भारत हो या विश्व का कोई भी देश, राजनीति में राजनेताओं को दिए जाने वाले उपनाम केवल संबोधन के लिए नहीं होते, बल्कि जनता के मन में बसे उनके व्यक्तित्व, योगदान और छवि का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। आज़ादी के पहले या बाद में, यह परंपरा निरंतर चलती रही है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बच्चे प्यार से...
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भारतीय राजनीति में अपनी सादगी और साहस से इतिहास रचने वाले छोटे कद के बड़े राजनेता
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ नेतृत्व की ऊँचाई कभी सेंटीमीटर या फीट में नहीं नापी जाती, बल्कि यह जनता के विश्वास की गहराई और दूरदर्शी फैसलों की स्पष्टता से तय होती है। आज सोशल मीडिया के दौर में जहाँ नेता की मंचीय उपस्थिति, बॉडी लैंग्वेज और शारीरिक हाइट को बहुत महत्व दिया जाता है, वहाँ...
Continue reading...भारतीय राजनीति में अपनी दिव्यांगता को ताकत बनाकर नई दिशा गढ़ने वाले प्रमुख चेहरे
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ नेतृत्व कभी शारीरिक क्षमता या रंग-रूप से नहीं नापा जाता, बल्कि जनता के विश्वास और संघर्ष की भावना के साथ दूरदर्शी सोच से तय होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे अनेक और महान नेता हुए हैं, जो नेत्रहीनता, पैरालिसिस या अन्य गंभीर शारीरिक स्थितियों का सामना करते हुए...
Continue reading...कैसे झारखंड में आदिवासी आंदोलन, अस्मिता और चुनावी सत्ता की धुरी बना सोरेन परिवार?
15 नवंबर, 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में झारखंड का उदय महज़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सदियों पुराने आदिवासी संघर्ष और अस्मिता नई जान मिलने जैसा था। तत्कालीन बिहार के 18 जिलों को काटकर बने इस खनिज समृद्ध राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा से...
Continue reading...इंदिरा से सोनिया तक, मनमोहन से राहुल तक; कितनी बदल गई कांग्रेस
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास केवल एक राजनीतिक दल की यात्रा नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और उसकी लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने तक, कांग्रेस देश की राजनीति की धुरी बनी रही। आजादी के बाद के शुरुआती दशकों को यदि कांग्रेस का स्वर्णिम कालखंड कहा जाए, तो...
Continue reading...भारतीय राजनीति में पुनरुत्थान की रणनीति के सात सूत्र
भारतीय लोकतंत्र में कोई भी हार अंतिम नहीं होती। यहाँ जनता किसी दल को हमेशा के लिए खारिज नहीं करती, बल्कि समय-समय पर उसे आईना दिखाती है। इतिहास गवाह है कि जो दल इस आईने में खुद को ईमानदारी से देख लेता है, वही दोबारा सत्ता के शिखर तक पहुँचता है। कांग्रेस की 1980 की वापसी हो, तृणमूल कांग्रेस का...
Continue reading...मंडल बनाम कमंडल: वह द्वंद्व, जिसने गढ़ा आधुनिक भारत का राजनीतिक भूगोल
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ दशक ऐसे रहे हैं, जिन्होंने आने वाली सदियों की दिशा तय की है। 1990 का दशक भी ऐसा ही एक प्रस्थान बिंदु था। यदि हमें समकालीन भारत की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट को समझना है, तो हमें दो शब्दों की गहराई में उतरना होगा, मंडल और कमंडल। यह केवल दो विचारधाराओं का टकराव नहीं...
Continue reading...वैचारिक संघर्ष से सत्ता के शिखर तक, ऐसा रहा भाजपा के उदय का सफर
भारतीय राजनीति के पन्नों में भारतीय जनता पार्टी का उदय यूँ तो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, लेकिन इसके पीछे दशकों का पसीना और वैचारिक तपस्या है। आज जो पार्टी दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में खड़ी है, उसकी नींव संघर्षों की ऐसी ठोस जमीन पर रखी गई थी, जहाँ जीत की उम्मीद कम और...
Continue reading...कम होती पीएम मोदी की लोकप्रियता
हमने पिछले डेढ़ दशक के दौरान भारतीय राजनीति को कई परिदृश्यों में बदलते देखा है। कैसे कुछ बेहतर सोशल मीडिया कैंपेन्स के दम पर एक राज्य तक सीमित राजनेता राष्ट्रीय चेहरा बन गया और सत्ता के केंद्र में स्थापित हो गया। जाहिर है, बात पीएम मोदी की हो रही है, जिन्होंने लगातार तीन बार न केवल देश का प्रधानमंत्री बनने...
Continue reading...क्या 2047 तक विकसित भारत की राजनीति, विश्वगुरु के नारे को साकार कर पाएगी?
जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफर का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक्की की, कितनी सड़कें बनीं या कितनी गगनचुंबी इमारतें खड़ी...
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