दूसरा मौका सभी के लिए महत्वपूर्ण

परीक्षा में दूसरा मौका मिलने से आत्मविश्वास से पढ़ाई करता छात्र

कितना अच्छा लगता है न, जब एक बार असफल होने के बाद, सफलता पाने के लिए दूसरा मौका मिल जाए। व्यक्ति हमेशा अपने अनुभव से कुछ न कुछ सीखता रहता है। मैंने अक्सर देखा है कि कहीं भी हमें यदि दूसरा मौका मिलता है, तो हम पहले से बेहतर प्रदर्शन करते हैं। मैं यहाँ मेले में खेले जाने वाला निशानेबाजी के खेल का उदाहरण देना चाहूँगा। इस खेल में एक इंसान को तीन छल्ले दिए जाते हैं किसी भी वस्तु पर निशाना लगाने के लिए…. पहले-दूसरे छल्ले से कम ही लोग निशाना लगा पाते हैं, क्योंकि छल्ले को कितनी तेजी से और कितनी दूरी पर फेंकना है, यह बात समझने में थोड़ा समय लग जाता है। अमूमन ज्यादातर लोग तीसरे मौके में सही निशाना लगा लेते हैं, क्योंकि पहले दो प्रयासों में वे लोग खेल की बारीकियों को समझ लेते हैं, जो उन्हें सही निशाना लगाने में मदद करती हैं। और जो लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं, स्वाभाविक-सी बात है, वे एक और मौका तलाशते हैं।

निशानेबाजी के इस खेल में जो व्यथा हमारे मन की होती है, बिल्कुल वही अनुभव छात्र भी करते हैं। कई बार एक बार में चीजें समझ में नहीं आती हैं, जिन्हें ठीक प्रकार ज़हन में उतारने में थोड़ा समय लगता है। वे भी यही चाहते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने का दूसरा मौका दिया जाए। जैसा कि हम सभी जानते हैं, बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश करने वाले बच्चों में दोस्ती तथा अन्य चीजों के प्रति ज्यादा रुझान रहता है। उन्हें पढ़ाई की अहमियत तब समझ आती है, जब वे परीक्षा में दूसरों की अपेक्षा पीछे रह जाते हैं। उस समय इन बच्चों को यह एहसास होता है कि काश, हमने थोड़ी और मेहनत की होती। अब ये बच्चे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए दूसरे मौके की चाह रखते हैं।

मैंने अक्सर कई लोगों को यह बोलते हुए सुना है कि उनके बच्चे ने अर्द्धवार्षिक परीक्षा से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन, वार्षिक परीक्षा में किया था। इसके पीछे की वजह बच्चों का अपनी गलतियों से सीखना और आगे अच्छा प्रदर्शन करने की ललक होती है। इसका समाधान मैंने अभी कुछ दिनों पहले ही अखबार में पढ़ा था। शिक्षा विभाग ने 10वीं-12वीं की बोर्ड परीक्षाओं को दो चरण में आयोजित करने का निर्णय लिया है।

हर साल सीबीएससी बोर्ड परीक्षाओं में लगभग 30 लाख बच्चे पेपर देते हैं, जिनमें 12 लाख बारहवीं और 18 लाख दसवीं के बच्चे शामिल होते हैं।

आजकल बच्चे ‘अभी तो समय है’ यह सोचकर पढ़ाई करने की जगह मोबाइल और अन्य चीजों में समय बर्बाद करते रहते हैं। और जब परीक्षाएँ नज़दीक आ जाती हैं, तब बिना वजह का स्ट्रेस लेकर तबियत खराब कर लेते हैं, जिससे परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। कई बार बच्चे अपने खराब परिणाम से निराश माता-पिता और अन्य लोगों द्वारा की जाने वाली अवहेलना के डर से गलत कदम उठाने तक को मजबूर हो जाते हैं।

विशेषज्ञ भी यही कहते हैं कि बच्चे परीक्षाओं के दौरान अक्सर इस बात का तनाव ले लेते हैं कि अच्छा प्रदर्शन न करने पर उनका एक साल बर्बाद हो जाएगा। बच्चों के इस तनाव को सरकार ने भी गंभीरता से लिया है, जिसकी न सिर्फ मैं, बल्कि प्रत्येक अभिभावक सराहना करते हैं। उनके मनोबल को बनाए रखने और उन्हें पढ़ाई में प्रोत्साहन देने के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षाओं का मौका मिलना उनके शिक्षा स्तर को बढ़ाने का काम करेगा। परीक्षाओं का पहला चरण नवम्बर-दिसंबर में और दूसरा चरण फरवरी-मार्च तय करना बच्चों को पढ़ने के लिए एक अच्छे समय की नुमाइश करता है। परीक्षा में दूसरे मौके की अवधारणा शिक्षा में एक आदर्श बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है, जो प्रदर्शन से अधिक सीखने पर जोर देती है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर बच्चे की अपनी क्षमता होती है, जिसके बूते वह खुद के अनूठे तरीकों से चीजों को समझता है और अपनी गति से कोई भी चीज सीखता है। यदि ऐसे में उन्हें दूसरा मौका मिलता है, तो बेशक वे सबसे बेहतर प्रदर्शन करके दिखाएँगे। परीक्षा में दूसरा मौका छात्रों को समझ प्रदर्शित करने के लिए अतिरिक्त समय और अवसर देता है। यह विभिन्न शिक्षण शैलियों को समायोजित कर यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि सभी छात्रों को सफल होने का उचित मौका मिले। देखा जाए तो यह शिक्षा के क्षेत्र में विशेष पहल है, जिससे बच्चों के परीक्षा परिणामों में सुधार देखने को मिलेगा।

बच्चों को फिर से मौका दिया जाए, तो वे बेहतर प्रदर्शन करने से बिल्कुल भी पीछे नहीं हटेंगे, क्योंकि आपने “दूध का जला, छाछ भी फूँककर पीता है” कहावत तो सुनी ही होगी, जो यहाँ सटीक बैठती है। ठीक इसी, प्रकार एक बार अपने प्रदर्शन से नाखुश बच्चे दूसरी बार में अपना शत-प्रतिशत देने की पूरी कोशिश करेंगे। निश्चित ही यह पहल शिक्षा के हित में की गई सबसे सार्थक पहलों में से एक के रूप में खुद को साबित करेगी। ऐसे में, हमें सरकार के इस फैसले की सराहना करना चाहिए। सही मायने में देखा जाए तो परीक्षा में दूसरा मौका छात्रों में विकास की मानसिकता को बढ़ावा देने का एक नया अवसर है। यह उन्हें सिखाता है कि असफलताएँ स्थायी विफलताएँ नहीं होती हैं, बल्कि ये तो चिंतन, सीखने और सुधार के अवसर हैं।

यह मानसिकता लचीलापन और दृढ़ संकल्प विकसित करने में महत्वपूर्ण है और आप देखिएगा, परिणाम बड़े ही सार्थक देखने को मिलेंगे और इससे देश में शिक्षा का स्तर भी बढ़ेगा।

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