इंटरनेट पर गरीबी की खबरों और इससे जुड़े आँकड़ों की बाढ़ आई पड़ी है। कुछ खबरें दावा करती हैं कि भारत से गरीबी बीते कुछ सालों या दशकों में अच्छी खासी मात्रा में कम हुई है, जबकि कुछ खबरें लम्बे-चौड़े आँकड़ों के साथ इस बात की पुष्टि करती हैं कि देश से भुखमरी गुड़ पर मक्खी की तरह चिपकी बैठी है, जो खत्म तो दूर, थोड़ी बहुत कम होने का भी नाम नहीं ले रही है। अब सवाल यह उठता है कि इंटरनेट पर मौजूद इन तमाम तथ्यों में से सत्य माना किसे जाए?
गलत खबरों के लिए फैक्ट चेक का सोशल मीडिया पर इन दिनों बड़ा ही बोलबाला है। एक छोटी-सी खबर भी यदि गलत वायरल हो जाए, तो उससे भी अधिक वायरल हो जाता है वह स्क्रीन शॉट, जो फैक्ट चेक की लाल मोहर से उस खबर विशेष की सच्चाई को साबित करता नज़र आता है। मैं यहाँ पूछना चाहता हूँ कि यही फैक्ट चेक गरीबी के आँकड़ों पर क्यों नहीं लगाया जाता?
आप कोई भी लिंक खोल लीजिए, हर लिंक गरीबी की अलग कहानी सुनाती मिल जाएगी, फिर भले ही वास्तविकता से इसका कोई लेना-देना नहीं होगा.. यदि फैक्ट चेक नहीं कर सकते, तो फिर फिल्मों के शुरू होने के पहले जो संदेश दर्शकों की जानकारी के लिए पेश किया जाता है, वह उन लेखों के आखिर में भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जो गरीबी के तथ्यों पर अलग-अलग बात करते हैं। संदेश भी बताए ही देता हूँ, “इस फिल्म के पात्र और घटनाएँ पूरी तरह काल्पनिक हैं, वास्तविकता से इनका कोई लेना-देना नहीं है।” यहाँ फिल्म, पात्र और घटनाओं की जगह गरीबी, आँकड़ें और तथ्य लगा लीजिए, बाकि समझदार को इशारा काफी..
वर्ष 2023 में नीति आयोग द्वारा एक रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें कहा गया था कि भारत में गरीबों की संख्या में 9.89 प्रतिशत तक की कमी आई है। जहाँ 2015-16 में यह संख्या 24.85 प्रतिशत थी, वहीं 2019-21 में कम होकर यह 14.96 प्रतिशत रह गई। ऐसे में, 2015 से 2021 के बीच रिकॉर्ड 13.5 करोड़ लोग गरीबी की गर्त से बाहर निकले हैं।
इंटरनेट को और खँगालने पर उपरोक्त आँकड़ों से बिल्कुल अलग-थलग आँकड़ें मिलते हैं, जो दावा करते हैं कि पिछले 9 सालों में 24.82 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। अब बताइए, आप किसे साथ मानेंगे? अमेरिकी थिंक टैंक ब्रुकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब महा गरीबी से पूरी तरह बाहर निकल चुका है।
इसके उलट, वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2024 में भारत के करीब 12.9 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जीवन बिताने को मजबूर हैं, जो प्रतिदिन 181 रुपए यानि 2.15 डॉलर से भी कम कमाते हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के ‘ऑक्सफर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव’ की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में एक अरब से भी ज्यादा लोग अमानवीय हालात में जी रहे हैं। यूएनडीपी और ऑक्सफर्ड द्वारा जारी किए गए इंडेक्स के अनुसार, 110 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जी रहे हैं, जिनमें से आधे से अधिक पाँच देशों में रहते हैं।
बेशक, यहाँ आपके मन में यह सवाल आया होगा कि ये पाँच देश कौन-से होंगे? और होंगे भी तो कौन-सा हमारे भारत का नाम इसमें आना है.. आप ताज्जुब में पड़ जाएँगे, जब आपको पता चलेगा कि इन पाँचों देशों में सबसे पहला नाम हमारे भारत का ही है। और थोड़े बहुत आँकड़ों के साथ नहीं, बल्कि अच्छे खासे अंतर के साथ हम इस इंडेक्स में पहले नंबर पर हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि भारत में 23.4 करोड़, पाकिस्तान में 9.3 करोड़, इथियोपिया में 8.6 करोड़, नाइजीरिया में 7.4 करोड़ और कांगो में 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जीवन जीने को मजबूर हैं।
अब ‘पॉवर्टी, प्रॉस्पेरिटी और प्लेनेट: पाथवेज आउट ऑफ द पॉलिक्राइसिस’ की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में गरीबी में कमी आने की दर पर पूर्ण विराम लग गया है। जो स्थिति फिलहाल है, यदि वह बनी रही, तो दुनिया से गरीबी को खत्म करने में अभी कई और दशक लग जाएँगे। यह रिपोर्ट और भी अधिक चौंकाने वाले आँकड़ें पेश करती है। इसके अनुसार, लोगों को हर दिन 6.85 डॉलर यानि 576 भारतीय रुपए से ऊपर कमाने में सौ सालों से भी अधिक समय लग जाएगा। और हम बात करते हैं 2030 तक गरीबी खत्म करने की.. सत्य तो यह है कि हम और हमारी कई पीढ़ियाँ गुजर जाएँगी, लेकिन गरीबी टस से मस नहीं होगी..
बात को विराम देते हुए मैं यही कहूँगा कि इंटरनेट पर लोगों की आँखों में धूल झोंकने वाले आँकड़ें पेश करने से गरीबी कभी खत्म नहीं होने वाली। गरीबी को कम करने के लिए, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से आर्थिक विकास करने के लिए बेहतर नीतियाँ और कार्यक्रम विकसित करना जरुरी है।