“करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निशान॥”
कवि वृंद रचित ”वृंद सतसई” का यह दोहा पुराने समय से ही काफी प्रचलित है, जो बच्चों को स्कूल हो या घर सभी जगह सिखाया जाता है, जिसका अर्थ है कि निरंतर अभ्यास करने से मुर्ख व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है।
दरअसल इस दोहे के पीछे एक मंद बुद्धि बालक के जीवन में हुए बदलाव की कहानी छुपी है। एक समय की बात है, एक गुरुकुल में कई विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे, जिनमें से एक बालक बहुत ही मंदबुद्धि था। कई वर्ष बीत जाने पर भी उस बालक को रत्तीभर भी ज्ञान न प्राप्त हुआ। गुरुकुल के सभी विद्यार्थी उस बालक को वरधराज (बैलों का राजा) कहकर चिढ़ाया करते थे, क्योंकि वरधराज की तुलना मूर्ख से की जाती है। गुरूजी ने उसे शिक्षा देने के कई प्रयत्न किए, लेकिन उनके सभी प्रयास असफल ही रहे। इस बात से परेशान होकर एक दिन गुरूजी ने उस शिष्य को अपने पास बुलाया और उसे समझाते हुए कहा कि वह विद्यार्जन करने के लिए नहीं बना है, उसे कोई और हुनर सीखना चाहिए।
गुरूजी द्वारा कही बातों से उस बालक के मन को बहुत ठेस पहुँची। उसने दुखी होकर आत्महत्या करने का निर्णय लिया और वह कुएँ की तरफ बढ़ने लगा। जैसे ही वह बालक कुएँ पर पहुँचा, वहाँ उसने कुछ महिलाओं को कुएँ से पानी भरते देखा। वह वहीं रूककर उन महिलाओं के जाने की प्रतीक्षा करने लगा। काफी समय तक कुएँ से पानी भरती महिलाओं द्वारा बार-बार रस्सी को कुएँ के किनारे पर खींचते हुए देखकर, अचानक उस बालक का ध्यान कुएँ के किनारे लगे पत्थर पर गया, जिस पर रस्सी के कई निशान बने हुए थे। इस दृश्य को देखकर उस बालक के मन में यह ख्याल आया कि जब रस्सी जैसी कोमल वस्तु के निरंतर प्रयास करके, कठोर पत्थर पर अपने निशान बना सकती हैं, तो मैं बार-बार प्रयास करके बुद्धिमान क्यों नहीं बन सकता। जो बात मंदबुद्धि कहे जाने वाले बालक को गुरूजी इतने वर्षों न सीखा सके, वह बात एक पत्थर ने क्षणभर में सिखा दी, उसे अपने द्वारा गुरुकुल में व्यर्थ किए वर्षों का बहुत पछतावा हुआ।
उसके मन यह विचार आया कि इतने वर्षों तक वह दूसरे बच्चों द्वारा वरधराज कहे जाने पर उसने खुद की क्षमताओं को नजरअंदाज करके स्वयं को मूर्ख ही मान रहा था। लेकिन अब उस बालक को अपनी क्षमताओं का ज्ञान हो चुका था। गहन विचार करने के बाद वह बालक बड़ी प्रसन्नता के साथ गुरुकुल वापस आया और गुरूजी से कुछ समय और गुरुकुल में रहकर विद्यार्जन करने की अनुमति माँगी। गुरूजी ने उस बालक की लगन और निष्ठा को देखकर, उसे गुरुकुल में रहने की अनुमति दे देते हैं।
यह बालक आगे चलकर व्याकरण शास्त्र का प्रकांड विद्वान बना, जिसने संस्कृत व्याकरण के अद्भुत ग्रंथ “लघु सिद्धान्त कौमुदी” की रचना की और “वरदराज” नाम से विख्यात हुआ।
आज के समय में भी स्कूलों में वरधराज जैसे ही कई विद्यार्थी होते हैं, जिन्हें उनके साथियों तथा कई बार शिक्षकों द्वारा भी पढ़ाई में पीछे होने के कारण अपमानित किया जाता है। इस अपमान से आहत होकर वे खुद को कमजोर समझने लगते हैं और पढ़ाई में चाहकर भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। ऐसे में शिक्षकों का यह दायित्व बनता है कि वे ऐसे सभी विद्यार्थियों को, जो खुद को कमजोर मान बैठे हैं, उन्हें शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करें, उनके कमजोर विषयों की विशेष कक्षाएँ दें। साथ ही समय-समय पर उनका मूल्यांकन करके उनके प्रयासों के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें और उन्हें बेहतर करने का मनोबल प्रदान करें।
यदि हर स्कूल में इस प्रक्रिया को अपनाया जाए, तो कभी भी किसी बच्चे को वरधराज कहकर नहीं चिढ़ाया जाएगा। कोई भी बच्चा पढ़ाई में कमजोर नहीं रहेगा, बल्कि “वरदराज” जैसा विद्वान बनेगा।