क्वांटिटी ओवर क्वालिटी से बढ़ रही बेरोजगारी

डिग्री होने के बावजूद बेरोजगार युवा भारत में

आज के समय में हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने। भले ही वे खुद किसी भी पेशे से हो, फिर भी वे अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं। अब इस दौड़ में और दुनिया की होड़ में यह कैसे संभव है कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में सभी सरकारी संस्थानों से पढ़कर डॉक्टर या इंजीनियर बन सकें?

जैसा कि हम सभी भली-भाँति जानते हैं कि आज शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को शिक्षित बनाना न होकर, व्यवसाय मात्र बन चुका है। अब आलम यह है कि इस व्यवसाय से लाभ कमाने की होड़ में और समय की माँग को देखते हुए प्राइवेट मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या, सरकार द्वारा चलाए जाने वाले कॉलेजों की संख्या से कहीं गुना अधिक हो चुकी है। आँकड़ों की तो क्या ही बात की जाए, देश में कुल 4804 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिनमें से 3982 प्राइवेट कॉलेज हैं, वहीं 706 मेडिकल कॉलेज है, जिनमे से 320 प्राइवेट कॉलेज हैं। इन कॉलेजों से हर साल हजारों की संख्या में बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बन कर निकलते हैं। मेरा सवाल यहाँ यह है कि क्या वे सच में डॉक्टर या इंजिनियर बनने की काबिलियत रखते हैं? या फिर डिग्री का सफेद पर्चा हाथ में आ जाना ही डॉक्टर या इंजिनियर की पदवी प्राप्त कर लेने के लिए काफी है?

प्राइवेट संस्थानों की बढ़ती संख्या मोटी फीस वसूलकर कई माता-पिताओं को उनके बच्चे के डॉक्टर या इंजीनियर बनाने के सपने को मुँह माँगे दामों पर बेच देते हैं। दिखावे की इस दुनिया में माता-पिता और समाज तथा रिश्तेदारों के सामने खुद की साख बनाने और अपने बच्चे पर डॉक्टर या इंजीनियर का ठप्पा लगाने के लिए प्राइवेट कॉलेजों को मोटी-मोटी फीस भी उन्हें कहाँ अखरती है.. दिखावा करने के चक्कर में माता-पिता इस ओर ध्यान देना भूल जाते हैं कि इन प्राइवेट संस्थाओं में दी जाने वाली शिक्षा उनके बच्चों के भविष्य को स्वर्णिम बनाने में कारगर होगी भी या फिर उन्हें बेरोजगारी के अँधेरे की गर्त में ले जाएगी? उन्हें पढ़ाने वाले प्रोफेसर्स सही मायने में उन्हें पढ़ाने का अनुभव रखते भी हैं या फिर वे भी सिर्फ पैसा देकर से डिग्रीज़ लेकर बैठे हैं। यह क्वांटिटी ओवर क्वालिटी ही तो है, जिसकी वजह से बेरोजगारी बढ़ती ही चली जा रही है।

विश्वविद्यालयों से मान्यता प्राप्त करने के लिए ये प्राइवेट कॉलेज वाले सिर्फ दिखावा करने के लिए कॉलेजों में बड़ी-बड़ी डिग्रीज़ होने वाले लोगों को पढ़ाने की जिम्मेदारी देते हैं। मान्यता मिलने के बाद ये प्राइवेट कॉलेज भेड़-बकरियों की तरह बच्चों को भर्ती कर लेते हैं, जिसके कारण डॉक्टर या इंजीनियर बनने वाले लोगों की संख्या में तो अच्छी-खासी वृद्धि हो जाती है, लेकिन उनकी गुणवत्ता में गारंटी का दूर-दूर तक कोई नामों-निशान नहीं होता है। ऐसे में, आज के समय में प्राइवेट संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए भी एक मापदंड होना चाहिए।

पाठ्यक्रम में क्या पढ़ना और कितने में समय में पढ़ना है… इससे भी जरुरी, कैसे पढ़ाना है… इस बात पर जोर देने की सबसे अधिक आवश्यकता है। इस बात पर अमल करके ही हम सही मायने में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बिना ज्ञान के हजारों की संख्या में प्राइवेट संस्थाओं से डॉक्टर या इंजीनियर बनने वाले बच्चों को सरकारी संस्थाओं से पढ़े बच्चों के आगे कुछ समझा ही नहीं जाता है, जिसका खामियाजा ये अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण चयन में भुगतने को मजबूर होते हैं। करियर सेट करने की उम्र में इन्हें नौकरी पाने के लिए न जाने कितने ही पापड़ बेलने पड़ते हैं। वहीं, दूसरी तरफ नौकरी न मिलने पर फिर ये ही लोग सारा का सारा दोष सरकार पर मढ़ देते हैं।

मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, क्या आप बाज़ार से सबसे खराब गुणवत्ता वाली वस्तु खरीदना पसंद करते हैं? नहीं न.. तो फिर आप कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि पैसों से डॉक्टर और इंजीनियर की डिग्री खरीदने वाले बच्चों को, कोई भी कंपनी या संस्थान नौकरी देने की इच्छुक होगी……

पैसों से खरीदी गई ये डिग्रीज़ बच्चों को क्या ही ज्ञान दे सकेंगी? मैं यह मानता हूँ कि बच्चों को रट्टू तोता बनाकर अच्छे नंबर लाने की भेड़चाल में शामिल करने के बजाए, उसकी इच्छा के अनुरूप प्रत्यक्ष ज्ञान लेने के लिए प्रोत्साहित करने की जरुरत है। आप ही बताइए न कि यदि हर व्यक्ति डॉक्टर और इंजीनियर बन जाएगा, तो बाकि के व्यवसाय कौन करेगा? सब्जी कौन बेचेगा? घर कौन बनाएगा? आप अपने कपड़े सिलवाने कहाँ और किसके पास जाएँगे? आप घर का सामान किस से खरीदेंगे? क्या इस भेड़चाल से दुनिया चल पाएगी?

पैसे देकर डॉक्टर और इंजीनियर की डिग्री खरीदने और बेरोजगार घूमने से बेहतर है, आप किसी अन्य क्षेत्र में मेहनत करके डिग्री हासिल करें, जो भविष्य में आपके काम आ सके।

वो वास्तव में आप बनना चाहते हैं, वहीं बनने पर ध्यान दें, जिससे आपको रोजगार मिले और आप उस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करके सफलता हासिल कर सकें। ऐसा नहीं है कि सिर्फ बच्चों के प्रयास से ही चीजों को बदला जा सकता है, इसके लिए यह बहुत आवश्यक है कि माता-पिता भी अपने बच्चे की रूचि के अनुसार उससे विषय चुनने की आजादी दें, क्योंकि जिस काम को हम खुशी से करते है, उसमें सफलता मिलना निश्चित होता है।

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