए सामान खरीद रहा था, क्योंकि अब किसी के पास पैसों की तंगी नहीं थी। सब्जी वाले, दूकानदार, ऑटो ड्राइवर, हर किसी के माथे पर चिंता की नहीं संतुष्टि की लकीरें दिखाई दे रही थीं।
गाँवों में भी बड़ा बदलाव आ चुका था। किसान अब फसल के दाम के लिए परेशान नहीं थे। सरकार की योजनाओं ने किसानों को इतना सशक्त बना दिया था कि अब वे कर्ज़ के बोझ तले नहीं दबते थे। उनकी उपज का सही दाम उन्हें मिल रहा था और उनकी आमदनी इतनी हो चुकी थी कि वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूल भेज रहे थे, बेहतर घरों में रह रहे थे। खेतों में मशीनें चल रही थीं और हर किसान सुकून भरा जीवन जी रहा था।
शहरों में भी एक अजीब-सा बदलाव था। पहले जहाँ रेलवे स्टेशन और पुलों के नीचे फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे लोग ठंड में ठिठुरते मिलते थे, अब वहाँ कोई झुग्गी नहीं, कोई बेघर नहीं था। सरकार ने हर गरीब के लिए घर की व्यवस्था कर दी थी। जगह-जगह सरकारी आवास बने थे और हर किसी को एक सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिल चुका था।
सड़कों पर कोई ऐसा नहीं था, जो भीख माँग रहा हो। भीख माँगने को मजबूर लोग या तो कोई काम कर रहे थे, या छोटे-मोटे व्यवसाय चला रहे थे। यह देखकर मन को एक अजीब सा सुकून मिला.. अब किसी की गरीबी उसका भाग्य नहीं थी।
हॉस्पिटल में भी एक अलग ही नज़ारा था। अब कोई इलाज के अभाव में दम नहीं तोड़ रहा था। स्वास्थ्य सेवाएँ इतनी सुलभ हो गई थीं कि हर कोई बेहतरीन इलाज पा रहा था। हर किसी को मुफ्त में इलाज मिल रहा था और दवाइयाँ भी आसानी से उपलब्ध थीं।
बेरोजगारी? वह क्या होती है? अब किसी युवा को नौकरी के लिए सालों भटकना नहीं पड़ता था। हर हाथ में काम था, हर हुनर को उसकी पहचान मिल चुकी थी। अब सिर्फ डिग्री वाले ही नहीं, बल्कि हुनरमंद लोग भी अच्छी नौकरियों में थे। सरकार की योजनाओं ने हर क्षेत्र में अवसरों को बढ़ा दिया था और लोगों ने भी हाथ बढ़ाकर नए कामों को अपनाया था। अब कोई भी खाली नहीं बैठा था।
भारत अब एक आदर्श देश बन चुका था.. अब किसी को सरकारी राशन की जरुरत नहीं थी। अब कोई सिर झुकाकर दूसरों के आगे हाथ नहीं फैलाता था। अब हर व्यक्ति आत्मनिर्भर था, हर घर खुशहाल था।
गाँव हों या शहर, हर जगह तरक्की साफ नज़र आ रही थी। महिलाएँ सशक्त हो चुकी थीं और वे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही थीं। समाज में समानता थी, कारण कि अमीर और गरीब के बीच की खाई जो मिट चुकी थी।
अचानक से कोई सामान गिरने की तेज़ आवाज़ हुई और यह क्या.. मेरी आँख खुल गई.. मैंने चारों ओर देखा.. सब कुछ वैसा का वैसा ही था, जैसा कल था.. वो स्कूल जाने वाले हर एक बच्चे की जगह आज भी बहुत-से बच्चे कूड़ा बीनने को मजबूर थे। वह समृद्ध किसान आज भी मंडी में अपने अनाज का सही दाम पाने के लिए संघर्ष कर रहा था। बेहतर जीवन जीने की तलाश में वह मजदूर आज भी सड़क किनारे ईंटें ढो रहा था।
यह सिर्फ एक सपना था.. कहते हैं कि कई बार हमें बंद आँखों से वहीं सपने दिखते हैं, जो हम खुली आँखों से देखना चाहते हैं। लेकिन, सच्चाई क्या कहती है? अब यदि हम असल दुनिया में देखें, तो हालात अभी-भी बहुत बदलने बाकी हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बहुआयामी गरीबी दर 2014 से 2023 के बीच 24.82 करोड़ लोगों के लिए खत्म हुई है। 2022-23 के आँकड़ों के अनुसार, अब भारत में केवल 1% आबादी गरीबी रेखा के नीचे बची है। यह आँकड़ा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन क्या वाकई हम गरीबी मुक्त हो गए हैं?
देश के अहम् सरकारी निकाय ‘नीति आयोग’ के सदस्य अरविंद विरमानी ने कहा कि विश्व बैंक के मानदंडों के अनुसार मापी गई पूर्ण गरीबी भारत में ‘लगभग समाप्त’ हो गई है और प्रतिदिन 1.9 डॉलर से कम कमाने वाले कुछ लोगों के लिए सामान्य नीतिगत कार्यवाही नहीं की जा सकती है। विरमानी ने उद्योग मंडल आईएमसी चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि ‘कमजोर’ के रूप में चिह्नित आबादी का प्रतिशत भी काफी कम हो गया है तथा अगले सात वर्षों में समाप्त हो जाएगा। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि पूर्ण गरीबी कम तो हुई है, लेकिन आय वितरण के दृष्टिकोण से स्थिति ‘बदतर’ हुई है।
सरकार का लक्ष्य 2030 तक भारत को पूरी तरह गरीबी मुक्त बनाना है। इसके लिए कई योजनाएँ भी चलाई जा रही हैं, जैसे- प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना, आत्मनिर्भर भारत अभियान आदि, लेकिन क्या ये योजनाएँ इतनी प्रभावी हैं कि अगले कुछ सालों में हर गरीब को गरीबी से बाहर निकाल सकें?
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत सच में एक दिन गरीबी से मुक्त हो सकता है? शायद हाँ, लेकिन इसके लिए महज़ सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे। लोगों को भी आगे आना होगा। शिक्षा और कौशल विकास को प्राथमिकता देनी होगी। भ्रष्टाचार और बिचौलियों का खेल खत्म करना होगा। समाज में असमानता को दूर करना होगा। और सबसे जरूरी बात, हमें अपनी सोच बदलनी होगी।
गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं है, बल्कि अवसरों की कमी है। जब तक हर व्यक्ति को सही शिक्षा, सही रोजगार और सही अवसर नहीं मिलेगा, तब तक यह सपना सिर्फ सपना ही रहेगा।
लेकिन, सपने देखने चाहिए, क्योंकि यदि हम सपना देख सकते हैं, तो उसे पूरा भी कर सकते हैं। शायद किसी दिन यह सपना सच हो जाए.. और जब आँख खुले, तब भी यही हकीकत हो।