क्या सच में पढ़ाई से ज्यादा जरुरी है शादी?

भारत में शादी और पढ़ाई के खर्च के बीच दुविधा

कुछ समय पहले गुजरात के जामनगर में हुए एक भव्य आयोजन की चर्चा आपने जरूर सुनी होगी। देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी के बेटे की प्री-वेडिंग सेरेमनी थी। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस तीन दिवसीय भव्य आयोजन पर करीब 1200 करोड़ रुपए खर्च हुए। हमारे देश में अक्सर ऐसी खबरें सुनने में आती हैं कि फलाने की शादी में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च हुए। ये तो हुई अमीर घराने की बात, लेकिन आम भारतीय भी इसमें किसी से पीछे नहीं हैं। हमारे देश में महँगी शादियाँ तो हमारी शान का प्रतीक मानी जाती हैं। हर भारतीय परिवार एक या दो दिन चलने वाले शादी के आयोजन के लिए जीवन का एक बड़ा हिस्सा पैसा जमा करने में लगा देता है।

इतना ही नहीं, हमारे देश में शादी की प्राथमिकता शिक्षा से भी अधिक है। एक व्यक्ति भले ही अपने बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए पैसा जोड़े या न जोड़े, लेकिन वह उसकी शादी के लिए पाई-पाई जोड़ता है और जरुरत पड़ने पर कर्ज लेने से भी पीछे नहीं हटता। कुल मिलाकर, शादी धूम-धाम से करता है। वहीं, जब बात पढ़ाई की आती है, तो अक्सर यह सुनने में आता है कि पैसों की कमी के चलते पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी या छुड़वा दी गई। लेकिन, क्या आपने कभी यह सुना है कि पैसों की कमी से शादी ही नहीं हुई, बेशक नहीं, क्योंकि हर व्यक्ति शादी के लिए अपनी हैसियत से ज्यादा ही खर्च करता है। हाँ, दहेज के मामले में यह परिभाषा विपरीत हो सकती है, क्योंकि कई रिश्ते और शादी दहेज के लिए पैसों की उचित व्यवस्था न होने की वजह से टूट जाते हैं।

एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय, शिक्षा के मुकाबले शादी-ब्याह में दोगुना खर्च करते हैं, जबकि अमेरिका जैसे देशों में यह खर्च शिक्षा की तुलना में आधे से भी कम है। भारत में शादियों पर खर्च इतना है कि यदि शादी एक कैटेगरी होती, तो वह खाद्य और किराना के बाद दूसरी सबसे बड़ी रिटेल कैटेगरी होती। यदि औसत खर्च की बात की जाए, तो एक भारतीय एक या दो दिन के इस चमक-दमक के लिए 12 से 15 लाख रुपए खर्च करता है, जिसमें जरुरत की चीजें कम और दिखावट के लिए फिजूल खर्च ज्यादा होता है। इस पर भी आज के समय में शादियाँ सालों-साल टिक जाए, इसकी कोई ग्यारंटी नहीं है। जबकि, इसकी आधी कीमत में एक व्यक्ति पढ़कर अपना और अपने परिवार का जीवन बदल सकता है। साथ ही, देश के विकास में भी अपना योगदान दे सकता है।

एक समय शिक्षा और ज्ञान का केंद्र रहे इस देश में आज शिक्षा को लेकर ही जागरूकता नहीं है। हालत यह है कि देश में उच्च शिक्षण संस्थानों की कमी है, और तो और पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्कूल तक उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन सरकार शिक्षा के लिए उचित बजट बनाने के बजाए मुफ्त शादियों की योजनाओं में ज्यादा व्यस्त है। नतीजा यह है कि देश में हर साल शादियाँ तो लाखों की संख्या में हो रही हैं, लेकिन साक्षरता दर में हम आज भी पीछे हैं। जहाँ चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश शिक्षा को बेहतर बनाने पर विचार रहे हैं, वहाँ हम शादियों के ताम-झाम में ही उलझे हुए हैं। शादी से छह महीने पहले से ही लिस्ट बनने लगती है, जिसमें बुलाए जाने मेहमान बिना आए ही हजारों का आँकड़ा पार कर चुके होते हैं, और आने के बाद तो इस संख्या की कोई गिनती ही नहीं होती है।

याद है कोरोना का वह समय, जब बिना किसी धूम-धाम के सिर्फ 25 से 50 लोगों की उपस्थिति में ही शादियाँ हो रही थीं। क्या वो शादियाँ, वास्तव में शादियाँ नहीं थीं, या फिर उन शादियों को समाज में मान्यता नहीं दी गई। नहीं न.. तो फिर आज भी ऐसे ही कम खर्च में शादियाँ क्यों नहीं हो सकती हैं? और हो सकती हैं, तो फिर इतने फिजूल खर्च की जरुरत क्या है? यदि इन पैसों का उपयोग समाज के कल्याण या किसी जरूरतमंद की शिक्षा के लिए किया जाए, तो क्या यह इसका सार्थक उपयोग नहीं होगा?

ऐसा नहीं है कि देश में पैसे या संसाधन की कमी है, कमी है तो सिर्फ जागरूकता की.. कमी है इस समझ की, कि शादियों में जो 12-15 लाख रुपए हम हजारों मेहमान, अलग-अलग तरह के पकवान और बेहतर साज-सज्जा के रूप में फिजूल के दिखावे में लगा रहे हैं, ये सारे ही काम बिना दिखावे के इससे आधे खर्च में भी किया जा सकता है और जो पैसा हमने इतनी मेहनत से जोड़ा है, उसे अपने बच्चे की शिक्षा में लगाकर उसका भविष्य संवार सकते हैं। बचपन से हम यह सुनते आ रहे हैं कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता, तो फिर कुछ लोगों की झूठी वाह-वाही के लिए अपने जीवन भर की कमाई पानी की तरह बहा देना कहा की समझदारी है? जरा विचार कीजिए..

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