बिना सज़ा के ही सज़ा काट रहे हैं विचाराधीन कैदी..

भारतीय जेल में फैसले का इंतजार करते विचाराधीन कैदी

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ हर किसी को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है। भारत के संविधान और न्यायपालिका का भी यही मानना है कि भले ही कोई अपराधी सज़ा पाने से बच जाए, लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा न हो। लेकिन, विडंबना यह है कि इस लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना अपराध साबित हुए बिना, अंतिम निर्णय की राह देखते हुए ही सज़ा काट रहे हैं। ये लोग वे विचाराधीन कैदी हैं, जो फैसले का इंतजार करते हुए महीनों और सालों से हमारे देश की जेलों में बंद रहते हैं, और सज़ा की घोषणा के बिना ही सज़ा काट रहे हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, विचाराधीन कैदी वह होता है, जिस पर किसी अपराध का आरोप है, लेकिन उसे दोषी नहीं ठहराया गया है। उसे न्यायिक हिरासत में रखा गया है, जबकि उसके मामले की सुनवाई अदालत में चल रही है। हमारे देश की जेलों में बंद कैदियों में विचाराधीन कैदियों की संख्या दोषी कैदियों से भी ज्यादा है। आँकड़ें कहते हैं कि देश की जेलों में बंद कैदियों में करीब 70% विचाराधीन कैदी हैं। राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में, जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या लगातार बढ़ी है। इनमें से अधिकतर कैदियों पर छोटे-मोटे अपराध के आरोप हैं, जिन पर जमानत दी जा सकती है, लेकिन कोई सुनवाई ना होने के कारण यह महीनों और कभी-कभी तो सालों तक न्यायिक हिरासत के नाम पर कैद में रहते हैं और विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करते हैं।

हमारे देश की जेलों में विचाराधीन कैदियों के साथ भी एक अपराधी की तरह ही व्यवहार किया जाता है। इसके साथ ही विचाराधीन कैदीयों को शारीरिक दुर्व्यवहार, स्वास्थ्य समस्याएँ, कानूनी सहायता की कमी, सामाजिक कलंक का डर, परिवार द्वारा उपेक्षा जैसी हजारों परेशानियों से जूझना पड़ता है। उस पर देश की जेलों की स्थिति पहले ही खराब है। अधिकांश जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी हैं। भीड़भाड़ की स्थिति में कैदियों को सुरक्षित एवं स्वस्थ परिस्थितियों में रखने के लिये पर्याप्त जगह तक की कमी है। अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में लोग एक-दूसरे के साथ रहने को मजबूर हैं, जिससे वे भी संक्रामक और संचारी रोगों के शिकार हो जाते हैं।

अधिकांश कैदी कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ होते हैं, जिन्हें जमानत के नियमों और कानूनी दाँव-पेंचों का ज्ञान नहीं होता है। अज्ञानता की स्थिति में ये लोग कई बार छोटे-से अपराध के लिए भी लम्बे समय तक न्यायिक हिरासत के नाम पर कैद रहते हैं। साथ ही, यह अशिक्षा ही इन्हें अपराध की राह पर ले जाती है।

देखने में आता है कि कई बार ये विचाराधीन कैदी किसी छोटे-मोटे अपराध के आरोप में न्यायिक हिरासत में रखे जाते हैं और यहाँ रह रहे अपराधियों की संगत में रह कर बड़े और संगीन अपराध करना सीख जाते हैं।

विचाराधीन कैदी हमारे देश के ऐसे नागरिक हैं, जिन्हें अनदेखा और अनसुना कर दिया गया है और जो बिना दोष साबित हुए भी एक अपराधी का जीवन जीने को मजबूर हैं। क्या यह हमारी लोकतांत्रिक छवि के खिलाफ नहीं है? हमारा संविधान कहता है कि बिना दोष साबित हुए किसी भी नागरिक को कैद नहीं किया जा सकता, यह उसके मौलिक अधिकार का हनन है। तो फिर इन लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों? इन लोगों को भी तो इस दलदल से निकलने के लिए मदद मिलना चाहिए, ताकि ये लोग बिना दोष साबित हुए, सज़ा न पाएँ। इसके लिए राज्य सरकार, न्याय पालिका और जेल प्रशासन तीनों को ही विचार करने और सख्त बदलाव करने की जरुरत है।

जैसे न्यायपालिका को विचाराधीन कैदियों के मामले को जल्द से जल्द निपटाने पर गौर करना चाहिए, ताकि जो विचाराधीन कैदी रिमांड पर हैं, वे दोषी न पाए जाने की स्थिति में जल्द से जल्द बरी हो सकें और जीवन पर इसका दुष्प्रभाव पड़ने से खुद को रोक सकें। पाँच वर्ष से अधिक समय से लंबित छोटे-मोटे अपराधों से निपटने के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक न्यायालयों की स्थापना की जाना चाहिए। जेलों में भीड़भाड़ और उससे होने वाली अवांछित घटनाओं को कम करने के लिये तीव्र ट्रायल को अपनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही विचाराधीन कैदियों को कानूनी सलाह मुहैया कराना चाहिए। उन मामलों में ढील नहीं दी जानी चाहिए, जहाँ गवाह मौजूद हों या जिसमें आरोपी कम सज़ा के बदले अपराध स्वीकार करने को तैयार हो।

जेल प्रशासन को विचाराधीन कैदियों के साथ दोषी जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्हें दोषियों की तुलना में भोजन, कपड़े, पानी, चिकित्सा सुविधाएँ, स्वच्छता, मनोरंजन और रिश्तेदारों तथा वकीलों के साथ मिलने आदि की बेहतर सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए। साथ ही विचाराधीन कैदियों को दोषी कैदियों से अलग रखा जाना चाहिए। उन्हें रिमांड के दौरान शिक्षा या किसी कौशल का ज्ञान देना चाहिए, जिससे वे फिर से आपराधिक गतिविधि में पड़ने के बजाय अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

विचाराधीन कैदियों की स्थिति पर विचार किया जाना बेहद जरुरी है, ताकि देश के किसी भी नागरिक के साथ अन्याय न हो। साथ ही, अपराधियों की संख्या में कमी करने के लिए भी विचाराधीन कैदियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। हमें इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है कि कैसे विचाराधीन कैदियों को इस भेदभाव और अन्याय से बचाया जा सकता है।

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