शान दिखाना नहीं, बल्कि पेट भरना है भोजन का असली मतलब
भारत, एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ किसानों के श्रम और समर्पण से लाखों-करोड़ों लोगों को भर पेट भोजन मिलता है। सही मायने में किसान हमारे देश की रीढ़ हैं, जो अपने खून-पसीने से अपने जीवन के दिन-रात एक करके अन्न उगाते हैं। सिर्फ इसलिए, ताकि हम भूखे न रहें, वे कच्ची प्याज को हाथ से कुचलकर उसमें नमक मिलाकर बिना किसी शिकायत के भर पेट भोजन खेत और फसल की निगरानी करते हुए चुप-चाप खा लिया करते हैं। कई बार तो फसल आदि में हो रही समस्या विशेष के चलते उन्हें अपनी-भूख-प्यास का ख्याल भी नहीं रहता।
और एक हम, जो सब्जी में थोड़ा-सा नमक अधिक हो जाने पर अपनी ही माँ को दुनिया भर की बातें सुना देते हैं, और किनारे कर देते हैं परोसी हुई थाली को। और फिर यह भोजन थाली से नाली तक का सफर बड़े ही भारी मन से पूरा करता है। यह परोसी हुई थाली नहीं, माँ का असीम प्यार है, और एक किसान की खून-पसीना एक करके उगाया हुआ अन्न है। यह अपमान है उस भोजन का, जो हमें हाथों पर मिल रहा है। भोजन की कीमत कभी उन लोगों से पूछना, जो एक गिलास पानी पीकर अपने पेट को मूर्ख बना देते हैं कि तुझे भोजन मिल गया। यह अपमान है उस किसान का, जो महीनों में उपज रही फसल के लिए कई-कई दिन भूखा रहता है।
भोजन की असली कीमत वही समझ सकता है, जिसे तड़प झेलने के बाद भोजन मिलता है। यह तो फिर प्रश्न ही नहीं है कि भर पेट मिलेगा या नहीं। हमें भोजन का सम्मान करना ही नहीं आया, तब तो सवाल हमारे अस्तित्व पर आ खड़ा है, क्योंकि हम असली हकदार ही नहीं हैं कि हमें भर पेट भोजन मिले।
भोजन की बर्बादी करने में हम कोई कसर नहीं छोड़ते। शादी-ब्याह में जाना हो, भर-भर कर हर डिश का स्वाद चखना और फिर उसे चखकर बेस्वाद करार करके डस्टबिन में पूरा का पूरा फेंक देना हमारे देश में आम बात हो गई है।
खाने के बाद तब तक उस शादी, उसके भोजन और अन्य व्यवस्थाओं की पेट भरकर बुराई की जाती है, जब तक अगली शादी में भर पेट बुराई करने का मौका न आ जाए।
होटल-रेस्तरां आदि में परिवार या दोस्तों के साथ लंच या डिनर पर जाना और शान में ढेरों डिशेस ऑर्डर करने की प्रथा भी न जाने कौन हमारे देश में ले आया। ऑर्डर देने के बाद टेबल पर भोजन आने तक की भूख भी लोगों से शायद सही नहीं जाती थी, सो स्टार्टर का चलन आ गया। अब मेन कोर्स से पहले मेन्यू में नजरें स्टार्टर को ही खोजती हैं। ढेर सारे स्टार्टर्स ऑर्डर कर दिए जाते हैं। बड़ी ही साज-सज्जा के साथ टेबल पर सजाए गए ये स्टार्टर्स लोगों का पेट इतना भर जाते हैं कि फिर मेन कोर्स की भूमिका सिर्फ चखने मात्र की रह जाती है। और बस फिर क्या, पूरा का पूरा भोजन व्यर्थ।
बात यहाँ पर आकर भी नहीं रूकती, डेज़र्ट नाम के हीरो का भी इन रेस्तरां में बड़ा बोलबाला है। “खाने के बाद कुछ मीठा हो जाए” डायलॉग मारकर भर-भर कर मिठाई आदि उसी खचाखच भरे टेबल पर बुलवा ली जाती हैं। टेबल का तख्ता भी चीख-चीख कर कहता है, “मुझ पर दया करो, अब वजन नहीं सहा जा रहा”, लेकिन हमें कहाँ कुछ सुनाई देता है। उस टेबल को हम्माल समझने वाले हम लोग एक के बाद एक सामान उस पर लादते जाते हैं।
न जाने, यह कैसा चलन आ पड़ा है, जहाँ भोजन और अन्न की कद्र दिखावा मात्र रह गई है। ऐसे लोगों को बता दूँ कि भोजन का असली मतलब शान दिखाना नहीं, बल्कि पेट भरना है। मैं और मेरी उम्र का लगभग हर व्यक्ति इस बात को समझ पाएगा, क्योंकि हमें तो हमारे बड़े-बुजुर्गों ने यही सिखाया है कि अन्न का अपमान करना सीधे माँ अन्नपूर्णा का अपमान करने के बराबर है।
ज़रा सोचिए, यदि हमारी वजह से भोजन व्यर्थ हो भी रहा है, तो क्या हम इसे उन लोगों तक नहीं पहुँचा सकते, जिन्हें भोजन का एक निवाला भी नसीब नहीं होता, भर पेट भोजन तो फिर बहुत ही दूर की बात है। आपकी इस पहल से एक भूखे को भर पेट भोजन मिल जाएगा, सो अलग और उसके दिल से आपको जो दुआएँ लगेंगी, सो अलग। पहली बात तो यह कि हमें भोजन व्यर्थ करना ही क्यों है? हमें क्यों आखिर मजबूर करना है उस भोजन को थाली से नाली तक का सफर करने के लिए, जिसे किसी ने बड़ी मेहनत और प्यार से बनाया है, और जिसे किसी ने खून-पसीना एक करके महीनों की मेहनत से उगाया है? बाकि समझदार आप भी हैं, यदि मेरी उपरोक्त सभी बातें आपके दिल में स्थान बना लेंगी, तो मेरा यह लेख मैं सार्थक समझूँगा। दो पंक्तियों के साथ अपनी बात को विराम देना चाहूँगा:
उतना ही लें थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में..