बच्चों को संस्कार देने से पहले, क्या हम हमारे संस्कारों पर खरे उतर रहे हैं?
हम खुद में तो झाँके कि हम कितने संस्कारी हैं?
संस्कारों पर बात पहले भी की जा चुकी है, आगे भी करते रहने की जरूरत रहेगी और तब तक रहेगी जब तक हम उस संस्कार के पेड़ के नीचे वापस न बैठ जाएँ। यह बड़े बुजुर्गों और समाज का वह पेड़ है, जो हमें हमेशा ही छाया देता है।
हम संस्कार की बात करते हैं। क्यों करते हैं? जब हम अपने इर्द-गिर्द ऐसा कुछ देखते हैं, जो हमें मजबूर करता है सोचने पर। हाल ही की बात है, एक शिक्षक मित्र के घर पर बैठा था। दरवाजे पर एक वृद्ध आए, उनका छोटा-सा बेटा दौड़ते हुए आया और बोला- पापा-पापा “कोई आदमी आया है”। जब उन्होंने बाहर जाकर देखा तो उस बच्चे के दादाजी के कोई मित्र थे, जो उनसे मिलने आये थे। वे शिक्षक हैं, फिर भी उन्होंने टोंकना भी जरूरी नहीं समझा कि “कोई आदमी आया है” यह क्या है? कभी उस बच्चे ने अनजाने में ही सुना होगा और आज वही बोल भी दिया तो उसे वहीं पर सिखाया जाना चाहिए था।
बच्चे वही करते हैं, जो वे हमें करते हुए देखते हैं। हम में से अधिकांश लोग दिनभर बच्चों के सामने मोबाइल चलाते हैं। तो बच्चे सोचते हैं, यही एक वस्तु जीवन में सबसे जरूरी है। हमने तो यह भी देखा है कि किसी का बच्चा अगर थोड़ा बहुत रोता है या खाना खाने में आनाकानी करता है, तो माता-पिता बच्चों को चुप करने के लिए या खाना खिलाने हेतु तुरन्त मोबाइल पकड़ा देते हैं।
यदि बच्चे संस्कारों को भूल रहे हैं, तो इसका एक कारण एकल परिवार भी है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तब घर के बड़े-बुजुर्ग खाली समय में बच्चों को कई कहानियाँ सुनाते थे, जिनमें बातों ही बातों में उन्हें ज्ञान का भंडार मिल जाया करता था। अब बच्चे के माता-पिता दोनों ही नौकरी करते हैं। तो बच्चे को जन्म से ही घर में नौकरानी या पड़ोसी के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
और बच्चा उनके आचरण सीख लेता है। आज जब बच्चा देखता है कि माता-पिता अधिकतम समय स्मार्ट फोन, फेसबुक और इंस्टाग्राम में बिता रहे हैं, तो वह बच्चा भी टीवी के कार्टून और यूट्यूब से शिक्षा ग्रहण करता है। क्योंकि आज के स्कूल कोई ऐसी शिक्षा नहीं देते, जो संस्कार सिखा सकें। नैतिक शिक्षा और संस्कारों की कोई स्पेशल बुक भी तो नहीं मिलती बाज़ार में कि चलो यह भी इंस्टेंट सीख लें।
संस्कार घर से ही शुरु होते हैं। जब घर के बड़े ही आपको अपने संस्कारों के बारे में नहीं समझाते, तो आप इधर-उधर भटकने लगते हैं। इसलिए यह बात सही भी है कि आजकल के बच्चे संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। यदि ऐसा है भी तो बच्चे हमें देखकर ही सीखते हैं। तो पहले हम स्वयं से प्रश्न पूछे.. क्या हम हमारे संस्कारों पर खरा उतर रहे हैं? क्या मनुष्य के माता-पिता ऐसे होते हैं? अरे! पेट भरना तो जानवर भी सिखा ही देते हैं अपने बच्चों को। तो हममें और जानवर में क्या अंतर? सोचिएगा जरूर..