बरकत का ताबीज..

गरीब परिवार का बच्चा भूख से रोता हुआ, माँ उसके पास सहानुभूति दिखाती है, रात में घर का अंधेरा

रात में गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था, सभी लोग सुबह होने तक नींद की यात्रा करने निकल पड़े थे.. लेकिन आखिरी छोर पर बने एक छोटे-से घर में भूख की कराहटें गूँज रही थीं। चूल्हा ठंडा पड़ा था, बर्तन खाली थे और एक माँ अपने बच्चे को थप-थपाकर सुलाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। बच्चा धीरे से बोला- “माँ, मुझे नींद नहीं आ रही है.. बहुत जोरों से भूख लगी है..” यह सुनकर माँ की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन अंधेरे का फायदा उठाकर उसने जलधारा की तरह बहते अपने आँसू साड़ी के पल्लू में छिपा लिए, ताकि कोई देख न सके। न जाने कितनी ही रातें यूँ ही बीत गई थीं, जब यह पल्लू भीग जाया करता था, लेकिन आज की रात जैसे उसकी हिम्मत टूट-सी गई थी।

सुबह होते ही, अपने फटे आँचल में आखिरी उम्मीद समेटे, वह गाँव के प्रसिद्ध साधु के पास पहुँची। आँखों में करुणा थी, हाथ जुड़े हुए थे.. वह बोली, “स्वामी जी! कोई ऐसा मंत्र दीजिए, जिससे मेरे मासूम बच्चे का रात को भूख से रोना बंद हो जाए।”

कुछ देर तो साधु शांत बैठे रहे, फिर अपनी कुटिया के भीतर गए और एक पीले कपड़े पर कुछ लिखकर उसे एक ताबीज की तरह बाँध दिया। बाहर आने के बाद महिला को वह ताबीज देते हुए बोले- “इसे घर में उस जगह रखना, जहाँ तुम अपनी मेहनत की कमाई रखती हो।”

महिला ने ताबीज को अपनी छोटी-सी पोटली में रख लिया और घर लौट आई। उस दिन संयोग से उसके पति को दिहाड़ी का कुछ काम मिल गया और पहली बार उनके घर में इतना भोजन पका, जिससे सभी का पेट भर जाए। यह वह पहली रात थी, जब घर में रात में रोने और कराहने की आवाज़ की जगह हँसी सुनाई दे रही थी, क्योंकि उस दिन विशेष रूप से बच्चे ने भर पेट खाना खाया। दिन भर अनमना-सा रहने वाला वह बच्चा आज खूब खेला था, सो पैरों का जवाब देना भी स्वाभाविक ही था.. वह इस रात सुकून की नींद सोया। 

अगली सुबह, जब महिला ने दरवाज़ा खोला, तो आँगन में एक छोटी-सी पोटली पड़ी मिली। कुछ सहम-सी गई.. तरह-तरह के ख्याल इतनी-सी देर में ही मन में पनपने लगे.. काँपते हाथों से जैसे-तैसे उस पोटली को उठाया और खोला, तो क्या देखती है कि उसमें कुछ रुपए रखे हुए थे। रुपयों के पीछे से एक पर्ची झाँक रही थी, जिसमें लिखा था, “इन रुपयों से कोई कारोबार कर ले।”

महिला ने वह पर्ची और रुपए अपने पति के हाथों में थमा दिए। ईश्वर का आशीर्वाद समझकर पति ने तुरंत कुछ सामान खरीदा और आस-पास के गाँवों में जाकर घूम-घूम कर बेचने लगा.. कुछ समय बीतने के बाद उसने गाँव में ही एक छोटी-सी दुकान खरीद ली। इस दुकान में विशेष रूप से ऐसा सामान रखता था, जिसे लेने के लिए गाँव के लोगों को पास के शहर जाना पड़ता था.. अपने गाँव में ही सामान मिलने की सुविधा होने से लोगों की गाड़ी-घोड़ों के किराए में लगने वाले पैसों की चिंता तो खत्म हो ही गई, साथ ही शहर जाने का समय भी बच गया.. धीरे-धीरे धंधा बढ़ा, तो आमदनी भी बढ़ती गई। अब वह घर, जहाँ कभी भूख डेरा डाले बैठी थी, समृद्धि से भरने लगा।

समय बीतता गया। दुकान बढ़ी, ग्राहक बढ़े और देखते ही देखते एक दिन ऐसा आया, जब उन पति-पत्नी के पास धन की कोई कमी नहीं रही। उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका था। अब घर में सिर्फ भर पेट भोजन ही नहीं, बल्कि खुशहाली भी थी। बच्चे की हँसी गूँजने लगी, माँ की आँखों में अब संतोष था और सबसे बड़ी बात, पिता का सिर गर्व से ऊँचा रहने लगा। जीवन की रेल ने जैसे बढ़िया रफ्तार पकड़ ली थी..

एक दिन, जब महिला तिजोरी में पैसे रख रही थी, तो उसकी नज़र उसी पीले कपड़े पर पड़ी। दिल में एक सवाल उठा कि आखिर इसमें ऐसा क्या लिखा था, जिसने हमारी तकदीर बदल दी?

उसने काँपते हाथों से ताबीज खोला और पढ़ा। फिर क्या था, पढ़ते ही उसकी आँखें भर आईं.. हाथ अब और भी जोरों से काँपने लगे। उसमें लिखा था, “जब पैसों की तंगी समाप्त हो जाए, तो सारा पैसा तिजोरी में छिपाने के बजाए कुछ पैसे ऐसे घर में डाल देना, जहाँ से रात को बच्चों के रोने की आवाज़ें आती हों..”

उफ्फ.. उसकी आँखों के सामने सब कुछ घूमने लगा.. हर रात उसका रोता-बिलखता और भूख से तड़पता बच्चा.. थपकी देकर सुलाने के बाद भी दूर से ही भाग जाने वाली उसके बच्चे की नींद.. कुछ न कमा पाने की उसके पति की बेबसी.. झर-झर बहते आँसुओं को रोकने की अपार शक्ति रखने वाला साड़ी का फटा हुआ पल्लू.. मदद के लिए बढ़ाए हुए हाथ.. और फिर एक दिन अचानक से मिली यह समृद्धि.. उसे समझ में आ गया कि असली चमत्कार उस मंत्र में नहीं था, बल्कि उसकी सोच में था।

शाम को अपने पति के इंतज़ार में पूरा दिन काट दिया.. जैसे ही दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई, वह दौड़ी चली आई और दरवाज़ा खोलते से ही अपने पति से कहा, “हम तिजोरी नहीं, किसी की तकदीर भरेंगे।”

गरीबी से उठे थे, सो दूसरों की मजबूरी बखूबी समझते थे.. फिर क्या था, उन्होंने हर महीने अपनी कमाई का एक हिस्सा उन घरों तक पहुँचाने का संकल्प लिया, जहाँ उनके अतीत जैसे हालात थे। धीरे-धीरे यह छोटा-सा कदम एक बड़ी पहल बन गया। अब उनके हाथों से सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि उम्मीद भी बँटती थी। हर महीने जब किसी भूखे बच्चे को खाना मिलता, किसी माँ की आँखों में संतोष के आँसू छलकते, तो उन्हें लगता कि उन्होंने सच में अपनी तिजोरी को अमीर बना लिया है।

समय के साथ उनका यह प्रयास और बढ़ता गया। उन्होंने एक छोटी-सी संस्था बनाई, जो गरीबों के लिए भोजन और शिक्षा की व्यवस्था करने लगी। उनके प्रयासों से कई ऐसे परिवार थे, जिनके जीवन में अब बेहतर बदलाव आने लगे थे। अब यह सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे गाँव की कहानी बन चुकी थी।

इस बदलाव को देखकर वह महिला कई बार सोचती कि यदि उस दिन साधु महाराज से वह ताबीज न मिला होता, तो शायद हम भी आज उन्हीं भूखों में शामिल होते। लेकिन, फिर उसे एहसास हुआ कि असली जादू उस कागज़ के टुकड़े में नहीं, बल्कि उस विचार में था, जिसने उनकी सोच बदल दी। अब जब भी कोई गरीब उनके दरवाज़े पर मदद माँगने आता, तो वे उसे खाली हाथ नहीं लौटाते। वे जानते थे कि जिस तरह उनके जीवन में एक बदलाव आया था, वैसे ही वे भी किसी और की तकदीर बदल सकते थे।

वे दोनों इस बात को बखूबी जान चुके थे कि पैसा सिर्फ तिजोरी में बंद करके या सजाकर रखने के लिए नहीं होता, बल्कि किसी की तकदीर सँवारने के लिए होता है। जब हम किसी और के आँसू पोंछते हैं, तो किस्मत खुद हमारे आँसू पोंछने का इंतज़ाम कर देती है। कभी आप भी अपनी तिजोरी में झाँककर देखिए, कहीं उसमें किसी और की मुस्कान की जगह खाली तो नहीं है?

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