डस्टबिन खा रहा लोगों का खाना

डस्टबिन बनाम भूखे बच्चे – भारत की कड़वी सच्चाई

कल दोपहर मैं एक होटल में खाना खाने गया था। मेरी टेबल के पास बैठे कुछ लोग दिखाई दिए, जिन्होंने बहुत सारा खाना मंगवाया था। लेकिन जब वे लोग होटल से गए, तो उनकी प्लेटों में ढेर सारा खाना बचा हुआ था। मेरा दिल बड़ा दुखा, जब मैंने देखा कि वेटर बिना सोचे-समझे उस सारे खाने को कूड़ेदान में फेंक रहा है। 

हाय! कोई इतना निर्दयी आखिर कैसे हो सकता है। अपनी आँखों से भोजन की इस बर्बादी के देख सच में मेरा दिल ही कचोट गया। मेरे विचार उन दो बच्चों की ओर चले गए, जिनसे मैं कुछ दिन पहले एक ट्रैफिक सिग्नल पर मिला था। एक लड़का था मुश्किल से 8 या 9 साल का और उसकी छोटी बहन 3 या 4 साल की थी, जो साफ तौर पर कुपोषित दिखाई पड़ रहे थे। छोटी-सी मासूम बच्ची की भूख की तड़प और आँसू बेहद दर्दनाक थे और उसका भाई, जो अपनी उम्र से बहुत बड़ा दिखता था, उसे चुप कराने की नाकाम कोशिश कर रहा था। उनकी खाली आँखें और कमजोर शरीर, और दूसरी तरफ इतना सारा खाना बेवजह फेंक दिया जाना, यह सब मेरे दिल में गहरी चोट कर गया। मन में बस यही पीड़ा बरबस उठती थी कि एक ओर भोजन कुड़े कचरे की तरह फेंका जा रहा है और दूसरी तरफ जरूरतमंद लोग अपना पेट भरने को तरस रहे हैं। डस्टबिन भी भूखा होता है क्या, जो इसका पेट भरने की चिंता लोगों में अधिक है।

मैंने कुछ देर तक उन्हें देखा और फिर पास जाकर बात करने की कोशिश की। लड़के ने मुझे संकोच से देखा और अपनी बहन को कसकर पकड़ लिया। जब मैंने पूछा कि वह इतनी देर से क्यों रो रही है, तो उसने पहले कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। कुछ क्षणों की खामोशी के बाद, उसने धीरे-धीरे उनकी कहानी बताई। वे पास ही की एक झुग्गी बस्ती में रहते थे और छोटी लड़की रो रही थी क्योंकि वह भूखी थी, उन्होंने पिछली रात से कुछ भी नहीं खाया था। उनकी माँ भोजन की तलाश में बाहर गई थी, लेकिन अभी तक वापस नहीं आई थी।

उनकी हालत देखकर, मुझे सुबह का नाश्ता भारी लगने लगा। मैंने उन्हें पास की एक बेंच पर बिठाया और अपनी माँ द्वारा प्यार से पैक किया हुआ लंच उन्हें दिया। जैसे ही उन्होंने खाना शुरू किया, छोटी लड़की की चीखें शांत हो गईं और लड़के के चेहरे पर राहत साफ देखी जा सकती थी। भोजन बिटिया के पेट तक पहुँचा था, लेकिन पेट वास्तव में भरा उस कम उम्र के सबसे समझदार बच्चे का था। समझदारी क्या होती है यह मैं सच-मुच उस दिन जान पाया था।

लेकिन जिस बात ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया, वह था उसके आँखों में हुआ बदलाव। कुछ क्षण पहले, वे आँखें खाली और उदास थीं, लेकिन अब उनमें आँसू थे-शुक्रगुज़ारी के आँसू। दोनों मासूम फूट-फूट कर रोए। उसने मुझे इस तरह देखा, जैसे मैंने उसे उसके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा दे दिया हो। उसने मुझे तहे दिल से धन्यवाद् दिया और अपनी बहन के साथ चला गया।

आज, जब मैंने इतनी मात्रा में खाना बर्बाद होते देखा, तो मुझे बहुत अफसोस हुआ। उन दो बच्चों को खाना नहीं मिल रहा था, वे भूखे थे और यहाँ इतने सारे होटलों और बड़े आयोजनों में खाना बर्बाद हो रहा था। ऐसा लगा जैसे मानवता धीरे-धीरे मर रही है, सिर्फ और सिर्फ लोगों की उदासीनता और लापरवाही की वजह से। यह हमारी दुनिया में मौजूद भीषण असमानताओं की एक याद दिलाने वाली घटना थी, जहाँ एक तरफ बहुतायत है और दूसरी तरफ भूख, लेकिन ये दोनों स्थितियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।

हम प्रगति की बात करते हैं, लेकिन क्या वास्तव में हमने प्रगति की तरफ एक कदम भी आगे बढ़ाया है? जब छोटे बच्चे भूखे पेट सोने को मजबूर होते हैं, क्या यह प्रगति है? जब सही भोजन पाने का अधिकार किसी की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है, क्या यह प्रगति है? जब हर दिन न जाने कितने ही लोग भूख से मर जाते हैं, क्या यह प्रगति है? दुनिया भर की जानकरी देने वाले गूगल भैया भी सटिक डेटा नहीं दे पाएँगे, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ। सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि इसमें छोटे बच्चे भी शामिल होते हैं, जो यह भी नहीं समझ पाते कि उन्हें भूखा क्यों रहना पड़ता है? और उनकी इस तड़प की वजह क्या है? सत्य से अनजान वे मासूम चुप चाप मौत की नींद सो जाते होंगे बिना एक शिकायत के। जरा सोचिए यदि उन्हें पता हो कि उनकी यह हालत भूख की वजह से है और उनके हिस्से का खाना भर पेट और कोई नहीं बल्कि, डस्टबिन खाता है तो उनका मन कितना कचोटता होगा और भीतर ही भीतर क्या कुछ नहीं कहता होगा उन लोगों को, जिन्हें उन मासूमों से अधिक चिंता उस डिब्बे की है। इतनी चिंता कि उसका पेट गले तक भर जाता है, तब भी थोड़ा और थोड़ा और कहकर उसे खिलाए जाते हैं।

हम अपने आप को उन्नत कैसे कह सकते हैं जब मासूम जीवन कुछ बुनियादी चीज़ जैसे कि भोजन के कारण खो जाते हैं?

कई योजनाएँ भूख से लड़ने के लिए चल रही हैं, लेकिन उनका पालन कौन कर रहा है? भूख से मरने वाले लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है?

समाज का हिस्सा होने के नाते, यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन लोगों के लिए प्रयास करें, जो हमसे कम भाग्यशाली हैं। हम अकेले अपने देश से भूख को समाप्त नहीं कर सकते, लेकिन यदि हम सब मिलकर प्रयास करें, तो हम एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

जिस दिन कोई भी बच्चा भूखा पेट नहीं सोएगा, वही दिन हमारी सच्ची प्रगति का दिन होगा। सच्ची प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं मापी जाती, बल्कि उस करुणा और देखभाल से मापी जाती है जो हम अपने सबसे कमजोर लोगों को प्रदान करते हैं। आइए हम सब मिलकर काम करें, ताकि किसी को भी, विशेष रूप से किसी बच्चे को भूख का दर्द न सहना पड़े। डस्टबिन की जगह बच्चों को खाना खिलाएँ, यकिन मानिए सुकून का स्तर सातवें आसमान पर होगा। दुआएँ आखिरकार मासूमों से ही मिलेंगी, प्लास्टिक या लोहे के उस डिब्बे से नहीं। बात पते की है और बहुत गहरी है, सोचिएगा जरूर।

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