गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
कबीर के इस दोहे का अर्थ नई पीढ़ियाँ शायद ही जानती हों। गुरु और शिष्य के उदाहरण को हम इस दोहे से बखूबी समझ सकते हैं। जिस प्रकार कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मारकर मटके तथा बर्तनों को गढ़ता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी शिष्य के अवगुणों को निकालकर, उन्हें ज्ञानी बनने का मार्ग दिखाते हैं।
आज के बदलते हुए युग में शिक्षा और शिक्षा पद्धति दोनों ही पूरी तरह बदल चुकी हैं। लगभग 140 करोड़ आबादी वाले देश में साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है, जिसमें 82.14 प्रतिशत पुरुष और 65.46 प्रतिशत महिलाओं की साक्षरता दर है। हमारे देश में हर उस व्यक्ति को साक्षर माना जाता है, जो अपना नाम लिख व पढ़ सकता है। लेकिन क्या साक्षरता का यह पैमाना सही है? क्या ऐसा व्यक्ति वास्तव में भविष्य निर्माण में योगदान दे सकता है? यह एक गहन चिंतन का विषय है।
कोविड जैसी महामारी के बाद जब लोगों ने अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए तथा अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित न रखने के लिए सरकारी स्कूलों की तरफ रुख किया, तब पता चला कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य कितने अन्धकार में है। देश में कुछ स्कूल ऐसे हैं, जो सिर्फ एक या दो शिक्षकों के या अनुबंध आधारित शिक्षकों के भरोसे ही चल रहे हैं । कई जगह तो सभी पराकाष्टाएँ ही पार हो चुकी हैं, शिक्षा का मोल वहाँ जाकर दम तोड़ देता है, जब ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कई जगह स्कूलों का मोल शिक्षा ग्रहण करने का स्थान न होकर, पशुओं को बाँधने का स्थान मात्र रह गया है।
17 जनवरी 2023 को जारी की गई एन्युअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट में बताया गया है कि 14 -18 वर्ष के 86.8 प्रतिशत बच्चों का स्कूल में नामांकन ही नहीं है।
इसका मुख्य कारण परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के साथ ही स्कूलों की खराब स्थिति और उनमें बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जिन बच्चों का स्कूलों में नामांकन है उनमें से अधिकतर बच्चे तीसरी कक्षा में सिखाये जाने वाले गणित के साधारण सवालों को भी हल नहीं कर पाते तथा एक चौथाई बच्चे ऐसे हैं, जो अपनी क्षेत्रीय भाषाओं की कक्षा दो की किताब भी धारा-प्रवाह नहीं पढ़ पाते हैं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में कुल 31.7 प्रतिशत, 55.7 प्रतिशत विद्यार्थियों का कला/ मानविकी में नामांकन है जबकि केवल 9.4 प्रतिशत विद्यार्थी ही वाणिज्य संकाय में नामांकित हैं।
यदि मैं आँकड़ों की बात करने बैठूँ, तो वक्त कम पड़ जाएगा, लेकिन आँकड़ें खत्म नहीं होंगे। मेरा ऐसा मानना है कि यदि इन आँकड़ों पर अभी गौर करके, इनका समाधान नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब देश शिक्षा की जगह अशिक्षा में अव्वल आएगा।
‘‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।”
हमें जरूरत है कि अब हम मिलकर इन पक्तियों पर अमल करें, जो हमें यह बताती हैं कि जिस प्रकार तलवार के सामने म्यान का कोई मोल नहीं होता, वैसे ही गुरु की जाति और धर्म का शिक्षा देने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। गुरु हमेशा अपने शिष्यों को समान भाव से देखते हैं और उनके बेहतर भविष्य की कामना करते हुए उन्हें शिक्षा प्रदान करते हैं। इसलिए शिष्यों का भी यह फर्ज़ बनता है कि वे गुरु की जाति और धर्म को न देखते हुए सिर्फ शिक्षा ग्रहण करने पर ही ध्यान केंद्रित रखें।