माथे पर मक्कारी का ठप्पा लगातीं सरकारी योजनाएँ

सरकारी योजनाओं के पोस्टर के सामने सोचता हुआ भारतीय व्यक्ति

मदद एक हद तक ही अच्छी लगती है, यदि बार-बार और लगातार मदद मिलती रहे, तो मदद लेने वाला व्यक्ति इसका आदी बन जाता है। उसमें काम करने की लगन का गला तो घुटने लगता ही है, साथ ही साथ मक्कारी का ठप्पा भी उस व्यक्ति के माथे पर लग जाता है। भारत सरकार जरूरतमंदों को राहत देने के उद्देश्य से वर्षों से भरपल्ले योजनाएँ चलाती आ रही है। बच्चियों के लिए अलग योजना, छात्रों के लिए अलग योजना, महिलाओं के लिए अलग, तो बुजुर्गों के लिए अलग.. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार का उद्देश्य इसमें सर्वथा नेक ही रहा है, लेकिन परिणाम कतई नेक नहीं रहे हैं।

यहाँ मेरा सवाल है कि बेरोजगार और गरीबों के लिए चलाई जा रही ये योजनाएँ क्या वास्तव में बेरोजगारी और गरीबी को खत्म करने में योगदान दे भी रही हैं? बात सिर्फ बेरोजगारी या गरीबी की ही नहीं, लगभग-लगभग हर जरूरतमंद की है, जिसके लिए योजनाओं की बाढ़ आई पड़ी है, और मेरी बात पर गौर करना कि बाढ़ कभी-भी भला करने नहीं आती।

बढ़ई, सुतार, मूर्तिकार और कुम्हार समुदाय के कारीगरों के लिए प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत सुकन्या समृद्धि योजना, गरीब और बेघर लोगों को अपना घर बनवाने में मदद के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ खाना पकाने वाले ईंधन- एलपीजी उपलब्ध कराने के लिए उज्ज्वला योजना, गरीब और श्रमिक महिलाओं के लिए फ्री सिलाई मशीन योजना, किसानों की फसलों को सूखा और बाढ़ से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, और न जाने कितनी ही योजनाएँ सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं, जैसे- फ्री गैस सिलेंडर योजना, लखपति दीदी योजना, फ्री प्लॉट योजना, फ्री बस पास योजना, फ्री सोलर पैनल योजना, फ्री बिजली, पानी योजना, आँगनवाड़ी योजना, जननी सुरक्षा योजना, लाड़ली लक्ष्मी योजना, बुजुर्ग पेंशन योजना, जनधन योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, आयुष्मान भारत योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना आदि..

यह लेख खत्म हो जाएगा, लेकिन योजनाओं के नाम खत्म नहीं होंगे। जिस देश में फ्री में कुछ नहीं मिलता, उस देश में सरकार बिल्कुल निःशुल्क वितरण वाली वस्तुओं की तरह योजनाएँ बाँट रही है। मैं यहाँ सरकार को सिर्फ इतना ही इशारा करना चाहता हूँ कि यहाँ फ्री के मेवे की तब तक ही कदर है, जब तक कि वह मिल नहीं जाता, मिल जाने के बाद उसका कोई मोल नहीं रह जाता।

सब पर बात करना तो संभव नहीं, लेकिन बतौर उदाहरण कुछ पर तो की ही जा सकती है। सरकार ने गरीब तबके के लोगों के लिए आवास योजना इसलिए शुरू की थी, ताकि उन्हें रहने के लिए पक्की छत मिल सके। लेकिन, तथ्य यह है कि सरकार द्वारा दिए जा रहे इस लाभ का कुछ लोग गलत फायदा उठा लेते हैं, और उन्हें आवंटित हुए मकानों को किसी और को किराए पर दे देते हैं। इंटरनेट पर ऐसे मामले भरे पड़े हैं। इस लाभ को भी लोगों ने आमदनी का हिस्सा बना लिया, इससे अधिक शर्म की बात और क्या होगी? करोड़ों रुपए खर्च करके सरकार जिन लोगों का फायदा सोचती है, वही लोग आवास योजना वाले घरों के आसपास झोपड़ी बनाकर रहने लगते हैं। इतना ही नहीं, रोना रोते हुए भी मिल जाते हैं कि सरकार हम पर ध्यान नहीं दे रही। यह तो कुछ ऐसा हुआ न ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’। यह चोरी नहीं तो और क्या है? रोना भी रो लिया और आमदनी का एक स्त्रोत भी बढ़ गया। यह तो सिर्फ एक ही उदाहरण है, जो यह बताता है कि जरुरत न होने के बावजूद व्यक्ति विशेष ने योजना का लाभ लिया।

यहाँ मैं लाभ लेने वालों से ज्यादा बड़ी गलती सरकार की मानता हूँ। गरीब तबके के लोगों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के उद्देश्य से शुरू की गईं ये तमाम योजनाएँ उन्हें गरीबी की खाई में उतारने के सिवा कुछ भी नहीं कर रही हैं, कारण कि इतनी योजनाएँ जब मुफ्त में मिल रही हैं, तो व्यक्ति को मेहनत करने की जरुरत ही क्या है।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जनकल्याण और समाज की बेहतरी है, लेकिन इनका सही ढंग से कार्यान्वयन और प्रभाव बहुत अधिक जरुरी है। केवल मुफ्त सुविधाएँ दे देने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला, क्योंकि इससे तो लोग आलसी और निर्भर बनने को मजबूर हो रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह योजनाओं के साथ-साथ जागरूकता और शिक्षा पर भी जोर दे। लोगों को सिखाया जाए कि कैसे मेहनत से अपनी आजीविका चलाना है। यदि आप सच-मुच जरूरतमंद हैं, तो ही योजनाओं का लाभ लें, ताकि हर जरूरतमंद व्यक्ति को इसका लाभ मिल सके। योजनाओं का लाभ उठाने के साथ-साथ अपनी मेहनत से आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जाए। योजना का लाभ देने के बाद सख्त निगरानी रखी जाए कि योजनाओं का सही और न्यायपूर्ण उपयोग हो रहा है।

जब लोग अपनी मेहनत से सफलता हासिल करेंगे, तब जाकर ही समाज और देश का वास्तविक विकास हो सकेगा। हमारे सामने ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जहाँ लोग सरकारी योजनाओं का उचित ढंग से उपयोग कर रहे हैं और अपनी स्थिति में सुधार ला रहे हैं।

यहाँ सच्चे नागरिक होने के नाते हमारा भी दायित्व बनता है कि हम इन योजनाओं का सही ढंग से उपयोग करें और अपने समाज को आगे बढ़ाने में सहयोग करें। हमें यह मानना होगा कि सपनों को सच करने के लिए मेहनत जरूरी है। सरकारी योजनाएँ हमें सबसे बेहतर मंच प्रदान करती हैं, लेकिन उनका उपयोग किस सलीके से करना है, यह हम पर निर्भर करता है। एक स्वावलंबी, आत्मनिर्भर और समृद्ध समाज का सृजन तब ही संभव है, जब हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझे और पूरे दिल से अपने समाज के विकास में योगदान दे। यही सही मायने में समाज और देश की सच्ची प्रगति है।

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