सिर्फ एक डिग्री नहीं, बल्कि रोजगार की ओर पहल का माध्यम भी हो शिक्षा
जब बात आती है एक निहित शिक्षा प्रणाली की, मेरा ख्याल है कि इससे अधिकांश लोग प्रभावित होते हैं। कठिन पाठ्यक्रम संरचना से लेकर मैरिट स्कोरिंग प्रणाली तक, सब कुछ बहुत पुराना है।
कुछ देशों को छोड़कर दुनिया भर में कहानी एक-सी है। मौजूदा शिक्षा प्रणाली की सबसे चौंकाने वाली समस्या यह है कि यह छात्रों को डिग्री धारक बनाने की प्रवृत्ति होती है। मुझे गलत न समझें। मैं किसी भी डिग्री के मूल्य को कम नहीं कर रहा हूँ। हालाँकि, जब एक छात्र के जीवन में एक डिग्री हासिल करना ही एकमात्र प्रेरणा बन जाती है, तो शिक्षा का पूरा उद्देश्य ही चकनाचूर हो जाता है।
जब कोई बच्चा अपनी औपचारिक शिक्षा शुरू करता है, तो वह प्राथमिक स्तर पर प्रवेश करता है और धीरे-धीरे, बीस या बाईस वर्ष की आयु में, स्नातक की डिग्री प्राप्त कर लेता है। इतने सालों के बाद भी यदि उसे अपना करियर शुरू करने के लिए कोई लक्ष्य नहीं मिल रहा है या कोई दिशा नहीं मिल रही है, तो ऐसी शिक्षा का फायदा ही क्या? उसके हाथ में जो डिग्री है, उसका फायदा ही क्या? डिग्री प्राप्त करने के बाद, छात्रों के पास अपने भविष्य के लिए एक स्पष्ट दिशा होना चाहिए; उन्हें अपने भविष्य के लक्ष्य के प्रति कोई संदेह नहीं होना चाहिए; उन्हें नौकरी के बारे में चिंतित नहीं होना चाहिए।
लेकिन हकीकत में आजकल हम देखते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी दिशाहीन है। हमारे युवा भटके हुए हैं और उनमें असहायता और निराशा की भावना घर कर रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, ऐसे लाखों पुरुष और महिलाएँ हैं, जो स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट स्तर पर अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अपनी पसंद का रोजगार ढूँढ पाने में असफल रहते हैं। क्या यह हमारी सामाजिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था की विफलता नहीं है? अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष उच्च शिक्षा प्राप्त करने में व्यतीत करने के बाद भी हमारे युवा आत्मनिर्भर नहीं हैं।
ऐसे में, वे अपनी रोजमर्रा की समस्याओं से कैसे छुटकारा पा सकेंगे और समाज व राष्ट्र के लिए कुछ योगदान देंगे भी तो क्या? इसलिए इस समस्या को हल करना न सिर्फ इस देश के युवाओं के सामने, बल्कि शिक्षाविदों, विद्वानों और सरकार में बैठे लोगों के सामने भी एक चुनौती है।
इसलिए आज परिणामोन्मुख शिक्षा की आवश्यकता है। मेरी राय में, शिक्षा एक ऐसी जीवनदायी प्रक्रिया है, जो किसी को भी इतना कुशल बना सकती है कि वह खुद की और समाज की प्रगति में योगदान कर सके। यह कक्षाओं और डिग्रियों तक ही सीमित नहीं है। यह सिर्फ शैक्षिक ज्ञान ही प्रदान नहीं करती, बल्कि जीवन के स्कूल में भी अतुल्य ज्ञान प्रदान करती है।
विज्ञान, साहित्य, इतिहास, भूगोल आदि के ज्ञान के अलावा, व्यक्तित्व के निर्माण, सेवा, सार्वजनिक भाषण, संवाद कला, नेतृत्व, ग्रूमिंग, गृहस्थ जीवन कला, स्वास्थ्य और फिटनेस के क्षेत्रों में भी युवा पीढ़ी को दक्ष बनने की जरुरत है। मुझे यह काफी देर समझ में आया, जब मुझे एकेडमिक्स के अलावा और स्थितियाँ भी डोलती हुई दिखाई पड़ी। मेरे सामाजिक कौशल अछूते थे और मेरी डिग्री के अलावा अन्य क्षेत्रों के ज्ञान मुझ में कम था।
जब से मैंने इस पर काम करना शुरू किया है, तब से खुद को अधिक आत्मविश्वासी महसूस किया है और अब अधिक सीखने और जानने के लिए प्रेरित हूँ। शिक्षा की सार्थकता इसी में है कि शिक्षा आवश्यक रूप से रोजगार में सहायक हो और उसकी नींव सदाचार पर रखी जाए। मेरे हिसाब से शिक्षा में जिज्ञासा को पकड़ कर रखिए, इससे खुद-ब-खुद आपका विकास होगा।