देश की महिला सशक्त है: मूर्त वास्तविकता या महज़ एक भ्रम?

भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण की हकीकत दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य, जहाँ सपने, जिम्मेदारियाँ और असमानता साथ-साथ दिखाई देती हैं

महिला सशक्तिकरण, नारीवाद और समान अधिकारों की तलाश एक अरसे से बाट निहार रही है कि उसे हमारे समाज के किसी कोने में थोड़ी-सी ही सही, लेकिन जगह मिल जाए। हालाँकि, इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमने पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने में निर्विवाद रूप से प्रगति की है, लेकिन इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि यह आज भी वास्तविक समानता से कोसों दूर है। जब भी मैं महिलाओं के जीवन के जटिल और उलझे हुए कशीदे पर विचार करता हूँ, मेरे मन-मस्तिष्क में भावनाओं का भयानक सैलाब उमड़ पड़ता है। महिलाओं की सशक्तता, उनकी अटूट शक्ति की खूबसूरती और सपनों की निरंतर तलाश में प्रेरणा को देखकर हर कोई आश्चर्य चकित हो जाता है। लेकिन इस बात पर बहुत कम ही लोग जोर देते हैं कि ये भावनाएँ गहरे दुःख से भरी हुई हैं, क्योंकि यह महसूस करना काफी निराशाजनक है कि समय के पहिए के आगे बढ़ने और हजारों रूढ़ियों के टूटने के बावजूद, कई महिलाएँ आज भी ऐसी हैं, जो अधीनता के दायरे में रहने को मजबूर हैं।

यह एक मार्मिक विरोधाभास है कि कई महिलाओं का जीवन शुरू से लेकर अंत तक आत्म-बलिदान के कच्चे धागों से बुना हुआ होता है। उनकी आकांक्षाएँ और इच्छाएँ सामाजिक अपेक्षाओं, पारिवारिक दायित्वों, ससुराल वालों के प्रभाव और उनके रिश्तों की गतिशीलता के जटिल जाल में इस कदर उलझ जाती हैं कि फिर उन्हें सुलझा पाना लगभग नामुमकिन ही होता है। अपने जीवन में कुछ पाने और सपने बुनने वाली महिलाएँ कई मामलों में समय के साथ अपने दृष्टिकोण को बदला हुआ पाती हैं, जिम्मेदारियों के बोझ के तले वे अपने लक्ष्यों को बदला हुआ पाती हैं, और उनके नियंत्रण से परे अनगिनत स्थितियों के कारण अपनी आवाज़ को चुप-चाप गूँगा होते हुए देखती हैं। मुझे यह बोलने में थोड़ी भी झिझक नहीं है कि अपने अरमानों और सपनों को चाहकर भी पूरा न कर पाने की टीस से एक औरत एक दिन में कई-कई मौत मरती है, और अपने सामने पड़ी हजारों जिम्मेदारियों को देखकर हर बार उठ खड़ी होती है।

कई घरों में यह कड़वी हकीकत आज के मॉडर्न ज़माने में भी कायम है, जहाँ महिलाएँ हर दिन अपनी इच्छाओं की बलि चढ़ती हुई देख चुप-चाप कड़वा घूट पीकर रह जाती हैं। एक ऐसी हकीकत, जहाँ बेटियों को बोझ के रूप में देखा जाता है, और जैसे ही वे 18 वर्ष का पड़ाव पार करती हैं या करने वाली होती हैं, उन्हें शादी के बंधन में बाँध दिया जाता है, फिर भले ही मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हों या नहीं। यह वह उम्र होती है, जहाँ माना जाता है कि एक लड़की अपने निर्णय खुद लेने के लिए समझदार और सायानी हो गई है।

लेकिन हमारे समाज को बेटियों की खुशियाँ शायद रास नहीं आती हैं, जब ही तो इतनी कम उम्र में ससुराल वालों को उन पर हुकूमत चलाने के लिए छोड़ दिया जाता है। यहाँ तक ​​कि जिन परिवारों में लड़कियाँ शिक्षा प्राप्त करती हैं, वहाँ भी कई दफा उड़ान भरने से पहले ही उनके पंखों को काट दिया जाता है, और उन्हें पिंजरे में कैद कर अपने लड़की के रूप में जन्म लेने पर पश्चाताप करने के लिए छोड़ दिया जाता है। उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने, अपनी आजीविका स्वयं बनाने, अपने सपनों को जीने और अपनी आकांक्षाओं की ओर बढ़ने के अवसर से वंचित कर दिया जाता है और आजीवन दूसरों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। कोई अपने दुश्मन से भी इतना कड़ा बदला नहीं लेता होगा, जितना हमारे समाज में बेटियों और महिलाओं से लिया जाता है, क्योंकि हमारे समाज में उन्हें बिना मारे हर दिन मौत की नींद सुला दिया जाता है। इन परिस्थितियों में, कई माता-पिता अपनी बेटियों के भाग्य के निर्माता बन जाते हैं।

वे न सिर्फ यह तय करते हैं कि उन्हें किन विषयों का अध्ययन करना चाहिए, बल्कि उनकी रुचियों को भी वे ही निर्धारित करते हैं और यहाँ तक ​​कि उनके करियर विकल्पों को भी वे ही तय करते हैं। अक्सर, सुरक्षित करियर की अवधारणा उन पर जबरदस्ती थोप दी जाती है और उनके सपनों की दुनिया पर मिट्टी डाल दी जाती है और इसे परंपरा के रंग में रंग कर इसकी चादर उन्हें ओढ़ा दी जाती है। किसी जलते कागज़ की तरह यह दमनकारी नियंत्रण उनके जीवन के सभी पहलुओं को जलाकर राख कर देता है। यह एक ऐसा ढर्रा है, जो उनके व्यक्तित्व पर अंकुश लगा देता है और तेजी से पनपती क्षमता को किसी कीड़े-मकोड़े की तरह पैरों तले रौंद देता है।

उन महिलाओं के मामले में, जो पहले से ही कार्यबल में हैं, यानि घर के साथ ही साथ कामकाज भी संभालती हैं, जब वे विवाह के बँधन में बँधती हैं, तो उनके लिए उनके जीवन की यात्रा और भी अधिक कठिन हो जाती है। उनके सामने या तो ‘नई ज़िम्मेदारियों’ के नाम पर अपनी कड़ी मेहनत से अर्जित करियर को त्यागने की चुनौती होती है या फिर पत्नी के रूप में उनकी भूमिकाओं को निभाने के तहत उनके नए अवसरों की तलाश कफन ओढ़ कर बैठ जाती है।

और फिर जब जीवन मातृत्व की तरफ रुख करता है, तो जिम्मेदारियाँ और भी अधिक बढ़ जाती हैं, क्योंकि बच्चे का लालन-पालन भी तो उन्हें ही करना होता है और फिर अच्छी परवरिश भी तो उन्हें ही देना होती है। नौकरी, घर, जीवनसाथी और बच्चों की जिम्मेदारी व उनकी माँगों को पूरा करने में वे खुद को खो बैठती हैं और सिर्फ उन्हीं के लिए जीना सीख जाती हैं, उस मिट्टी पर पानी डालकर, जिस पर उन्होंने अपने सपनों के, अपने अरमानों के बीज बोए थे। उनके पास अपने व्यक्तिगत विकास और वृद्धि के लिए बहुत ही संकुचित जगह बचती है, जिसे वे किसी से एक भी शिकायत किए बिना बड़ी ही शालीनता से जीवन पर्यन्त निभाए चली जाती हैं। अपने परिवार को प्यार की भरमार देने के बावजूद इसके पालन-पोषण की भारी जिम्मेदारियाँ एक महिला को अक्सर व्यक्तिगत आकांक्षाओं की कीमत देकर चुकाना होती हैं।

महिलाओं को अक्सर अपने सपनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच चयन करने के लिए मार्मिक दुविधा का सामना करना पड़ता है। यह एक ऐसा सामाजिक मुद्दा है, जो गहरी जड़ें जमा चुका है। पारंपरिक लिंग भूमिकाओं, स्थायी रूढ़िवादिता और अवसरों की ऐतिहासिक कमी के कारण बनी यह दुर्दशा महिलाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी परेशान करती रही है। हालाँकि, परिवर्तन की बयार भी लगातार चल रही है, जो कई महत्वपूर्ण कारकों से प्रेरित है।

शुरुआत करने के लिए, लैंगिक समानता की लहर चलाना बहुत जरुरी है। महिलाओं को उनकी आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक उपकरण, शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अवसरों के साथ सशक्त बनाना आवश्यक है। जिम्मेदारियों को साझा करने और महिलाओं की महत्वाकांक्षाओं का उत्साहपूर्वक समर्थन करने के लिए परिवारों और भागीदारों को प्रोत्साहित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक ऐसे वातावरण को बढ़ावा देना जरुरी है, जहाँ पुरुष और महिलाएँ ट्रैन की पटरी के समान साथ-साथ चलें और संयुक्त रूप से घर की देखभाल की जिम्मेदारियाँ निभाएँ। इसके साथ ही, कार्यस्थलों को भी चाहिए कि वे महिलाओं के लिए अधिक समावेशी और मिलनसार बनें। कार्य-जीवन संतुलन को बढ़ावा देने वाली नीतियों को लागू करना यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक बुनियादी कदम है कि महिलाओं को अब अपने सपनों और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच कष्टदायक विकल्प नहीं चुनना पड़ेगा। इसका परिणाम एक ऐसी दुनिया का वादा करता है, जहाँ महिलाएँ बिना किसी समझौते के अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकें।

अपेक्षा और बलिदान के रंगों में रंगे ये किस्से, हमारे सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन की आवश्यकता को उजागर करते हैं। यह एक ऐसी दुनिया के लिए कार्रवाई का आह्वान है, जहाँ बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि उम्मीद की किरण हैं, जहाँ उनके सपनों को उतना ही महत्व दिया जाता है, जितना की बेटे के सपनों को, जहाँ उनके अरमानों को संजोया जाता है और उनकी आकांक्षाओं को प्रोत्साहित किया जाता है।

यह एक ऐसी दुनिया के लिए प्रार्थना है, जहाँ महिलाएँ बिना किसी डर के अपने पंख फैला सकें, ऊँची उड़ान भर सकें, अपने चुने हुए रास्ते पर आगे बढ़ सकें और एक ऐसे जीवन का अनुभव कर सकें, जो उनकी पसंद से परिभाषित हो, न कि परेशानियों और बाधाओं से।

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