जीवन की आपाधापी में ऐसे न जाने कितने ही काम हैं, जो बेशक हमें जिम्मेदारी के साथ करने होते हैं, लेकिन हमारी शान-ओ-शौकत के नीचे कुचलकर वे दम तोड़ देते हैं.. आलिशान बंगले, महँगी गाड़ियाँ, संभाले न संभले ऐसी धन-दौलत, नाम, रुतबा और भी न जाने कितने ही भारी-भरकम शब्द घोंट देते हैं गला उन लोगों का, जिनके जीवन के असली मायने में ये शब्द महज़ ख्वाब हैं, कभी न पूरे होने वाले ख्वाब.. लेकिन, ऐसे नाम और रुतबे के क्या ही मायने, जो सही मायने में किसी जरुरतमंद के काम ही न आ सकें.. मेरे मायने में इन शब्दों का जो अर्थ है, वह आपको इस लेख के आखिर में पता चलेगा।
शहर की इस भागम-भाग और चका-चौंध में मेरे पास एक सुकून है। सुकून इसलिए कहा, क्योंकि ठसाठस भरे लोगों की इस भीड़ में अपना कहना वाला कहाँ कोई होता है किसी के पास, जिससे मन की व्यथा कही जा सके, जिसकी आपबीती शांति से सुनी जा सके, जिसके साथ मन भर के बातें की जा सकें, जिससे ऐसे विचार मिलें, जो जाने-अनजाने में जीवन के सबसे बड़े पाठ सीखा जाएँ.. मेरे पास ऐसा शख्स है, जो शख्स नहीं, मेरा सुकून है..
जब मैं गाँव में रहा करता था, तब उसी गाँव में मेरे घर से चार गली छोड़कर रहते थे चंदू भैया। गाँव में चौक के बीचों-बीच सिपाही की तरह तैनात पीपल के पेड़ के नीचे बने चौतरे (चबूतरे) पर हर शाम को बैठकर अक्सर वे मुझे दादी-नानी की सुन्दर-सुन्दर कहानियाँ सुनाया करते थे, ऐसी कहानियाँ, जो कहानियाँ कम और सीख अधिक हुआ करती थीं.. सुकून शब्द तब ही से अपने साथ लिए चल रहा हूँ मैं, क्योंकि मुझे ज्ञान की ये बातें आज भी उसी शिद्दत से बताया करते हैं चंदू भैया.. शहर की भारी भीड़ में जहाँ जान-पहचान वाले लोग भी गुम हो जाते हैं, वहीं हम आज भी साथ हैं। चंदू भैया पेशे से कार ड्राइवर हैं। वे सरकारी विभाग के एक बड़े अफसर के लिए काम करते हैं।
शहर में हम जब भी मिलते हैं, अपने गाँव के शांत चौक और उसमें खड़े पीपल के पेड़ को बहुत याद करते हैं।
शहरों के चौक तो तरसते हैं शांति के लिए, दिन भर गाड़ियों की टे-पो टे-पो सुन-सुनकर बहरे ही हो जाते होंगे बेचारे.. खैर, चंद दिनों पहले हम दोनों एक बगीचे में सुबह के समय बैठे थे, वे मुझे अपने मालिक के बारे में बता रहे थे। बड़ी तमन्ना है दिल में कि एक बार उनसे मिलने का सौभाग्य मिल जाए, आगे पूरी बात सुनने के बाद आपके मन में भी विचार समान ही होंगे, यह तय है।
चंदू भैया ने बताया कि साहब के बंगले में बहुत सारे लोग काम करते हैं। वे मेरा और बंगले में सभी काम करने वालों का पूरा ध्यान रखते हैं। हाँ, कभी-कभी बड़ी अजीब हरकत करते हैं। हर हफ्ते में एक से दो बार ऑफिस जाते हुए या फिर शहर से बाहर जाने के लिए जब भी उन्हें एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन जाना होता है, तब वे बंगले से निकलते तो मेरे साथ हैं, लेकिन कार में बैठे-बैठे रास्ते में न जाने क्या देखते रहते हैं, और एकाएक ही चिल्ला पड़ते हैं कि चंदू यहीं कार रोक दो.. मैं कुछ समझ पाता हूँ, इससे पहले ही वे झट कार से उतरकर ऑटो रिक्शा पकड़ लेते हैं। मैं उनके पीछे-पीछे चलता रहता हूँ। कुछ ही दूर जाकर वे ऑटो छोड़ देते हैं, और किराए के नाम पर उस ऑटो चालक को पाँच सौ रुपए का नोट पकड़ाकर थोड़ा पीछे की तरफ आकर फिर मेरे साथ बैठ जाते हैं।
परसों की ही बात बताता हूँ। साहब के पिता जी शहर से बाहर रहते हैं, और बाहर बहुत ही कम आना-जाना करते हैं। वे साहब से मिलने आने वाले थे। वे मेरे साथ खुद उन्हें लेने एयरपोर्ट तक गए थे। उस दिन मैंने अपने साहब के पिता जी को पहली बार देखा। दिखने में वे बिल्कुल सामान्य रहन-सहन वाले थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक अनोखी-सी शांति और भव्यता की झलक रही थी। साहब ने उनके पिता जी को कार की पिछली सीट पर बिठाया, और उनका सामान खुद रखा। मैंने कई बार अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने मुझे सामान नहीं रखने दिया। यह वाकया मेरे लिए सच में बहुत ही अजीब था।
बात यहाँ तक आकर भी खत्म नहीं हुई, सामान रखने और पिता जी कोई कार में बिठाने के बाद वे मुझे कार के पीछे की तरफ ले गए और एक हजार रुपए देकर मुझसे कहते हैं, “तुम ऑटो से घर चले जाओ। आज तुम्हारी छुट्टी। कल समय पर आ जाना।” मैं कुछ कह पाता, इससे पहले उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, एक मीठी-सी मुस्कान दी और ड्राइवर सीट पर जा बैठे।
अपने पिता जी को पीछे की सीट पर बैठा कर कार चलाना साहब के लिए इस दुनिया के सबसे श्रेष्ठ ड्राइवर की अनुभूति थी, जो उनके बराबर तो नहीं, लेकिन उनकी मुस्कान का अंदाजा लगाकर महसूस मैंने भी कर ली थी। शायद वे परम आनंद के इन क्षणों को नितांत व्यक्तिगत बनाए रखना चाहते थे। सच-मुच यह सबसे सुखद अनुभव था मेरे जीवन का।
अगले दिन मैं सुबह ड्यूटी पर हमेशा की तरह अपने समय से ठीक 10 मिनट पहले पहुँचा और कार धोने लगा। तभी साहब के पिता जी और साहब कार के पास आ गए। वे साहब से कहने लगे, “देखो गोपाल, तुम्हारी गाड़ी के ब्रेक शू घिस गए हैं, आगे राइट साइड का पहिया भी एलाइनमेंट माँग रहा है। गियर बॉक्स का ऑइल बदलने की जरूरत है। साइलेंसर को भी साफ करा लो।” इसके बाद वे मुझसे बोले, “एक काम करना, बेटा, तुम ध्यान से करवा लेना ये सभी काम..”
बड़े ही उत्साह से हाँ कहकर मैं आश्चर्य भरी उत्सुकता से उन्हें देखने लगा। वे तुरंत मेरे भावों को समझ गए, और हँसते हुए बोले, “तुम्हारे साहब एक टैक्सी ड्राइवर के बेटे हैं। हम दोनों अपने-अपने कामों में माहिर हैं। और हाँ! हमें एक-दूसरे पर बहुत गर्व है।”
चंदू भैया मुझे बताते हुए कहते हैं कि मेरा सिर गर्व से उस समय इतना इतना ऊँचा हो चुका था, जिसे शब्दों में बयाँ कर पाना मेरे लिए नामुमकिन है। मैं एक ऐसे शख्स के लिए काम कर रहा हूँ, जो न सिर्फ एक नेक दिल इंसान है, बल्कि एक बहुत बड़ा समाजसेवी भी। घमंड का नामों-निशान भी उस शख्स के आसपास नहीं है। कार से उतरकर साधारण-से ऑटो में बैठना और वह भी किराए से कई गुना अधिक राशि देकर किसी अनजान इंसान के चेहरे पर मीठी-सी मुस्कान बिखेरना, यह कोई महान आत्मा ही कर सकती है। लोगों का भला करते चलो, यह गुण मैंने उन्हीं से सीखा है।
सच ही कहा चंदू भैया ने, दौलत-शोहरत की भूख इंसानियत को निगल जाती है, कम ही लोग होते हैं, जो इन सब दिखावों से ऊपर भलाई को रखते हैं और सबका भला करते चलते हैं। मुझे भैया द्वारा अनुभव किया यह वाकया सुनकर इस इतना सुकून मिला, सोचिए जो हर दिन लोगों का भला करता चलता है, उसे कितना सुकून मिलता होगा..