शिक्षा है या नोट छापने की मशीन….

महंगी कोचिंग फीस भरते परेशान भारतीय छात्र और अभिभावक।

एक समय था जब शिक्षा को समाज में बदलाव और विकास का मुख्य साधन माना जाता था। शिक्षक को एक मार्गदर्शक, गुरु और प्रेरक के रूप में देखा जाता था, जो विद्यार्थियों को न केवल अकादमिक ज्ञान, बल्कि जीवन मूल्य भी सिखाते थे। यह वह समय था जब शिक्षक जीवन जीने के अनोखे गुण सिखाते थे और शिक्षा पूरी होने पर गुरु दीक्षा लेते थे। गुरु दीक्षा भी ऐसी, जो जीवन के कई रहस्य खोलती थी। तब शिक्षकों के मन में केवल अपने छात्रों को, उनकी क्षमता को पहचानकर उसे निखारने की लालसा रहती थी। लेकिन, समय बदला तो शिक्षक गुरु दीक्षा की जगह छोटी-मोटी राशी फीस के रूप में लेने लगे, इसके बावजूद भी शिक्षा का स्तर ठोस था। परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन आ गया है। शिक्षा अब एक सामाजिक कारण से अधिक एक आर्थिक लाभ का साधन बन गई है। यह परिवर्तन न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य को भी अनिश्चित बना रहा है।

पिछले कुछ दशकों में, शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण और व्यावसायीकरण ने तेजी से बढ़ोतरी की है। निजी स्कूलों और कॉलेजों की संख्या में वृद्धि हुई है, और साथ ही उनकी फीस भी आसमान छू रही है। अच्छी शिक्षा पाने के लिए विद्यार्थियों और उनके माता-पिता को भारी-भरकम फीस चुकानी पड़ती है। इस बीच, शिक्षा संस्थानों का मुख्य उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना बन गया है, न कि विद्यार्थियों को मूल्य आधारित शिक्षा प्रदान करना। अब बच्चे रोज कक्षा में आएँ या न आएँ, उन्हें पढ़ाया हुआ समझ आया हो या न आया हो, बस जैसे-तैसे नाम का पढ़ा दिया और काम पूरा हो गया, लेकिन फीस समय पर आनी चाहिए। बस इस ही सोच के साथ आज-कल के स्कूल, कॉलेज और बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान चल रहे हैं। नतीजा यह है कि अब शिक्षा पहले जैसी नहीं रही। शिक्षा का व्यवसाय इतना बड़ा बन चुका है कि इसमें शिक्षा का मूल उद्देश्य कहीं खो सा गया है। हालत यह है कि विद्यार्थियों में अब व्यावहारिक ज्ञान और नैतिक शिक्षा तो न के बराबर हो ही गई है, और तो और किताबी ज्ञान भी ठोस नहीं है। साथ ही शिक्षण संस्थान भी अपनी गरिमा खो चुके हैं। कभी ये शिक्षण संस्थान विद्या का मंदिर हुआ करते थे, लेकिन आज नोट छापने का नया साधन बन चुके हैं।

शिक्षा का बाजार कितना बड़ा हो चुका है, इस बात का अनुमान आज-कल शिक्षा का हब कहे जाने वाले शहरों में लगा सकते हैं। छोटे-छोटे शहरों के बच्चे जब अपना शहर, घर, परिवार एवं दोस्त सब छोड़कर अपने सपने पूरे करने के लिए यहाँ पढ़ने आते हैं, तो उन्हें कदम-कदम पर पैसे की महत्ता का अहसास होता है। वहाँ ये बच्चे बड़ी मेहनत से कुछ बनने आते हैं, लेकिन इस शहरों में पैसों का एक अलग ही खेल चल रहा होता है। कोचिंग की महँगी-महँगी फीस से लेकर होस्टल और कमरों के किराए तक हर किसी के लिए ये बच्चे केवल पैसे कमाने का एक जरिया बन जाते हैं। इन बच्चों से जो जितना पैसा वसूल सकता है, वसूलता चला जाता है। कोई नहीं सोचता कि वे भी तो किसी के बच्चे हैं, जो कितना संघर्ष करके अपने घर से दूर रहकर पढ़ रहे हैं। उनके माता पिता ने भी तो अपनी जीवन भर की पूँजी अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए लगा दी होगी, जिससे हर कोई अपनी जेब भर रहा है। और जो इतना पैसा शिक्षा में नहीं लगा सकता, वह शिक्षा से वंछित रह जाता है। इससे समाज में असमानता बढ़ रही है और अब शिक्षा केवल अमीरों के बस की ही बात रह गई है।

इस समस्या का समाधान यही है कि शिक्षा संस्थानों को उनके मूल उद्देश्य की ओर वापस लाया जाए। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। शिक्षा को पैसे कमाने का साधन बनाने वाले संस्थानों को यह समझना होगा कि किसी को शिक्षित करना केवल एक व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह तो एक सामाजिक कर्तव्य है, जिसे उन्हें पूरी ईमानदारी और निष्ठा से निभाना चाहिए। शिक्षण संस्थानों और शिक्षा से जुड़े अन्य व्यवसायों को यह समझना होगा कि एक बच्चे के पढ़ने से न केवल उसका जीवन संवरता है, बल्कि राष्ट्र का निर्माण भी होता है। इसलिए शिक्षा को व्यवसाय न बनाकर इसे एक सामजिक कर्तव्य की तरह देखना जरुरी है, ताकि हर बच्चा पढ़ सके।

शिक्षा का व्यावसायीकरण एक गंभीर समस्या है, जो हमारे समाज और भविष्य को प्रभावित कर रही है। शिक्षा को फिर से एक सामाजिक कारण के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि हम एक बेहतर और अधिक समावेशी समाज का निर्माण कर सकें। विद्यार्थियों को केवल अकादमिक ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू का ज्ञान मिलना चाहिए। यही सच्ची शिक्षा है और यही हमारे समाज की सच्ची प्रगति का मार्ग है। इस यात्रा में, हमें यह याद रखना चाहिए कि शिक्षा केवल एक व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह समाज के निर्माण का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। यदि हम इसे व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं, तो हम अपनी भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना है, और इसे उसी दिशा में पुनः स्थापित करना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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