इस बार चलते हैं उल्टी सैर पर..

पंगत में बैठकर खाना खाते लोग और आज की बुफे शादी का दृश्य

समय के पहिए के घूमने के साथ रहन-सहन के तरीके, परम्पराओं, अन्य तौर-तरीकों और यहाँ तक कि लोगों की विचारधाराओं में भी बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं। बड़े दिनों बाद कल एक परिचित के यहाँ शादी में जाना हुआ, तब मैंने यह बात गौर की, कि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है.. बड़ा ही शानदार माहौल था। तैयारियाँ देखते ही बनती थीं। मेहमानों का भी खूब जमावड़ा लगा हुआ था। एक से बढ़कर एक बढ़िया-बढ़िया पकवान, आँखें न हटें, ऐसी साज-सज्जा, चारों तरफ दुनिया भर के रंग.. सब कुछ था उस शादी में, सिवाए रौनक के..

बुफे था, सो चारों तरफ स्टॉल के नाम से मशहूर टेबल सजी हुई थीं, लज़ीज़ स्वाद और हर स्टॉल की अपनी खासियत.. सभी लोग अपने-अपने ग्रुप में खड़े हुए चीनी की भारी-भरकम थाली का असहनीय वजन संभालते हुए.. सब अपने स्टैण्डर्ड को मेन्टेन करने में लगे थे, न ही कोई ऊँची आवाज़ में बात करने वाला उस शादी में था। मुझे बड़ा ही अधूरा-अधूरा सा महसूस हुआ, बस फिर क्या था, मैं अपने पुराने दिनों की उल्टी सैर पर चल पड़ा। लाखों रुपए खर्च करके भी इस बुफे और इसके खाने में वह आनंद नहीं था, जो हमारे समय में होने वाली पंगतों में आया करता था.. आज-कल की शादियों में कुछ जाने-माने वाक्य तो जैसे विलुप्त ही हो चुके हैं।

चल रही पंगत कितनी देर में उठेगी, इसका गणित लगाना और अपनी बारी आने पर जल्दी से सबसे पहले अंदर पहुँचना और अपने साथ वालों के लिए जगह रोकना; चप्पल को खुद के ही पीछे छिपा लेना, ताकि चोरी न हो जाए; वह सब्जी देने वाले को हमारा गाइड करना, “हिला के दे” या “तरी-तरी देना”; उँगलियों के इशारे से दो एक्स्ट्रा लड्डू और गुलाब जामुन लेना; फूली हुई पूड़ी छाँट-छाँट कर और गरम-गरम लेना; पंगत के पीछे वाली पंक्ति में झाँक कर देखना कि क्या-क्या आ गया, अपनी तरफ क्या आना बाकी है और जो बाकी है, उसके लिए जोर से आवाज लगाना; रायते वाले पर नज़र गढ़ाकर रखना और दूर से ही उसे अपने पास आता देखकर फटाफट रायता पीकर दोना खाली कर देना; चाहिए हमें, लेकिन फिर भी पास वाले रिश्तेदार की पत्तल में जबरदस्ती पूड़ी रखवा देना..

कुछ भी कहो, हमारे दिनों की बात ही अलग थी। मेरा मानना है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है, हमारे बाद की कोई भी पीढ़ी शायद ही इतने बदलाव देख सके। 1950 के दशक से 2024 तक का समय ऐसा है, जिसकी यात्रा करने वाले लोगों ने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट, बैरंग खतों से लेकर लाइव चैटिंग और पारंपरिक खेलों से लेकर वर्चुअल मीटिंग तक, सब कुछ बदलते हुए देखा है।

हम वह आखिरी पीढ़ी हैं, जिनके मिट्टी के घर भी आलीशान महल हुआ करते थे। हम वह पीढ़ी हैं, जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर और यहाँ तक की बिजली के बिना ही बचपन गुज़ारा है और चाँदनी रातों में डीबरी, लालटेन और बल्ब की पीली रोशनी में अपना होम वर्क किया है और दिन के उजाले में चादर के अंदर छिपा कर नॉवेल्स पढ़ी हैं। हमने अपनों के लिए अपने जज़्बातों को खतों में लिखकर भेजा है और उन खतों के जवाब आने का महीनों तक इंतजार किया है। आज के समय में मैसेज 10 मिनट सीन न हो, तो लोग परेशान हो जाते हैं। इसलिए उन्हें यह सब कुछ अजीब लग सकता है, लेकिन यह हमारे जीवन का सबसे प्यारे हिस्सों में से एक था।

गिल्ली-डंडा और कंचे भी अब कहाँ खेले जाते हैं.. हम वह आखिरी पीढ़ी हैं, जिनके पास होम वर्क करने के बाद भी घंटों का समय बच जाया करता था.. हमने टीचर्स से खूब मार खाई है और घर में शिकायत करने पर घरवालों से भी उतनी ही मार खाई है। इंक रबर कहाँ हुआ करते थे हमारे पास.. हमने तख्ती पर कलम से लिखा है।

हम वह आखिरी पीढ़ी हैं, जो अपने घर के तो छोड़, अपने मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्गों की भी इज्जत करते थे और साथ ही उनसे इतना डरते थे कि उन्हें दूर से देख कर ही भाग कर अपने घर आ जाया करते थे। बड़े-बूढ़ों की इज्जत करने से लेकर उनसे डरने और आँखों की मर्यादा भी हमारी पीढ़ी तक ही सीमित रह गई।

दातून का इस्तेमाल भी हमसे बेहतर और कौन ही जान सकता है? हमने रेडियो पर बीबीसी की खबरें, विविध भारती, ऑल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे प्रोग्राम्स शिद्दत से सुने हैं। हमने वह माहौल अपनी आँखों से देखा है, जब रामायण और महाभारत के प्रसारण से पहले हर रात नौ बजे गलियाँ सुनसान हो जाया करती थीं।

शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव करना, उसके बाद चादरें बिछा कर पूरे परिवार का साथ में छत पर सोना और फिर सुबह जब नींद खुले, तो खुद को कमरे में पाना.. हमने अपने आसपास सबसे खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास समझने और बाँटने वाले लोग देखे हैं, जिन्हें अपनों का मोल अपने स्टैण्डर्ड से अधिक हुआ करता था।

हम आज के भारत की एकमात्र पीढ़ी हैं, जिसने अपने माता-पिता की बात भी मानी और अब बच्चों की भी मान रहे हैं।

अब न ही वो रिश्ते हैं और न ही अब छतों पर चादरें बिछा करती हैं। न ही पंगतों का आयोजन होता है और न ही जल्दी-जल्दी रायते के दोने खाली होते हैं। उल्टा किसी को देख वह रायता भी शर्म से दोने में ही रखा रह जाता है, जब तक वह इंसान सामने से चला न जाए.. अब कहाँ कोई जगह रोकता है अपनों के लिए.. अब कहाँ अपने दिल के करीब लोगों से गली के ओटले पर बैठकर मन को हल्का करने वाली बातें होती हैं, घंटों का इतना अनमोल समय अब कहाँ बचा है लोगों के पास, महीनों या सालों में कभी एक-आध बार मिल लें, तो बहुत बड़ी बात है। आज के युवा हमसे पूछते हैं कि क्या हमें कभी तनाव नहीं हुआ, जो उन्हें आज के समय में होता है.. यह उन सभी युवाओं को जवाब है कि मन की बात किसी से कर लेने से सारे तनाव उसी ओटले पर पड़े रह जाते थे, जिस पर बैठकर हम अपनों से बातें किया करते थे, इससे सिर्फ हमारा मन ही हर दिन हल्का नहीं हुआ करता था, बल्कि अपनी परेशानियों के समाधान भी हमें उन चर्चाओं से मिल जाया करते थे। आज के बच्चे किसी से घुलना-मिलना ही नहीं जानते, मन में बातों को पालकर बैठते हैं, सो समस्या बाहर निकल कैसे सकेगी आप ही बताइए?

हम वो खुशनसीब लोग हैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है। अब समय है इस मिठास से नई पीढ़ी को भी अवगत कराने का, ताकि दुनियादारी और दिखावे की अंधी दौड़ में बरबस ही भागने के बजाए वे भी इन सुनहरे पलों को जी सकें।

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