संसार का यह नियम है, जो इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन अपना जीवन काल पूरा करके मृत्यु को प्राप्त करना ही है। लगभग सभी धर्मों की यह मान्यता है कि किसी के मरने के बाद उसके लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस व्यक्ति के मरने के बाद न जाने कितनी ही वस्तुओं का दान किया जाता है, ताकि स्वर्गलोक जाने में उसे किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। लेकिन, क्या हम उन्हें ये अधिकार जीते जी नहीं दे सकते? क्यों न उन्हें उनके पसंद का खाना खिलाया जाए, अच्छे कपड़े तोहफे में दिए जाएँ, और उनकी जो भी उचित ख्वाहिशें हैं, वे सभी उनके सामने ही पूरी कर दी जाएँ।
बुढ़ापे में माँ-बाप को उसी सहारे की जरुरत होती है, जैसे बचपन में एक बच्चे को। माँ-बाप के दुनिया से चले जाने के बाद उनकी आत्मा की शांति के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ‘श्रद्धया इदं श्राद्धम्’ का मतलब है, जो श्रद्धा से किया जाए, वही श्राद्ध है। इस दौरान पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, ब्राह्मण भोज, या दान-पुण्य जैसे कई कार्य किए जाते हैं। लेकिन क्यों? सिर्फ इसलिए कि मरने के बाद हम उनके लिए कुछ करें, ताकि समाज और कहीं ऊपर से वो देख रहे हों, तो उन्हें यह लगे कि हमने उनके लिए कुछ किया। लेकिन, सच कहूँ, तो यदि श्रद्धा जीते जी दिखाई जाती, तो ज़्यादा फायदेमंद होती। वक्त निकल जाने के बाद की गई सारी कोशिशें मेरी नज़र में बेकार हैं।
आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हमारे पास दो पल नहीं होते कि हम अपने माँ-बाप के पास बैठ सकें या उनकी बात सुन सकें। वे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हम पर खर्च कर दिया, हमारी व्यस्त दिनचर्या देखते हुए, हमसे बात करने या हमें दो पल रोकने के लिए, आस भरी निगाहों से देखते हैं। मेरे विचार में, दुनिया का सबसे बड़ा घाटे का सौदा हमारे माँ-बाप करते हैं, जो अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों पर खर्च कर देते हैं, बिना किसी वापसी के मुनाफे की उम्मीद के। पिता अपनी औलाद पर अपनी सारी जमा पूँजी, ख्वाहिशें और उम्मीदें लगा देता है, और बदले में वही औलाद नौकरी या किसी अन्य बहाने से उससे दूर हो जाती है।
फिर लोक-लाज के लिए दान-पुण्य, पूजा-पाठ और बाकी रस्में करनी पड़ती हैं, क्योंकि यदि नहीं किया, तो वही घिसा-पीटा सा सवाल उठेगा कि लोग क्या कहेंगे? लेकिनं क्या वो उम्मीद भरी नज़रें, जो पास बैठने के लिए थीं, जिंदगीभर भुलाई जा सकती हैं? शायद नहीं। यदि हम जीते जी अपने माता-पिता को सुख नहीं दे पाए, उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाए, तो क्या उनके मरने के बाद कभी कर पाएँगे? यही सच है, “जीते जी पूछा न गया, बाद मरने के ढेरों पुण्य कमाए जा रहे हैं।”
जो भी देना हो, चाहे वो कोई उपहार हो, दान-पुण्य हो या आपके व्यस्त जीवन में से निकाले गए कुछ पल, वो आप अपने माँ-बाप को जीते जी दे दें। यकीन मानें, ये आपके जीवन के सबसे अनमोल तोहफे होंगे, जो एक बार ऊपर वाले ने आपसे ले लिए, तो दोबारा कभी नहीं मिलेंगे। और फिर जीवन भर आपको यही पछतावा रहेगा कि काश उनके जीते जी हमने उन्हें थोड़ा समय दिया होता, थोड़ा उन्हें समझा होता। उनके दुनिया से चले जाने के बाद आप कितना ही कुछ क्यों ना कर लें, वह सब बेकार ही साबित होगा।