समाज की दिखावटी सुविधाओं की ऊँची-ऊँची दीवारों के पीछे, दर्द और पीड़ा की एक छिपी हुई दुनिया है। यह दुनिया है जेल के कैदियों की, जो एक गलती के लिए सज़ा के अंतहीन चक्र में फंसे हुए हैं। समाज के मायने में एक अपराध के लिए एक ही सज़ा होती है। हमें भी बस इतना ही दिखता है कि किसी अपराधी को उसके द्वारा किए गए गुनाह के लिए कुछ सालों की सज़ा हुई है, जिसके भुगतान के रूप में उसे कुछ माह या साल जेल में बिताने हैं और फिर सज़ा पूरी होने पर रिहा हो जाना है। लेकिन, एक कैदी के नज़रिए से देखा जाए, तो यह बस इतनी-सी ही बात नहीं है। कैदियों को जेल में लगातार उत्पीड़न और शारीरिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें मिली कानूनी सज़ा से कहीं अधिक डरावना होता है। यह एक ऐसी घिनौनी दुनिया है, जहाँ एक इंसान की गरिमा तक छीन ली जाती है, और सुधार के नाम पर हाथ लगती है, तो सिर्फ क्रूरता।
मेरे एक परिचित से ही मैंने यह घटना सुनी थी कि उसके गाँव में राहुल नाम का एक युवक रहता था। गाँव में कोई कमाई न होने और खुद भी पढ़ा लिखा न होने के कारण, परिवार चलाने के लिए वह छोटी-मोटी चोरी-चकारी किया करता था। इस चोरी चकारी के लिए उसने इतनी बड़ी सज़ा पाई की उसका पूरा जीवन बर्बाद हो गया। चोरी के अपराध में जब राहुल को पकड़ा गया, तो उसे कुछ महीनों की जेल हुई। गाँव वाले भी कुछ दिनों तक यह बात करके भूल गए कि उसे उसके किए की सज़ा मिली है। लेकिन, राहुल के लिए यह सज़ा किसी डरावने सपने की शुरुआत थी।
जेल के अंदर राहुल को एक ऐसी हकीकत का सामना करना पड़ा, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जिन लोगों को वहाँ व्यवस्था बनाए रखने के लिए रखा गया था, वो ही उसकी जान के दुश्मन बन चुके थे। शारीरिक शोषण जैसे उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। पिटाई केवल अनुशासन का तरीका ही नहीं, बल्कि कुछ जेल कर्मचारियों के लिए मनोरंजन का एक विकृत रूप था। फिर राहुल के शरीर पर चोट के निशान अपनी एक अलग ही कहानी बयां करते थे, जो उसके द्वारा सहन की गई हिंसा का मूक प्रमाण थे। सिर्फ मार-पिट ही एक समस्या नहीं थी, जेल में हर दिन उसे मानसिक यातनाएँ भी झेलना पड़ती थीं।
अकेलापन, धमकियाँ और लगातार अपमान ने उसकी आत्मा को छिन्न-भिन्न करके रख दिया। अन्य कैदियों द्वारा हमला किए जाने व गार्ड्स द्वारा और अधिक दुर्व्यवहार किए जाने का डर उसके मन में घर करता जा रहा था। राहुल की रातों की नींद हराम हो गई थी। मन को रौंदती पिटाई की भयावह झलकियाँ और हमले की लगातार धमकियाँ उसकी नींद और सुकून को अपने साथ ले जा चुकी थीं। जेल का दमनकारी माहौल और उसकी ठंडी व संवेदना-शून्य दीवारें राहुल के निराशा भाव में चिंगारी छोड़ने के सिवाए कुछ भी न कर रहे थे।
मानवीय गरिमा और सम्मान की कमी ने उनके मन पर ऐसे गहरे घाव छोड़े, जो फिर कभी नहीं भरे। पहले दिन जेल में कदम रखने वाले राहुल की जगह वह धीरे-धीरे एक टूटी हुई छाया, आघात से ग्रस्त और आशा से रहित एक जिन्दा लाश बनकर रह गया था। एक छोटी-सी चोरी के लिए यह सज़ा कितनी ज्यादा थी, ज़रा आप ही सोचिए..
जेल में कुछ समय की यह सज़ा, जो किसी का पूरा जीवन बर्बाद कर देती है, इस पर समाज का दृष्टिकोण अक्सर अदालत कक्ष और न्यायाधीश द्वारा सुनाई गई सज़ा तक ही सीमित होता है। जबकि, जेल की दीवारों के अंदर की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। राहुल जैसे हजारों-लाखों कैदियों को एक गुनाह के लिए न जाने कितनी ही सज़ा भुगतना पड़ता है, जो उनकी कानूनी सज़ा से कहीं ज़्यादा भयानक होती हैं। उनसे उनकी मानवता छीन ली जाती है, उनके साथ इंसान की तरह नहीं, बल्कि संख्याओं के रूप में व्यवहार किया जाता है, और उन्हें सत्ता में बैठे लोगों की सनक के अधीन कर दिया जाता है। जेल प्रणाली के भीतर अन्य खतरनाक अपराधियों का आतंक इस बिगड़ी हुई स्थिति को और भी बदतर कर देता है।
खूँखार अपराधियों द्वारा सामूहिक हिंसा, जबरन वसूली और मजदूरी कराना आम बात है, जिससे कमजोर कैदियों के लिए अपने अस्तित्व बचाना रोज की लड़ाई बन जाती है। जेल एक जंगल बन जाता है, जहाँ केवल सबसे मजबूत या सबसे क्रूर व्यक्ति ही पनप सकता है। ऐसे में, राहुल जैसा व्यक्ति जो दोनों में से कुछ नहीं है, इस जंगल के भीतर डर के माहौल में अंदर ही अंदर मरता जाता है। हम समझते ही नहीं हैं कि वे स्वाभाविक रूप से बुरे नहीं हैं, बल्कि अपने आस-पास के वातावरण और परिस्थितियों के कारण मजबूर हैं। उनके साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करके हम उन्हें केवल निराशा और आक्रोश की खाई में धकेलने का काम करते हैं।
रिहाई के बाद बाहर आने पर भी ये लोग अपने कैद के डरावने अनुभव को साथ लेकर निकलते हैं। उनके मन में घर कर चुका आघात और कड़वाहट उन्हें फिर से समाज में फिर अपनी जगह बनाने ही नहीं देते। ऐसे में, बहुत-से लोग एक बार फिर अपराध की ओर ही लौट जाते हैं।
बेशक, अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि इस समझ से कि अब वे समाज में रहने लायक नहीं हैं। समाज से समर्थन और समझ की कमी ही उनकी दुर्दशा को बढ़ाती है।
राहुल की कहानी हमारी जेल प्रणालियों के भीतर अनदेखी और अक्सर नज़रअंदाज की गई पीड़ा की एक मार्मिक याद दिलाती है, जो मेरे मन में अक्सर एक प्रश्न खड़ा करती है कि एक अपराध के लिए एक व्यक्ति को आखिर कितनी सज़ा भुगतना होगी? इसका उत्तर सज़ा के रूप में जेल की चक्की पीसने में नहीं, बल्कि सलाखों के पीछे सही गई अनगिनत पीड़ाओं में है। मेरा मानना है कि हर व्यक्ति गलतियों के बावजूद मुक्ति का मौका पाने का हकदार है। सच्चा न्याय दर्द देने में नहीं है, बल्कि उन लोगों को सही राह पर लाने और नई आशा देने में है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।