हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली द्वारा कलंक और रूढ़िवादिता के कारण होने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया से बचने के लिए सेक्स एजुकेशन को बहुत आसानी से समाप्त कर दिया गया है, लेकिन इसकी कीमत तो छात्र ही चुकाते हैं। यह गंभीर समस्या आज उचित समाधान की माँग कर रही है। इससे जुड़ी शर्म की उत्पत्ति का पता लगाने और सेक्स एजुकेशन को बढ़ावा देने के पिछले प्रयास विफल रहे हैं। और क्यों युवाओं द्वारा सामना किए जाने वाले संघर्ष जिनके वे हकदार थे, इस ज्ञान से वंचित हैं और समाधान जो अंततः इस मुद्दे को हल कर सकते हैं।
आज की शिक्षा जहाँ समाज में शिक्षा ज्ञान का वह प्रकाशस्तंभ होने का दावा करती है, जो बेतुके कलंक और रूढ़िवादिता को मिटाती है, बावजूद इसके यह विषय समाज में अभी-भी क्यों अछूता है?
आखिरी बार आपने वास्तविक जीवन में बीजगणित का उपयोग कब किया था? यदि आप इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं हैं, तो कहीं नहीं! तो अनर्गल शिक्षा देने से अच्छा जो तथ्य दैनिक जीवन से सरोकार रखते हैं, उन की शिक्षा देने में हर्ज़ क्या है? इसलिए युवा दिमागों को सेक्स एजुकेशन देने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। अपने शरीर के बारे में जानना हमारा अधिकार है और माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे उन्हें वह ज्ञान और जागरूकता प्रदान करें, जो एक युवा दिमाग को जानना आवश्यक है। व्यापक सेक्स एजुकेशन तक पहुँच एक मानव अधिकार है। समाज अब अधूरे ज्ञान के साथ बच्चों के दिमाग का ब्रेनवॉश करने और युवाओं को इसे निष्क्रिय रूप से सड़कों या इंटरनेट पर नहीं छोड़ सकता है।
सेक्स एजुकेशन का उद्देश्य बच्चों और युवाओं को पुरुषों और महिलाओं दोनों के शरीर को समझने में मदद करना है। जेंडर के बीच अंतर और समानता को पहचानने से उन्हें बड़े होने के साथ-साथ अपने बदलते शरीर के बारे में ज्ञान मिलता है।