रामचरित मानस की यह चौपाई बताती है कि किसी के अधीन रहना कितना बड़ा अभिशाप होता है। हमारे धर्मिक ग्रन्थ हमें बहुत सी ऐसी बातें बताते हैं, जिन्हें स्वयं अनुभव करना कोई नहीं चाहेगा। उन्हीं में से एक है, पराधीनता…. हर कोई स्वतंत्रता चाहता है फिर चाहे वह इंसान हो या पशु-पक्षी।
बात जब पशु-पक्षी की चली है, तो मैं आजकल लोगों में जानवरों को पालने के चलन के बारे में बताना चाहूँगा। आजकल लोग अलग-अलग प्रजाति के कुत्ते, बिल्ली, मछली, कछुए, चिड़िया और भी कई जानवरों को पालने लगे हैं। इन जानवरों को पालना जैसे सामाजिक में प्रतिष्ठा का विषय बन गया है।
कुत्ते-बिल्ली पालने तक तो ठीक है, क्योंकि इन्हें घर में खुला छोड़ा जा सकता है। लेकिन अपने शौक के लिए बेजुबान परिंदों को पिंजरे में कैद करके रखना कहाँ तक सही है? क्या कभी पक्षियों को पालने वाले ने यह सोचा है कि पिंजरों में बंद बेज़ुबान पक्षियों को कैसा महसूस होता होगा? पंख होते हुए भी वे उड़ नहीं सकते..
उन परिंदों के दर्द को बताने के लिए मैं कुछ साल पहले कोविड महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन का उदाहरण देना चाहूँगा। उस समय लोगों ने स्वयं महसूस किया था, कैसा लगता है जब स्वच्छंद विचरण करने वाले को कैद कर दिया जाता है? सभी ने इस बात को महसूस किया किस पिंजरे में कैद रहना कितनी कष्टदायी होता है।
पिंजरे में कैद इन परिंदों जैसा ही जीवन है, जेल में सज़ा काट रहे कैदियों का। इन बेज़ुबान परिंदों के दर्द को आप देश की जेलों में सज़ा काटने वाले कैदियों से पूछ सकते हैं। ये लोग जेलों में अपना समय कैसे काटते हैं, सिर्फ ये ही जानते हैं। मेरा मानना है कि कोई भी अपनी खुशी से अपराधी नहीं बनता, बल्कि हालत उन्हें मजबूर बना देते हैं। वैसे देखा जाए तो जेलों में बंद कैदियों में ज्यादातर ऐसे कैदी हैं, जिन्होंने कोई संगीन अपराध नहीं किया या फिर वे गरीब परिवार से हैं, क्योंकि आज-कल पैसों का बोल-बाला है।
कई बार अपराध करने के बाद भी लोग पैसों के दम पर आसानी से छूट जाते हैं, और बेचारा गरीब अपनी बेगुनाही साबित न कर पाने के कारण जेलों में कैद होकर रह जाता है।
कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जेल में रहने के बाद लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ जाती है। दरअसल हमारे देश में ऐसा नियम है कि चाहे 100 गुनहगारों को सजा न मिले, लेकिन किसी भी बेकसूर को सज़ा नहीं होनी चाहिए। इसी नियम के चलते देश में अपराधी सीना तान के घूमते हैं।
मैंने अभी कुछ समय पहले अखबार में पढ़ा था कि कई राज्यों में जेल में रहने वाले कैदियों को मानसिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए कई कौशल सिखाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य इन्हें जेल से निकलने के बाद समाज की मुख्य धारा में जोड़ना और इनका जीवन फिर से खुशहाल बनाना है। मुझे लगता है यह एक अच्छी शुरुआत है, जिसके तहत सज़ा काट रहे कैदियों को सम्मान से जीने और अपनी आजीविका चलाने का हुनर सिखाया जा रहा है। वे लोग भी खुशी से जीवन जीने के हकदार हैं।