सर्दियों की एक ठंडी शाम थी। हवा में धूप का स्वाद घुला हुआ था, और पेड़ों की छाँव किसी बूढ़े संत की तरह स्थिर बैठी थी। समय जैसे चल नहीं रहा था, बस रुक गया था उस पल में, उस मौन में, जिसे कोई देख तो नहीं सकता, लेकिन महसूस जरूर कर सकता है।
मैं पार्क के एक कोने में बेंच पर बैठा था- शांत, स्थिर और थोड़ा थका हुआ। यह बात और है कि थकान शरीर की नहीं थी, मन की थी। वह थकान जो जीवन के असमर्थ प्रयासों से आती है, जब हम बार-बार बिखरते हैं, बार-बार खुद को जोड़ते हैं, बार-बार गिरते हैं और बार-बार उठ खड़े होते हैं।
कोई शोर नहीं था, कोई संवाद नहीं था। सिर्फ हवा थी, जो पत्तों से टकराकर कोई सूफियाना राग बुन रही थी। और तभी, मेरे बगल में एक बुजुर्ग व्यक्ति आकर बैठ गए। उनके कपड़े थोड़े पुराने-से थे, लेकिन थे एकदम साफ-सुथरे। चाल में कुछ थकान थी, लेकिन चेहरे पर एक अजीब-सी संतुष्टि।
उनके हाथ में मिट्टी की एक प्याली थी, जिससे वे धीरे-धीरे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। लेकिन, उस प्याली पर मेरी निगाहें टिक गईं। वह टूटी हुई थी, उसके किनारों पर महीन दरारें थीं। लेकिन, आश्चर्य की बात यह थी कि उन दरारों को सुनहरी पट्टियों से जोड़ा गया था, बिल्कुल वैसे ही, जैसे जापान में ‘किंत्सुगी’ नामक कला में किया जाता है। दरअसल, किंत्सुगी कला में मिट्टी के बर्तनों के टूटे हुए टुकड़ों को सोने से जोड़ा जाता है, यह इस विचार पर आधारित है कि खामियों और कमियों को स्वीकार करके आप और भी मजबूत और अधिक सुंदर कलाकृति बना सकते हैं।
मैं थोड़ी देर तो उन्हें देखता रहा, लेकिन फिर पूछ ही लिया, “बाबा, यह प्याली टूटी हुई है.. आप इसमें चाय कैसे पी लेते हैं?”
एक मीठी और मंद-सी मुस्कुराहट उन्होंने मुझे तोहफे में दी। वह मुस्कान कुछ ऐसी थी, जो ढूँढे से भी न मिले.. ऐसी मुस्कान कैसे लाई जाए, उसका ज्ञान किताबों में भी न मिले, वह मुस्कान तो सिर्फ जीवन से अर्जित होती है। फिर उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा, “बेटा, जो टूटा है, वही तो असली है अब।”
मैं चौंक गया। बाबा धीरे-धीरे बोलने लगे, “यह प्याली जब टूटी थी, तब इसे फेंका जा सकता था। लेकिन, किसी भले आदमी ने इसे फेंका नहीं, बल्कि जोड़ दिया। यह जुड़ाव सिर्फ बाहरी नहीं था, यह जुड़ाव था धैर्य का, ममत्व का और सबसे जरूरी- स्वीकार करने का। जो टूटते हैं, उनमें ही तो कला होती है फिर से जुड़ जाने की। और जो जुड़ते हैं, वो पहले जैसे कमजोर नहीं रहते। वो और मजबूर और गहरे हो जाते हैं, और पहले से ज्यादा सुंदर भी।”
उनकी बातों ने मेरे मन के भीतर के सारे गणित बदलकर रख दिए। हममें से अधिकतर लोग टूटने से डरते हैं। हार को, रिश्तों के बिखरने को, सपनों के चूर हो जाने को एक कमजोरी मानते हैं। लेकिन, उस महात्मा से दो क्षण बात करके मैंने जाना कि टूटना भी एक कला है और उसके बाद जुड़ना एक साधना।
हम सोचते हैं कि जो दरारें हैं, वे हमें बदसूरत बनाती हैं। लेकिन सच तो यह है कि वही दरारें हमें खास बनाती हैं। “हर दरार में कोई कहानी होती है, हमें उसे सुनना आना चाहिए”, बाबा बोले।
“यह जो मिट्टी की प्याली है, इसे देखो… जब यह टूटी, तो यह किसी के लिए ‘समाप्त’ हो गई। लेकिन, किसी दूसरे व्यक्ति ने उसे त्यागा नहीं, उसे जोड़ा, उसकी दरारों को भरा और तब जाकर यह साधारण प्याली असाधारण बन गई। अब जब मैं इसमें चाय पीता हूँ, तो सिर्फ स्वाद नहीं आता, अनुभव आता है। मुझे भाव आता है टूटी चीजों से भी प्रेम करने का।” वे बोले।
मैं कुछ देर तक चुप रहा, जैसे उनके सामने कोई छोटा-सा बच्चा हूँ, जो किसी बड़े के समझाने पर सब कुछ शालीनता से समझने की कोशिश कर रहा है। फिर पूछा, “लेकिन बाबा, यदि कोई खुद ही टूट जाए, तो क्या वह भी खुद को फिर जोड़ सकता है?”
बाबा जैसे जानते थे कि मेरा सवाल यही होगा। वे मुस्कुराकर बोले, “क्यों नहीं बेटा? जो इंसान अपनी टूटन को स्वीकार करता है, वह उसे खुद जोड़ क्यों नहीं सकता? दूसरों की तुलना में वह उस बारीकी को जानता है कि वह टूटा कहाँ से है? तो जोड़ने की जरुरत कहाँ पर है, यह भी बखूबी जान सकेगा। समस्या तो तब होती है, जब हम दरारें छुपाना शुरू कर देते हैं। जब हम सोचते हैं कि सब कुछ वैसा ही दिखना चाहिए जैसा पहले था। अब यह तो संभव ही नहीं है। हाँ, यह जरूर संभव है कि आप उस दरार को जितना खूबसूरती से भर सकते हैं, भरिए, लेकिन, लोग यह भी नहीं करते। यह टूटना तो सुअवसर है खुद को पहचाने का, खुद को समय देने का, खुद के साथ बात करने का, और सबसे विशेष खुद को नए अवतार में पेश करने का।”
उनकी बातों ने मेरे मन को पूरी तरह शांत कर दिया। हम सभी कभी न कभी टूटते हैं- कभी प्रेम में, तो कभी अपेक्षाओं में, कभी जिम्मेदारियों में, तो कभी उम्मीदों में। लेकिन, जो इन टूटनों को समझते हैं, उन्हें समय के साथ एक सुनहरा जोड़ भी मिल जाता है। और यही तो जीवन है। एक टूटी हुई प्याली, जिसमें भरे होते हैं अनुभव और स्वीकृति। जो कभी गिरा हो, वही तो उठने का मूल्य समझता है। जो कभी टूटा हो, वही जुड़ने की कला जानता है। और जो जुड़ गया हो, वह कभी किसी और को तोड़ने का दुस्साहस नहीं करता।
बाबा उठे, अपनी प्याली को थैले में रखा और मुस्कराते हुए बोले, “याद रखना, बेटा.. यदि कभी जीवन तुम्हें तोड़ दे, तो खुद को मत कोसो, बल्कि उस दरार को संजोने पर ध्यान दो, क्योंकि वहीं से तुम्हारी असल रोशनी बाहर निकलेगी।”
मैं कुछ नहीं कह सका, लेकिन इतना जरूर जान लिया कि कभी-कभी एक टूटी प्याली भी सम्पूर्ण जीवन का सार बता जाती है।