हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ विज्ञान और तकनीक ने हमारे जीवन को बेहद सुविधाजनक बना दिया है। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे इंसान को देख और सुन सकते हैं, पूरी दुनिया हमारे मोबाइल में समा गई है, कारण कि आज का युग तकनीकी का युग है। वीडियो कॉल, सोशल मीडिया और इंटरनेट ने हमें हर एक क्षण अपने प्रियजनों से जोड़े रखा है। लेकिन, क्या हमने कभी इस बात पर विचार किया है कि तकनीकी क्राँति की इस चकाचौंध में हमने क्या खो दिया है? क्या कभी इस बात पर हमारा ध्यान गया कि अपनी मानवीय संवेदनाओं और करीबी रिश्तों को हम कितना पीछे छोड़ आए हैं? हम इंसान आज बहुत ऊपर उठ चुके हैं, लेकिन इस बात से भी किनारा नहीं किया जा सकता कि हमारी इंसानियत दिन पर दिन गिरती जा रही है।
आज, हम अपने मोबाइल फोन और कम्प्यूटर स्क्रीन पर इतने व्यस्त हैं कि हमारे आसपास के लोगों की तकलीफ और दर्द कभी हमें नज़र ही नहीं आते। हमें दुःख और तकलीफ दिखते हैं, तो सिर्फ सोशल मीडिया पर दुःख भरी पोस्ट्स डालने और नकली आँसू वालीं रील्स बनाने वालों के। सारी की सारी दया हमारी सिर्फ इन्हीं लोगों में सिमट कर रह गई है। कटु है, लेकिन सत्य है कि हम अपने फोन में दुनिया घूम लेते हैं, लेकिन अपने ही आस-पास के लोगों को देखने, उन्हें सुनने और जानने का समय हमारे पास नहीं होता। यह विडंबना ही है कि हम उन लोगों के साथ संपर्क में हैं, जो हजारों मील दूर किसी कोने में बैठे हैं, और तो और हो सकता है कि वो असल में वो है ही नहीं, जो हमें दिखाते हैं, लेकिन हम उनके साथ संपर्क में नहीं हैं, जो हमारे पास हैं और जिन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत है।
पहले के समय में लोग घर के आँगन, गली-नुक्कड़, बरामदे और ओटले आदि पर बैठकर घंटों अपने प्रियजनों के साथ समय बिताते थे, तब जीवन में एक विशेष प्रकार की मिठास थी। वे प्रियजनों से अपने मन की बातें साझा करते थे और सामने वाले के मन की भी इत्मीनान से सुनते थे। इस खुले संवाद से न सिर्फ मन का गुबार निकल जाया करता था, बल्कि डिप्रेशन जैसे शब्द का दूर-दूर तक कहीं कोई नाता नहीं होता था, क्योंकि लोग अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करते थे और उन्हें दूसरों से समझदारी और सहानुभूति मिलती थी।
आज के समय में, यह तस्वीर काफी बदल गई है। हम सभी जानते हैं कि आज हमारे पास उस समय जैसा समय नहीं है। हम सभी अपने-अपने कामकाज में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने प्रियजनों के साथ समय बिताना तो दूर, उनके साथ बैठकर दो पल बैठकर बातें करने का समय भी नहीं मिलता। “मुझसे तुझसे ढेर सारी बातें करना है, चल शाम को पास वाले बगीचे में अपने वाले ओटले पर बैठक करते हैं” अब तो इस तरह की बातें भी विलुप्ति की कगार पर हैं।
माना कि हमारे पास अब घंटों का समय नहीं है, माना कि हम सभी अपने-अपने काम-काज में काफी व्यस्त हैं.. लेकिन, इतनी व्यस्तता भी क्या काम की, जो हमें अपने ही लोगों से दूर कर दे। किसी के मन में कितने सवाल हैं, जिनके जवाब उसके पास नहीं हैं और वह चाहता है कि कोई अपना उसे समाधान के साथ जवाब दे दे, लेकिन शर्म की बात है कि आज कंधे से लगाकर कोई अपना दुःख-दर्द कम करने वाला भी हमारे पास नहीं बचा है, कारण कि सब अपने-अपने में मस्त हैं। जब वह दर्द का जाया व्यक्ति कोई बड़ा कदम उठा लेता है, तब जाकर उसकी और उसकी परेशानियों की याद हमें आती है। उसके बाद उसके जीवन की सारी परेशानियाँ सुनने को और समाधान निकालने को हम तैयार रहते हैं। जो मिलता है, उससे यही कहते फिरते हैं कि “मुझसे तो एक बार अपने मन की कह लेता, तो आज हमारे साथ, हमारे पास होता।” लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। न सिर्फ बात, बल्कि व्यक्ति भी हमारे हाथों से और हमारे जीवन से निकल चुका होता है। पास होता है, तो सिर्फ और सिर्फ पछतावा। वह कहते हैं न कि बाद पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत..
भाई, आपको सुनने की प्रतीक्षा ही क्यों करना है? समस्या में पहले से ही घिरा हुआ आदमी आगे से आपके पास आखिर क्यों चलकर आएगा? आप खुद क्यों समझने की कोशिश नहीं करते? उस शख्स के बदलते भाव, उसका अनमना व्यवहार, उसकी बेरुखी, उसकी मायूसी, उसकी खामोशी, उसकी टीस आखिर क्यों आपको नज़र नहीं आती? अरे, आप किस बात के अपने हैं? किस मुँह से उसे आप अपना कह रहे हैं? हम अपने ही प्रियजनों की भावनाओं को न समझ सकें, उनके दुःख और परेशानियों को न जान सकें, तो फिर हमारा होना आखिर किस काम का? अपनेपन का मतलब सिर्फ नाम मात्र का संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और समझ भी है।
यह स्थिति आपने भी अपने जीवन में कभी न कभी देखी ही होगी, तो ज़रा सोचिए, क्या आप कभी उसके पास गए और उससे पूछा कि वह क्यों परेशान है? क्या कभी उसकी आँखों में झाँक कर उसके दर्द को पढ़ने की कोशिश की? उसकी चुप्पी को समझने का प्रयास किया? उसकी भावनाओं को महसूस करने की कोशिश की? शायद नहीं। हम अक्सर अपने में ही इतने उलझे रहते हैं कि हमें अपने ही लोगों की परेशानियाँ और दुख नज़र नहीं आते। हमें लगता है कि वे खुद आकर हमें अपनी समस्याएँ बताएँगे। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। कई बार, वे इतने टूट चुके होते हैं कि उनके पास अपनी पीड़ा व्यक्त करने की भी शक्ति नहीं रहती। आपके अपने होने का असली मतलब तब ही है, जब आप बिना कहे ही उनके दुःख को समझ सकें। उनके साथ खड़े हो सकें, बिना उनके कहे ही उनकी मदद कर सकें। अपनेपन का असली अर्थ यही है।
मानवीय संवेदनाएँ और रिश्ते हमारे जीवन का मूल आधार हैं। यह सही है कि आज हम डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन इस डिजिटल युग ने हमें कहीं न कहीं असली दुनिया से दूर कर दिया है। इसने अपनी तरह हमें भी नकली बना दिया है। हम अपने मोबाइल फोन इतने मशगूल हो गए हैं कि हमारे आसपास क्या हो रहा है, इसकी खबर तक भी हमें नहीं होती।
हमारे जीवन की यह विडंबना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसे कमाना या सफलता प्राप्त करना नहीं है। हमें यह समझना होगा कि हमारी व्यस्तता हमारी प्राथमिकताओं का परिणाम है। यदि हम वास्तव में चाहें न, तो अपने परिवार और दोस्तों के लिए समय निकाल सकते हैं। बशर्ते, इस काम में हमारा रुझान हो, क्योंकि कोई कितना ही व्यस्त क्यों न हो, अपने पसंद के काम के लिए दिन भर के समय में से थोड़ा-सा समय तो चुरा ही लेता है। हमें अपने प्रियजनों की भावनाओं को समझने की जरूरत है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, और हमारे अपने हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाएँ, अब भी समय है, संभल जाइए और संभाल लीजिए उन्हें, जिन्हें आपकी सबसे अधिक जरुरत है।
हमें चाहिए कि हम अपने प्रियजनों के साथ खूब नहीं, थोड़ा बहुत ही सही, लेकिन समय बिताएँ, उनकी समस्याओं को समझें और उनका उचित समाधान देने की कोशिश करें। हमें चाहिए कि हमारे होते हुए हमारा कोई भी अपना खुद को अकेला न समझे। हमें यह याद रखना चाहिए कि असली खुशी और संतुष्टि वही है, जहाँ दिलों का मेल है, न कि सिर्फ टेक्नोलॉजी का। इसलिए, अपने जीते-जी अपने दिलों को इंसानी बनाए रखें, अपने रिश्तों की कीमत समझें, उन्हें सहेजकर रखने की ललक अपने भीतर बनाए रखें, अपनों की कीमत समझें, और अपने परिवार व दोस्तों के साथ समय बिताएँ। यही सच्ची तरक्की होगी।