क्या हम सेक्स एजुकेशन का सच्चा विज्ञान जान पाए हैं?

भारतीय समाज में सेक्स एजुकेशन के सच्चे विज्ञान पर जागरूक संवाद

यूँ तो हमारा देश संस्कृति और सभ्यता के लिए जाना ही जाता है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम संस्कृति और सभ्यता के आड़े सत्य को न जानें। जैसा कि पिछले आर्टिकल में मैंने बात की थी कि हमारे एजुकेशन सिस्टम में सेक्स एजुकेशन का क्या स्थान है? उसी को आगे बढ़ाते हुए, अतीत में सेक्स एजुकेशन को लोगों द्वारा एक बात करने योग्य विषय माना ही नहीं गया। जहाँ हमारा समाज झूठे और बेतुके दावे करता है कि “सेक्स एजुकेशन युवाओं को अधिक सेक्स की ओर ले जाती है, जिससे एसटीडी और अवांछित गर्भधारण का खतरा बढ़ जाता है।” हालाँकि, इसके विपरीत, शोध से पता चलता है कि सेक्स एजुकेशन से स्पष्ट रूप से यौन गतिविधियों में वृद्धि नहीं होती है। उदाहरण के लिए, यूथ रिस्क बिहेवियरल सर्विलांस सर्वे (वाईआरबीएसएस) के निष्कर्षों से पता चलता है कि हाई स्कूल के छात्रों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 40%) पहले से ही सेक्स में संलग्न है, और सेक्स एजुकेशन या इसके अभाव का इस आँकड़े पर कोई प्रभाव नहीं है।

महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को सेक्स एजुकेशन के अंतर्गत जानकारी देना समय की माँग है और पुरुषों को अधिक, क्योंकि कहीं न कहीं जेंडर बायस्ड सबसे ज्यादा पुरुष ही होते हैं। महिला और पुरुषों की दोस्ती सामान्य हो, ताकि पुरुषों को महिलाओं की समस्याओं से रूबरू होने का मौका मिले, उन्हें मालूम पड़े कि उनकी दोस्त/पत्नी/प्रेमिका/बहन/बेटी या अन्य महिला, जिससे वे परिचित हैं, को महीने के उन दिनों (पीरियड्स) किस परेशानी से गुजरती है, ताकि वे अपनी महिला सहकर्मी पर उन दिनों का बहाना बनाने का आरोप लगा कर ठहाके न लगाएँ और कुछ संवेदनशील बनें। इसका परिणाम यह होगा कि कोई भी महिला उन दिनों की परेशानी अपने पुरुष मित्र से शेयर कर सकेगी और आवश्यकता पड़ने पर उससे सहायता भी ले सकेगी। इस बात से दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि पीरियड एक बायलॉजिकल प्रोसेस है, ना कि शर्म का विषय। वैसे तो मुझे इस बात पर हँसी आती है कि अभी-भी हमारा समाज महिला और पुरुष की दोस्ती को ही सामान्य नहीं कर पाया है और बात हम सेक्स एजुकेशन की कर रहे हैं। खैर!

ओशो ने तो समाज के युवाओं को सेक्स के संबंध में चेताते हुए कहा भी है, “हजारों साल से पीढ़ियाँ सेक्स से भयभीत रही हैं। तुम भयभीत मत रहना। तुम समझने की कोशिश करना उसे। तुम बात करना। तुम सेक्स के संबंध में जो आधुनिक खोजे हुई हैं, उनके बारे में पढ़ना, चर्चा करना और समझने की कोशिश करना।”

अपने बच्चों और जूनियर्स को सेक्स एजुकेशन समझाने या बताने में कोई हिचक ना करें। इस हिचक ने आपके और मेरे पुराने ख्यालों की वजह से लम्बे दशक से सेक्स जागरुकता का गला घोंट रखा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी राष्ट्र में सेक्शुअल विज्ञापन, शॉर्ट मूवी, फोटोज, ऐप और तो और समाज में व्याप्त फैलती रेप और छेड़छाड़ की खबरें इत्यादि जो हमारे बच्चों व जूनियर्स के मन को कुंठित और भयभीत करती हैं, वो कई प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए उनके विचार को बार-बार उकसाती हैं। ऐसे में, जब बच्चे इस विषय को लेकर जागरूक नहीं रहते हैं, तो कई बार इस तरह की न जाने कितनी ही अंजान गलतियों के शिकार हो जाते हैं। उन्हें इस गर्त से बाहर निकालना हमारी जिम्मेदारी है, हमें इस बात की गहनता को समझना ही होगा।

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