भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता, समावेशिता और निरंतर विकास है। इस लोकतंत्र की आत्मा में महिलाओं का नेतृत्व एक ऐसी सशक्त धारा के रूप में उभरा है, जो न केवल सत्ता के शीर्ष पदों पर काबिज है, बल्कि समाज के हर वर्ग को न्याय, अवसर और सम्मान प्रदान करने में अग्रणी भूमिका भी निभा रही है। आज...
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भारतीय राजनीति में अपनी सादगी और साहस से इतिहास रचने वाले छोटे कद के बड़े राजनेता
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ नेतृत्व की ऊँचाई कभी सेंटीमीटर या फीट में नहीं नापी जाती, बल्कि यह जनता के विश्वास की गहराई और दूरदर्शी फैसलों की स्पष्टता से तय होती है। आज सोशल मीडिया के दौर में जहाँ नेता की मंचीय उपस्थिति, बॉडी लैंग्वेज और शारीरिक हाइट को बहुत महत्व दिया जाता है, वहाँ...
Continue reading...भारतीय राजनीति में अपनी दिव्यांगता को ताकत बनाकर नई दिशा गढ़ने वाले प्रमुख चेहरे
भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ नेतृत्व कभी शारीरिक क्षमता या रंग-रूप से नहीं नापा जाता, बल्कि जनता के विश्वास और संघर्ष की भावना के साथ दूरदर्शी सोच से तय होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे अनेक और महान नेता हुए हैं, जो नेत्रहीनता, पैरालिसिस या अन्य गंभीर शारीरिक स्थितियों का सामना करते हुए...
Continue reading...तो क्या नीतीश कुमार होंगे देश के अगले राष्ट्रपति?
भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहाँ सत्ता के शीर्ष पर होने वाली नियुक्तियाँ केवल योग्यता का पैमाना नहीं होतीं, बल्कि वे भविष्य के दशकों की राजनीति तय करने वाले सुनियोजित समीकरण होते हैं। वर्ष 2027 में वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल पूर्ण होने जा रहा है। जैसे-जैसे यह समय निकट आ रहा है, दिल्ली के सियासी...
Continue reading...‘जेन-ज़ी’ की सियासी भाषा को कैसे समझें राजनीतिक दल?
भारतीय गणराज्य की सबसे निर्णायक ताकत उसकी युवा आबादी में है। 18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के करोड़ों युवा वोटर आज चुनावी नतीजों का सबसे बड़ा, सबसे प्रभावशाली तथा सबसे परिवर्तनकारी फैक्टर बन चुके हैं। जेन-ज़ी की यह नई, ऊर्जावान, जागरूक तथा महत्वाकांक्षी पीढ़ी पुरानी राजनीतिक भाषा, पुरानी शैली, पुरानी रणनीतियों तथा पुरानी सोच से पूरी तरह अलग,...
Continue reading...इंदिरा से सोनिया तक, मनमोहन से राहुल तक; कितनी बदल गई कांग्रेस
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास केवल एक राजनीतिक दल की यात्रा नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और उसकी लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने तक, कांग्रेस देश की राजनीति की धुरी बनी रही। आजादी के बाद के शुरुआती दशकों को यदि कांग्रेस का स्वर्णिम कालखंड कहा जाए, तो...
Continue reading...भारतीय राजनीति में पुनरुत्थान की रणनीति के सात सूत्र
भारतीय लोकतंत्र में कोई भी हार अंतिम नहीं होती। यहाँ जनता किसी दल को हमेशा के लिए खारिज नहीं करती, बल्कि समय-समय पर उसे आईना दिखाती है। इतिहास गवाह है कि जो दल इस आईने में खुद को ईमानदारी से देख लेता है, वही दोबारा सत्ता के शिखर तक पहुँचता है। कांग्रेस की 1980 की वापसी हो, तृणमूल कांग्रेस का...
Continue reading...मंडल बनाम कमंडल: वह द्वंद्व, जिसने गढ़ा आधुनिक भारत का राजनीतिक भूगोल
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ दशक ऐसे रहे हैं, जिन्होंने आने वाली सदियों की दिशा तय की है। 1990 का दशक भी ऐसा ही एक प्रस्थान बिंदु था। यदि हमें समकालीन भारत की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट को समझना है, तो हमें दो शब्दों की गहराई में उतरना होगा, मंडल और कमंडल। यह केवल दो विचारधाराओं का टकराव नहीं...
Continue reading...वैचारिक संघर्ष से सत्ता के शिखर तक, ऐसा रहा भाजपा के उदय का सफर
भारतीय राजनीति के पन्नों में भारतीय जनता पार्टी का उदय यूँ तो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, लेकिन इसके पीछे दशकों का पसीना और वैचारिक तपस्या है। आज जो पार्टी दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में खड़ी है, उसकी नींव संघर्षों की ऐसी ठोस जमीन पर रखी गई थी, जहाँ जीत की उम्मीद कम और...
Continue reading...कम होती पीएम मोदी की लोकप्रियता
हमने पिछले डेढ़ दशक के दौरान भारतीय राजनीति को कई परिदृश्यों में बदलते देखा है। कैसे कुछ बेहतर सोशल मीडिया कैंपेन्स के दम पर एक राज्य तक सीमित राजनेता राष्ट्रीय चेहरा बन गया और सत्ता के केंद्र में स्थापित हो गया। जाहिर है, बात पीएम मोदी की हो रही है, जिन्होंने लगातार तीन बार न केवल देश का प्रधानमंत्री बनने...
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