कैदी के गुनाहों का दोषी कौन?

अपराध और परवरिश के बीच संबंध को दर्शाता दृश्य

गलती हर इंसान से होती है, बचपन में गलती करने पर बच्चे को बेशक एहसास नहीं होता कि उसने आखिर किया क्या है, लेकिन गाल पर लगा जोरदार तमाचा इतना डर तो बैठा ही जाता है कि यह काम दोबारा नहीं करना है, क्योंकि यदि किया, तो फिर से मार घल जाएगी। मेरी नज़रों में सुधार के लिए मारी गई मार बच्चे को लाड़-प्यार में बिगड़ने देने से हजार गुना बेहतर है।

मेरा इकलौता बच्चा है, इसकी तो गलतियाँ भी माफ हैं.. मैं अपने बच्चे को कैसे डाँट सकता हूँ.. समय पहले ही खराब है, कहीं इसने कुछ कर लिया तो.. यह मेरा बच्चा है, गलती कर ही नहीं सकता.. ऐसे तमाम कारक हैं, तो आपके बच्चे को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते, क्योंकि इससे उन्हें और भी अधिक गलत काम करने की शह मिलती है। वे यह सोचने लगते हैं कि मैं कुछ गलत कर भी लूँगा, तो मेरा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा। और फिर इस स्थिति को गुमान में तब्दील होते देर नहीं लगती और बस फिर क्या, यहीं आकर अपराध बोध जन्म ले लेता है, जिसे अपने बच्चे के प्यार में पट्टी बाँधे माता-पिता देख ही नहीं पाते, और जब तक नज़र आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

वे यह मान बैठते हैं कि मैं गलत काम भी करूँगा, तो भी मेरे माता-पिता मेरा ही साथ देंगे और मेरे लिए दुनिया से लड़ जाएँगे। छोटी-मोटी गुंडा-गिर्दी से शुरू हुई यह कहानी हत्या और रैप जैसे संगीन अपराधों तक पहुँच जाती है, जिसका मलाल भी उसके मन में नहीं बचता। बचेगा भी कैसे, उसे सही और गलत में फर्क कभी बताया ही नहीं गया। जो बताया गया होता, तो परिस्थिति इस स्थिति तक आकर पैर पसार कर न बैठ जाती।

रुआब शुरुआत में कोर्ट से सज़ा मिलने और जेल की सलाखों के पीछे जाने के बाद भी कम नहीं होता। अकेलेपन का शिकार होने के बाद कहीं जाकर अपनी गलतियों के कड़वे सच का एहसास होता है और यहाँ से शुरू होता है अपने किए पर पछतावा होने का संवेदनशील सिलसिला। सज़ा काटने से लेकर जेल से छूटने तक का यह सफर पापों और अपराधों के प्रायश्चित की काँटों भरी राह पर चलकर पूरा होता है।

इस राह को काँटों भरा मैंने इसलिए कहा, क्योंकि सही राह पर चलते-चलते एक दम से गलत राह की ओर मुड़ जाना तो बहुत आसान होता है, लेकिन गलत राह की गर्त में एक बार उतरने के बाद वापस आ पाना उतना ही मुश्किल काम है, जितना कि सूखे जंगल में फिर से हरियाली उपजाना। मुश्किल इसलिए कि आसपास के ही लोग इस परिस्थिति में व्यक्ति के पैर खींचकर वापस नीचे गिराने का काम करने लगते हैं। और देखते ही देखते उस व्यक्ति विशेष द्वारा लिए गए प्रण के प्राण निकल जाते हैं।

वह कहते हैं न “अति सर्वत्र वर्जयेत्”, यानि अति करने से हमेशा बचना चाहिए, क्योंकि अति का परिणाम हमेशा हानिकारक ही होता है। इसलिए यहाँ मैं बच्चे को कम और माता-पिता को अधिक गलत ठहराता हूँ, क्योंकि उन्हीं के प्यार की ओट में छिपकर वे कच्ची उम्र में सही को सही और गलत को भी सही मान बैठते हैं। इसमें दोष अकेले बच्चों का नहीं है, दोष है उस हमदर्दी का, जो गलत कामों पर भी अंकुश नहीं लगा पाती, दोष है उस बेइंतेहा प्यार का, जिसकी आड़ में माता-पिता अपने बच्चों की गलतियों को गलती नहीं मान पाते। माता-पिता को चाहिए कि इस प्यार को इतना संतुलित रखें कि आपकी आँखों का डर कभी-भी उनमें खत्म न हो और कम से कम वे सही और गलत में फर्क समझ पाएँ, और सबसे विशेष, आपका बेशुमार प्यार उनके लिए जहर न बन जाए।

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