दुनिया की शिक्षा प्रणाली लगातार बदल रही है, ऐसे में पढ़ाने के तरीके और पाठ्यक्रम में बड़ा बदलाव लाना बहुत जरूरी हो गया है। रटने और सख्त नियमों में ऐसे बदलाव किए जाने चाहिए, जहाँ छात्रों को केंद्र में रखते हुए, उनकी रचनात्मकता, सोचने की क्षमता और जिंदगी भर सीखने की ललक को जगाया जाए। और यह तो सच ही है कि हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली पुरानी पद्धतियों में फँसी हुई है, जिससे खुद से काम करने की क्षमता, कौशल जैसे आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या-समाधान का विकास रुक जाता है। तो कक्षाओं में कैसा माहौल बनाया जाना चाहिए? जाहिर है, जो जिज्ञासा जगाए, नवाचार को बढ़ावा दे और किताबों की सीमा से परे सीखने का जुनून पैदा करे।
यहाँ पर मैं एक फिल्म का उदाहरण देना चाहूँगा। फिल्म ‘तारे जमीन पर’ में दिखाया गया है कि एक 8 साल का लड़का ईशान, जिसे अपने आयु वर्ग के अन्य लोगों के साथ रंगों, पतंगों और जानवरों की दुनिया से मेल खाना मुश्किल लगता है, जो पढ़ाई और होमवर्क में अधिक रुचि रखते हैं। और शिकायत आने पर ईशान के माता-पिता उसे बोर्डिंग स्कूल में भेजने का फैसला लेते हैं। बोर्डिंग स्कूल में उसका जीवन भी कुछ अलग नहीं होता है, अपने शिक्षकों द्वारा उत्पीड़ित और अपमानित होने के बावजूद, वह कक्षा में हँसी का पात्र बना रहता है। अब जब वह घर से दूर होता है, तो वह खुद को और भी अधिक निराश व हीन महसूस करता है और उसे अपनी असमर्थताओं से निपटना कठिन लगता है।
राम शंकर निकुंभ (आमिर खान) को बोर्डिंग स्कूल में अस्थायी कला शिक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है। अन्य शिक्षकों के विपरीत, जो बच्चों को शिक्षित करने में निश्चित मानदंडों का पालन करते हैं, राम उन्हें किताबों से बाहर, कक्षा की चार-दीवारी के बाहर सोचने और उनकी कल्पनाओं को चित्रित करने के लिए प्रेरित करते हैं। ईशान को छोड़कर कक्षा का प्रत्येक बच्चा अत्यधिक उत्साह के साथ प्रतिक्रिया देता है। राम ईशान और उसकी समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं।
वे ईशान के माता-पिता और अन्य शिक्षकों को यह एहसास दिलाते हैं कि वह असामान्य नहीं है, बल्कि अपनी ही प्रतिभाओं वाला एक बहुत ही विशेष बच्चा है। समय, धैर्य और देखभाल के साथ राम ईशान के आत्मविश्वास के स्तर को बढ़ाने में सफल होते हैं। और इस तरह फिल्म के अंत में, ईशान एक प्रतिभाशाली कलाकार बन जाता है। वह अपनी कला के माध्यम से दुनिया को बदलने का सपना देखने लगता है।
ऐसी शिक्षा प्रणाली हमारे स्कूलों में क्यों नहीं अपनाई जा सकती? जहाँ छात्र वास्तविक समस्याओं को हल करने वाली परियोजनाओं में सक्रिय रूप से शामिल हों सकें, जो न सिर्फ उनकी समस्या-समाधान की क्षमता बढ़ाए, बल्कि उनकी पढ़ाई में उद्देश्य और प्रासंगिकता को भी बढ़ाए। मेरे हिसाब से याद करने से ज्यादा, ज्ञान को व्यवहार में लाने पर ध्यान देने से छात्र भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर रूप से तैयार होंगे।
पारंपरिक रोजगार के लिए छात्रों को तैयार करने के बजाए, ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की जाना चाहिए, जिससे छात्र चुनौतियों को अवसरों के रूप में देखें और उनका समाधान विकसित करने के लिए जुट जाएँ। ऐसी शिक्षा प्रणाली न केवल नौकरी की चाह रखने वालों को तैयार करती है, बल्कि व्यक्तियों को नौकरी देने वाले बनने के लिए भी तैयार करती है, जो आर्थिक विकास और सामाजिक उन्नति में योगदान करते हैं। व्यावहारिक कौशल या ज्ञान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में एक उपाय ही नहीं, आवश्यकता भी है। हमें शिक्षा को बेहतर बनाने की जरुरत है, ताकि छात्र सीखने में रुचि लें और उन्हें अपनी रुचियों और योग्यताओं के अनुसार विकसित किया जा सके। इससे हम एक बेहतर भविष्य की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं, जहाँ हर छात्र को खोजने और सीखने का मौका मिलता रहेगा।