हर दिन के नियम की तरह कल शाम जब मैं मंदिर गया, तो कुछ लेट हो गया। तब तक आरती का समय हो चला था, तो मैं वहीं रुक गया। आरती के लिए जैसे ही शंख बजा, मंदिर में मौजूद सभी लोग एक जगह जमा हो गए। और फिर शंख और घंटी की मधुर आवाज के साथ आरती शुरू हुई। वहाँ मौजूद सभी लोग भी एक स्वर में जोर-जोर से आरती गाने लगे और उस आध्यात्मिक माहौल का आनंद लेने लगे। उनके साथ मैं भी उस माहौल में रम गया। उस शाम आनंद तो आया ही, लेकिन एक बात और अच्छी लगी, वह यह कि उस शाम आरती में शामिल होने वाले लोगों में बड़ी संख्या में युवा थे और 17-18 साल के बच्चे इतनी स्पष्टता और गौरव के साथ आरती और संस्कृत के मंत्र बोल रहे थे, मानों सालों से संस्कृत पढ़ रहे हों। आज की पीढ़ी को इस तरह देखकर मन को बड़ा सुकून मिला साथ ही खुशी भी हुई।
आजकल हमारे देश में ये नज़ारे अक्सर देखने को मिल जाते हैं। जगह-जगह सत्संग और भजन-पूजन के आयोजन होते रहते हैं और इन आयोजनों में युवा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। युवाओं में हमारी संस्कृति के लिए रुझान देखकर बड़ा अच्छा लगता है। युवाओं का हमारी संस्कृति की तरफ रुझान तेजी से बढ़ रहा है। आजकल के बच्चे जहाँ टेक्नोलॉजी को अपना मान बैठे हैं, वहीं, युवाओं का झुकाव योग, आध्यात्म, आयुर्वेद और संस्कृत जैसे विषयों की तरफ बढ़ रहा है। देश में गुरुकुल परंपरा फिर से पनप रही है। इन सभी पहलुओं को देखकर यह माना जा सकता है कि शायद हम फिर से अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं।
कुछ समय पहले तक संस्कृत और आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ना पुराने ज़माने की सोच माना जाता था। लोगों का मानना था कि इन विषयों का अब कोई भविष्य नहीं बचा है। संस्कृत कॉलेजों में गिनती की सीटें हुआ करती थीं और वो भी खाली रह जाती थीं। गुरुकुलों की यह हालत थी कि देश में इक्का-दुक्का गुरुकुल ही रह गए थे, वो भी छात्रों की राह देखा करते थे। लेकिन, आज का माहौल बिल्कुल अलग है। आज के युवा योग, आध्यात्म और आयुर्वेद जैसे विषयों में भी गहन रूचि ले रहे हैं। जहाँ पहले इन विषयों में 10-15 सीटें भी नहीं भर पाती थीं, वहीं आज इन विषयों को पढ़ने के लिए युवा हरिद्वार, वृंदावन और ऋषिकेश की ओर रुख कर रहे हैं। हमारे प्राचीन विषय अब स्वरोजगार का माध्यम बन रहे हैं।
दशकों तक मैकाले शिक्षा पद्धति की पैरवी करने के बाद हमें अब यह समझ आने लगा है कि यदि हमें हमारी पीढ़ी का सर्वांगीण विकास करना है और एक बेहतर भविष्य देना है, तो फिर से गुरुकुल पद्धति की ओर लौटना ही होगा। शायद यही कारण है कि लोग गुरुकुल व्यवस्था को फिर से अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। हाल ही में, कहीं पढ़ने में आया था कि गुरुकुल व्यवस्था को नई शिक्षा नीति में जोड़ा जाएगा।
हमारे पवित्र शहरों में गुरुकुल की स्थिति में भी सुधार आ रहा है, लोग फिर से अपने धर्म और संस्कृति से जुड़ रहे हैं। फिर से प्राचीन विषयों में रुझान देखने को मिल रहा है। लोग वेदों और पुराणों के अध्ययन में भी रूचि ले रहे हैं। एक समय, जहाँ देश के ही युवा इन विषयों में रूचि नहीं लेते थे, वहाँ विदेशों तक से लोग आकर योग और आध्यात्म सीख रहे हैं। संस्कृत सीखना और बोलना एक नया ट्रेंड बन रहा है। इन सभी उदाहरणों से तो बात साफ है कि हम फिर से अपनी पुरानी संस्कृति की ओर यू टर्न ले रहे हैं। यह तो वही बात हो गई कि “जान बची तो लाखों पाए, लौट के बुद्धू घर को आए”, या फिर “देर आए, दुरुस्त आए”।