शिक्षित किसान, उन्नत देश 

ड्रोन और टैबलेट से फसल की जांच करता आधुनिक भारतीय किसान।

प्राचीन काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, और कृषि हमेशा से ही हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है। आज भी देश की जीडीपी में लगभग 22% हिस्सा कृषि से आता है। लेकिन, जिस कृषि क्षेत्र ने देश को पहचान दी, वही दशकों से गंभीर संकटों का सामना कर रहा है। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा, शासन और प्रशासन की उदासीनता, गलत कानून और नीतियों, गिरती पैदावार और किसानों की आत्महत्या जैसे गंभीर संकटों से त्रस्त है। लेकिन, सवाल यह है कि इन समस्याओं का कारण क्या है? क्या आपने कभी इस पर विचार किया है? इन सभी समस्याओं का मुख्य कारण है शिक्षा और जागरूकता की कमी। जी हाँ! समस्याएँ चाहे कितनी भी विस्तृत हों, लेकिन इनका मूल कारण एक ही है, हमारे किसानों में शिक्षा और जागरूकता की कमी।

एक समय था, जब कृषि को अनपढ़ या ग्रामीण लोगों का पेशा माना जाता था, लेकिन समय बदला तो खेती करने के तरीकों में भी बदलाव आया। पहले जहाँ थोड़ी बहुत देखरेख से ही फसल लहलहा उठती थी, वहीं आज बदलती जलवायु और माँग के साथ कृषि एक उन्नत क्षेत्र बन गया है। लेकिन, हमारे अधिकतर किसान आज भी पुराने तरीकों से ही खेती कर रहे हैं। उन्हें आज भी खेती के वैज्ञानिक तरीकों, सरकार की नीतियों और फसलों की माँग, जैसे विषयों की जानकारी नहीं है। ये लोग पुराने तरीकों से ही खेती कर रहे हैं, जो तेजी से बदलते युग के लिए पर्याप्त नहीं है। इसका नतीजा यह है कि कठिन परिश्रम के बावजूद किसान अपनी खेती से उचित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। शिक्षा की कमी उनके विकास में बाधा बन रही है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है।

देश-प्रदेश की सरकारें बड़ी-बड़ी योजनाएँ पेश करके इस समस्या का समाधान खोज रही हैं। लेकिन, जब समस्या निचले स्तर पर है, तो बेशक इसका समाधान किसी मंत्रालय में बैठ कर दो-चार योजनाएँ लागु करने से नहीं हो सकता। इसके लिए सिर्फ एक ही तरीका कारगर साबित हो सकता है, वह है शिक्षा और जागरूकता का विस्तार। मानता हूँ कि देश की करीब 48 प्रतिशत जनता जो कृषि पर निर्भर है, इन्हें तकनीकी रूप से खेती सिखाना कोई आसान काम नहीं है। जमीनी स्तर पर देखा जाए, तो यह संभव भी नहीं है, क्योंकि 48 प्रतिशत इस जनता में से कई के पास शायद आधारभूत शिक्षा भी नहीं होगी। फिर उन्हें वैज्ञानिक तरीके से खेती सिखाना तो आसमान से तारे तोड़ने जैसा ही होगा।

लेकिन, इस समस्या के समाधान के लिए कुछ उपायों को अपनाया जा सकता है, जैसे- स्कूलों में जिस तरह गायन, नृत्य या अन्य कलाएँ सिखाई जाती हैं, उसी तरह स्कूली स्तर से ही बच्चों को कृषि या बागवानी की प्रारंभिक जानकारी दी जा सकती है, जिससे छात्रों का रुझान इस क्षेत्र में भी बढ़ सकेगा। फिर चाहे वे खुद खेती करें या उनके आस-पास कोई और करे, उनकी शिक्षा इसमें मददगार साबित हो सकती है। कई देशों में तो यह तरीका अपनाया भी जा रहा है। हर गाँव के हर घर में कम से कम एक व्यक्ति कृषि में शिक्षित हो, ताकि वह अपने घर और गाँव में कृषि को उन्नत बना सके। इस तरीके को व्यवस्थित रूप से लागू करने के लिए राज्य सरकारें योजनाएँ ला सकती हैं। सरकार द्वारा हर गाँव में ‘कृषि मित्र’ जैसे किसी पद का निर्माण कर नियुक्ति भी की जा सकती है, जो किसानों को कृषि से जुड़ी सभी प्रकार की जानकारी दे सकें, चाहे वह सरकारी योजनाएँ हों, कृषि से जुड़ी नई तकनीक हो, या फिर कृषि करने के नए तौर-तरीके। वैज्ञानिक अनुसंधान का किसानों से सीधा सरोकार होना चाहिए, जिससे गाँव के स्तर पर छोटे से छोटे किसान को भी वैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध हो सके। इस तरह और भी उपायों को अपनाया जा सकता है।

यदि इन उपायों को अपनाया जाए तो, प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत मिशन’ में कृषि का क्षेत्र एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जब कृषि में अच्छी कमाई हो सकेगी, तो यह गाँव से शहरों की ओर हो रहे पलायन को भी रोक सकती है। उन्नत पैदावार होगी, तो फसलों की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। एक पुरानी कहावत है “जैसा अन्न, वैसा मन”, जब अन्न की गुणवत्ता बढ़ेगी तो बेशक ही स्वास्थ्य में भी सुधार होगा। हम कुपोषण और भुखमरी जैसी समस्याओं से निजात पा सकेंगे।

यह तो हो गई सामाजिक सुधार की बात, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भी देखा जाए तो देश की जनसँख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसी तेजी से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी जरुरत है। कृषि में सुधार आने से हम अभी से इसके लिए तैयार हो सकेंगे। जलवायु परिवर्तन, रासायनिक कीटनाशकों से बंजर होती भूमि, मृदा का कटाव आज के समय में एक वैश्विक समस्या है, जिसका सीधा प्रभाव हमारी पैदावार पर पड़ रहा है। किसानों को वैज्ञानिक रूप से इसकी जानकारी मिल पाने से वह इस समस्या से निजात पा सकेंगे और पर्यावरण के कारण हो रहे नुकसान से बच सकेंगे, जिससे फसलों की बर्बादी को रोका जा सकेगा। 

किसान आधुनिक तकनीकों से परिचित हो सकेंगे, जिसमें सटीक खेती, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन आधारित समाधान शामिल किए जा सकते हैं। तकनीकी जानकारी होने से वे कम मेहनत में अधिक लाभ कामने और समग्र दक्षता में सुधार करने के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग कर सकेंगे, जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी।  

वैश्वीकरण के साथ, कृषि वैश्विक बाजार में एक प्रतिस्पर्धी क्षेत्र बन गया है। कृषि में व्यवस्थित शिक्षा प्राप्त व्यक्ति की मदद से किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के रुझान, गुणवत्ता मानकों और निर्यात अवसरों के बारे में पता लगता रहेगा। यह उन्हें वैश्विक मानकों के अनुसार उत्पादन करने में सक्षम बनाएगा, जो वैश्विक कृषि बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता में योगदान देगा।

कृषि शिक्षा को बढ़ावा देकर, भारत अपने कृषि क्षेत्र की पूरी क्षमता का उपयोग कर सकता है, किसानों की आजीविका में सुधार कर सकता है, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, स्थिरता को बढ़ावा दे सकता है और देश की समग्र वृद्धि और विकास में योगदान दे सकता है। जब किसानों को कृषि से संबंधित हर प्रकार की जानकारी होगी, तभी वे सफल रूप से फसल उत्पादन कर पाएँगे, जिससे निश्चित ही देश की अर्थव्यवस्था में सुधार होगा।

भारत में कृषि को पुनः सशक्त बनाने के लिए किसानों की शिक्षा और जागरूकता पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। इससे न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि भारत एक उन्नत और आत्मनिर्भर कृषि राष्ट्र के रूप में भी उभर सकेगा।

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