‘भारत में गरीबी’ एक ऐसा विषय है, जिस पर आज भी बात की जाती है। यह सोचने वाली बात है कि दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करने के बाद भी हम गरीब देशों की रेस से बाहर नहीं आ पा रहे हैं, या फिर यूँ कह लें कि इस तराजू में बैठना हमें इतना भा रहा है कि अब हम इस पर से उठना ही नहीं चाहते। समाज का शायद ही कोई वर्ग हो, जो इससे अछूता हो। ‘भारत में गरीबी’ कहो या फिर ‘गरीबी में भारत’, हमारे देश में गरीबी का स्तर, मजाल है कि टस से मस हो जाए। सरकार हजारों प्रयास कर रही है, तमाम योजनाएँ चला रही है और भर-भर कर विकास कर रही है, इसके बावजूद, गरीबी का साया हटने का नाम नहीं ले रहा है।
भारत में गरीबों की संख्या पिछले कुछ दशकों में घटने का दावा किया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि गरीबी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे खत्म करना पहाड़ ढोने जैसा ही है। यह एक ऐसी जटिल समस्या है, जो सिर्फ आर्थिक संसाधनों की कमी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारण भी इसके पैर पसारने में बड़ा कारण हैं।
महात्मा गांधी ने एक किताब लिखी थी, जिसका नाम था ‘हिंद स्वराज’। इसमें उन्होंने कहा था कि देश की असली शक्ति उस समय तक सशक्त नहीं हो सकती, जब तक गरीबी का उन्मूलन न हो। इस किताब में गांधीजी ने अपने विचार स्पष्ट रूप से पिरोए हैं, जो बताते हैं कि गरीबी सिर्फ भौतिक अभाव का नाम ही नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और मानसिक स्वतंत्रता की भी कमी है। वे चाहते थे कि भारत की आत्मनिर्भरता, गरीबी दूर करने की सबसे बड़ी कुँजी हो, बेशक भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत की दिशा में तेजी से आगे बढ़ भी रही है, लेकिन मुद्दा यह है कि गरीब फिर भी गरीब ही बना हुआ है।
आजादी के बाद, भारत में गरीबी को कम करने के लिए कई योजनाएँ और नीतियाँ लागू की गईं। सन् 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना पर काम शुरू किया गया, जिसमें गरीबी हटाओ को प्राथमिकता दी गई।
गाँव की कच्ची सड़कों पर, हर मोड़ पर गरीबी की ऐसी ही मिलती-जुलती कहानी होती है। पैसों की तंगी तो एक तरफ, बिजली की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं, अच्छे स्कूलों और संसाधनों का अभाव भी इन गरीबों को गरीब बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। हिम्मत करके कुछ-एक गुजर-बसर करने शहरों का रुख कर भी लेते हैं, तो यहाँ भी उनका स्वागत संघर्ष से ही होता है। शहर की चमक-दमक उनके सपनों को और भी धुंधला कर देती है। एकमात्र विकल्प मजदूरी या और कोई छोटे-मोटे काम करके वे अपने परिवार का पेट पालने की कोशिशों में लग जाते हैं। बच्चों को पढ़ाने के यहाँ भी कोई आसार नज़र नहीं आते।
गरीबी उन्मूलन के नाम पर सरकार तमाम योजनाएँ चलाती है, लेकिन अफसोस कि ये योजनाएँ चलकर उन लोगों तक नहीं पहुँच पाती हैं, जिन्हें इनकी वास्तव में जरुरत है। भ्रष्टाचार और बिगड़ी व्यवस्था इन गरीबों को तमाम लाभों से वंचित कर देती हैं। मेरे मायने में यह कई दिनों के भूखे व्यक्ति के मुँह में से निवाला छीनकर खाने के बराबर है। कई सामाजिक संगठन और एनजीओ भी गरीबों को गरीबी से राहत दिलाने का दावा करते हैं, लेकिन इनमें से भी कुछ की नियत गरीबों के हित का खाने को दौड़ पड़ती है। इनके खिलाफ आवाज़ उठाने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि गरीब की आवाज़ उसके बोलने से पहले ही दबा दी जाती है।
एक समाज के रूप में, हमें गरीबों के संघर्षों को समझने और उनकी मदद करने की सख्त जरूरत है। हमें समझना ही होगा कि गरीबी सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं है, जिससे कोई व्यक्ति विशेष जूझ रहा है, बल्कि यह एक सामाजिक समस्या है, जो लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है। बेशक, भारत में गरीबी के खिलाफ लड़ाई बहुत लंबी और कठिन है, लेकिन नामुमकिन नहीं, हमें यह लड़ाई लड़नी ही होगी। हमें एक बेहतर और खुशहाल भविष्य की दिशा में काम करना होगा, ताकि कोई भी बच्चा भूखा न सोए, कोई भी माँ अपने बच्चों को सफल बनाने के लिए खुद को आर्थिक रूप से बेबस न समझे, कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति सरकारी योजनाओं से वंचित न हो और सबसे विशेष, कोई भी व्यक्ति गरीब न हो।