जिंदगियों को खत्म करता अपराध का जाल..

उभरते हुए भारत की एक अनदेखी वास्तविकता है भारतीय जेलों की दमनकारी दुनिया…. जेलों की शुरुआत करने का मूल उद्देश्य सुधार और पुनर्वास करना था, लेकिन दुःखद रूप से यह अपराध को जन्म देने वाले केंद्र में तब्दील हो चुकी हैं। ऊँची-ऊँची दीवारों के भीतर की परिस्थितियाँ न केवल आपराधिक व्यवहार को कायम रखती हैं, बल्कि लोगों को अपराध के चक्र में लगातार फँसाती भी चली जाती हैं। इस चंगुल में वो ऐसे फँसते चले जाते हैं कि फिर कभी सामान्य जीवन की कल्पना तक नहीं कर पाते हैं।

भारतीय जेलों का जिक्र आते ही दिमाग में भीड़भाड़ वाली कोठरियों, अपर्याप्त सुविधाओं और बुनियादी मानवाधिकारों की भारी कमी की छवि सामने आती है, जिसमें अत्यधिक भीड़-भाड़ शायद सबसे अहम् मुद्दा है। आधिकारिक आँकड़ों से पता चलता है कि भारत की अधिकांश जेलें 100% से भी अधिक क्षमता पर भरी हुई हैं। कुछ राज्यों में तो यह दर 200% तक भी है, जिससे कैदियों को अमानवीय परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऐसा वातावरण न केवल तरह-तरह की बीमारियों को जन्म देता है, बल्कि हिंसा और अपराध की पाठशाला भी बन जाता है। इन भीड़भाड़ वाली कोठरियों में सुरक्षा और गोपनीयता एक दूर का सपना है।

वह कहावत है न “संगत से गुण होत है, संगत से गुण जाय..” इसका जीवंत उदाहरण आप जेलों में देख सकते हैं, जहाँ जाने के बाद एक अच्छा भला इंसान भी हिंसक बनकर ही बाहर निकलता है। यहाँ के हालात ही कुछ ऐसे होते हैं। पेशेवर और खूँखार अपराधियों की संगत में रहने से यह स्थिति और भी बदतर हो जाती है। ये अपराधी कमजोर कैदियों के साथ मार-पीट और दुर्व्यवहार करते हैं, जिससे कमजोर कैदियों के मन में बुरी भावनाएँ पनपने लगती हैं। जेल की इन क्रूर परिस्थितियों में जीवित रहने की आवश्यकता कई लोगों को हिंसक अपराधियों के साथ गठबंधन बनाने, व्यापार की नई चालें सीखने और उसी जीवनशैली में फँसने के लिए मजबूर कर देती है, जिससे वे बचना चाहते थे।

इस जाल में फँसने के बाद फिर से सामान्य जीवन की शुरुआत करना उनके लिए केवल एक सपना रह जाता है।

रिहा होने के बाद लंबे समय तक कैद में रहने का कलंक उन पर लगा रहता है, जिससे रोजगार मिलना और समाज में जगह बना पाना एक कड़ी चुनौती बन जाती है। समाज की ओर से अस्वीकृति और समर्थन प्रणालियों की कमी कई पूर्व कैदियों को आपराधिक जीवन में लौटने के लिए मजबूर कर देती है। यह एक दुष्चक्र बनाने का काम करता है, जिसे तोड़ना मुश्किल हो जाता है।

जेल से रिहा होते समय वे केवल एक जोड़ी कपड़े और सलाखों के पीछे बिताए समय की भयावह यादों के अलावा कुछ भी लेकर नहीं निकलते। उनके पास न तो कोई सहयोग होता है, जिससे वे अपना जीवन फिर से शुरू कर सकें और न ही ऐसी कोई जगह होती है, जिसे वे घर मान सकें या सुकून के दो पल गुजार सकें। बाहरी दुनिया की दौड़ धूप में उन्हें कोई ठिकाना नहीं मिलता। यह अकेलापन उन्हें फिर से अपराध की ओर ले जाता है। स्थिति और बदतर इसलिए भी है कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली पुनर्वास की तुलना में अधिक दंडात्मक है। सुधार और पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित करने के बजाए, व्यवस्था दंड की ओर अधिक झुकती है, जिससे व्यक्ति समाज से और भी अलग हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव के युवक रमेश की कहानी को ही ले लें। एक छोटी-सी चोरी के आरोप में उसे गिरफ्तार कर राज्य की भीड़भाड़ वाली जेल और हिंसक माहौल में डाल दिया गया। वहाँ बिताए समय ने उसे एक छोटे चोर से एक हिंसक अपराधी बना दिया। साथ ही उसकी रिहाई होने पर, उसके जेल के रिकॉर्ड के कलंक के कारण उसे फिर कहीं काम नहीं मिला और फिर न चाहते हुए भी उसे चोरी-चकारी को ही अपना घर चलाने के लिए सहारे के रूप में लेना पड़ा। कोई अन्य विकल्प न होने के कारण, रमेश फिर से आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो गया और फिर जेल लौट आया। उसकी कहानी अनोखी नहीं है; यह इस न खत्म होने वाले चक्र में फँसे अनगिनत लोगों की कहानी है।

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले, जेलों के भीतर स्थितियों को सुधारने के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। बेहतर न्यायिक प्रथाओं, जैसे तुरंत सुनवाई और छोटे अपराधों के लिए जमानत और पैरोल के बढ़ते उपयोग की मदद से भीड़भाड़ को कम किया जा सकता है। रहने की स्थिति में सुधार करना तथा भोजन, स्वच्छ पानी और स्वास्थ्य देखभाल जैसी बुनियादी जरुरतें मुहैया कराना सबसे जरुरी है। पुनर्वास कार्यक्रम भी महत्वपूर्ण है। जेलों के भीतर शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण कैदियों को रिहाई पर रोजगार सुरक्षित करने के लिए आवश्यक कौशल प्रदान कर सकता है। इसके साथ ही, मनोवैज्ञानिक परामर्श और सहायता सेवाएँ उन आघात और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान करने में मदद कर सकती हैं, जिनका सामना कई कैदी करते हैं। सजा के बजाए पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित करके, जेल प्रणाली अपराध के चक्र को तोड़ सकती है।

रिहाई के बाद समाज का समर्थन भी उतना ही जरुरी है। पूर्व कैदियों को समाज में फिर से जगह बनाने लिए आवास, रोजगार के अवसरों और सामुदायिक समर्थन की आवश्यकता होती है। गैर-सरकारी संगठनों और सरकारी एजेंसियों को इन जरूरतों को पूरा करने के लिए पुनर्स्थापन कार्यक्रम बनाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

भारत की जेलों को अपराध केंद्रों से सुधारगृहों में बदलना कोई छोटा काम नहीं है, लेकिन यह आवश्यक है और इसे साकार भी किया जा सकता है। जेल प्रणाली के भीतर अपराध के मूल कारणों को समझकर और उनका समाधान करके ही हम इस दुष्चक्र को खत्म कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति आजादी और सम्मान का जीवन जीने का हकदार है। अब समय आ गया है कि सलाखों के पीछे बंद लोगों के लिए भी सोचा जाए। इसके लिए उन्हें हर तरह की मदद दी जाए। करुणा और सुधार के साथ, हम स्थिति को बदल सकते हैं और एक ऐसी न्याय प्रणाली बना सकते हैं, जो वास्तव में निष्पक्षता, पुनर्वास और आशा के मूल्यों को कायम रखती हो। हमारी जेलों की स्थिति हमारे समाज के मूल्यों को दर्शाती है। जो लोग भटक गए हैं, उनके जीवन को एक नए सिरे से शुरू करने में मदद करके, हम सभी के लिए अधिक न्यायपूर्ण और करुणा से भरी दुनिया बना सकते हैं।

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