भूख की चीख

भूखे बच्चे की नम आँखें

पेट से निकली हुई बेबाक भूख की चीख कानों से सुनाई नहीं, बल्कि दिखाई देती है आँखों से

भूख से जिस समय पेट बिलखता है, उस स्थिति में दुनिया की कोई भी बात ज़हन में नहीं आती। बात बहुत बड़ी है, जरुरत है, पेट की इस गुहार को सुनने की और इसे महसूस करने की। उस पेट में उठती दलील, जो चार दानों की मोहताज़ होती है, क्या उच्च कर गुजरने को तैयार नहीं होती? यह बेबाक और बेताब भूख मासूमों से कितने ही जुर्म करवा बैठती है.. क्या-क्या नहीं छिन लेती है यह मासूमों से.. कहीं बचपन, कहीं सपने, कहीं किसी के अरमान नोंचती है, तो कहीं चोर बनाकर छोड़ती है.. जब चार दानें भी नसीब नहीं होते, तब अच्छे और बुरे का ख्याल सिर्फ ख्याल मात्र बनकर ही रह जाता है। फिर मन में यह सवाल नहीं उठता कि कोई देख लेगा, और देख लेगा, तो इसका हश्र क्या होगा। लोगों की खचाखच भरी भीड़ में मौका पाकर भूख मिटाने के लिए अपने दिल की नहीं, बल्कि पेट की सुनने को चोरी की संज्ञा देना क्या सच में सही है?

वह कहते हैं न कि जब हम अपने आस-पास के वातावरण में लाल रंग देखना चाहते हैं, तो हमारी नज़रें सिर्फ और सिर्फ लाल रंग की वस्तुओं पर जाकर ही टिकती हैं, ठीक वैसे ही कभी इन बेबसों पर, भूख की पीड़ा को सहते इन लोगों को देखने की कोशिश करना.. आपके आस-पास न जाने कितने ही मासूम लोग होंगे, जिन्हें जीते-जी हर भूख मौत के घाट उतारती है।

भूख कोई बीमारी नहीं है, यह एक बेबसी है, जिसे बयाँ करने वाले का मुँह नहीं, बल्कि आँखें बोलती हैं। कभी रास्ते में बैठे बेबस शख्स या किसी भीख माँगने वाले की बात पर गौर किया है आपने? आप देखेंगे कि महज़ एक बार की भूख खत्म करने के लिए वे आपको ईश्वर का वास्ता तक दे जाते हैं। कभी सोचा है गहराई से कि आखिर वे अपना पेट भरने के लिए ईश्वर का वास्ता किस वजह से देते हैं? “भगवान के नाम पर दे दे”, “अल्लाह के नाम पर कुछ दे दे” और खाने को कुछ मिल जाने के बाद “भगवान तुम्हारा भला करे”, ये शब्द हमारे लिए आम हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए कतई नहीं, उनके लिए ये शब्द भावना है, उनके लिए ये शब्द स्वयं भगवान हैं, जो आपके रूप में उनका पेट भरने आए हैं।

कुल मिलाकर उनकी यह पुकार वह गुहार है, जो आपसे सीधा आपके प्रभु या रब, जिन्हें भी आप मानते हैं, उनके वास्ते और उनकी खातिर आप कुछ दे दें, ताकि उस जरूरतमंद का पेट भर जाए और इसका पुण्य आपके भलाई के खाते में दर्ज हो।

भूख का एहसास उसे होता है, जिसके पेट ने इसकी तड़प सही हो, जिसका पेट आसानी से भर जाता है, उसे इसकी टीस कभी महसूस नहीं हो सकती। कोई पेट तरसे है एक वक्त की रोटी को, तो कहीं हाल ये भी हैं कि कम खाने के लिए डाइट पर डाइट फॉलो की जाती है। भूखे व्यक्ति को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उसे क्या मिला है। बासी, बचा-कुचा जो भी मिल जाए, उसके लिए वह शुद्ध भोजन होता है। हमारे द्वारा किनारे किया गया भोजन यदि हम खा ले, तो नुकसान कई होंगे, लेकिन वही भोजन उन बेबसों की सेहत पर रत्ती भर भी बुरा असर नहीं करता, कारण कि उन्हें नहीं मालूम, कि ज्यादा मीठा सेहत को नुकसान देगा या बासी भोजन उनके शरीर में इन्फेक्शन का कारण बन जाएगा। मुद्दा तो पेट भरने का है।

हम देखते ही हैं कि जब किसी शादी या किसी समारोह में जाते हैं, तो लोग थाली भर-भर के खाना लेते है और व्यर्थ भी उतना ही करते हैं। न जाने क्यों उन्हें इस बात का ख्याल नहीं आता कि जिसने यह कार्यक्रम आयोजित किया है, उसकी पूँजी लगी है आपका पेट भरने में। पता नहीं वह व्यक्ति किस तरह से और किन स्थितियों में पैसे जमा करता है और अच्छे से अच्छे की उम्मीद में खर्च करता है। एक मुहीम छेड़ी जाए खुद में ही और खुद से ही। जितना लगे, जितनी जरूरत हो, सिर्फ उतना ही भोजन अपनी थाली में लें, ताकि बचे हुए भोजन से किसी और का पेट भर सके। सबसे जरुरी इस समारोह में बचे हुए भोजन को उन लोगों तक पहुँचाया जा सके, जिन्हें इसकी इस समय अधिक जरुरत है। और इसी के साथ समय रहते और खराब या बासी होने से पहले ही उसका सही तौर पर इस्तेमाल हो जाए।

कितना आसान हैं न! किसी गरीब से दुआओं का सौदा। भूख नहीं जानती कर्म को, भूख नहीं जानती धर्म को। एक भूखे बच्चे को क्या मालूम कि उसके हाथ में भोजन या पैसे रखने वाला हिन्दू है या मुसलमान। कहीं कुछ गरीब सड़कों पर रूल-रूल कर चंद सिक्कों में दुआ दे जाते हैं, तो कहीं कोई किसी और की बची-कुचि चीज़ को लेकर भी उम्र दराज़ी की दुआ दे जाते हैं। कभी बेमतलब ही किसी का पेट भर कर देखना, जो सुकून दिल को मिलेगा, वह शायद ही किसी और काम को करके मिलेगा।

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