2026

ज़िंदगी दिखावे से ज्यादा, जीने की चीज़ है.. भूल बैठी है नई पीढ़ी

मोबाइल में उलझी नई पीढ़ी और रिश्तों की दूरी

एक समय था जब घरों में खामोशी इबादत की तरह होती थी, लेकिन अब तो खामोशी भी बेहद डरावना रूप ले चुकी है। एक समय वह भी था जब रिश्ते धीरे-धीरे परिपक्व होते थे, अब तो इंस्टेंट कॉफी की तरह बनने और टूटने लगे हैं। यह एक ऐसा कड़वा सच है, जिसके दलदल में नई पीढ़ी धीरे-धीरे फँसती चली जा...

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दादी माँ 

गाँव में पशु-पक्षियों को दाना देती दादी माँ

अब दादी माँ हमारे साथ नहीं हैं.. उनके साथ बिताए दिन यादों के पुराने संदूक में छिपे बैठे हैं। जो कभी हमारी पहचान थीं, वो यादें अब धुँधला-सी गई हैं। दादी माँ तो किसी पुराने संदूक की तरह गाँव में ही छूट गईं, और हम अपने खास-खास सामान के साथ बड़े-बड़े शहरों में आकर बस गए। क्या सोच रहे हैं??...

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पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं…….

पिंजरे में कैद पक्षी और पराधीनता का दर्द

रामचरित मानस की यह चौपाई बताती है कि किसी के अधीन रहना कितना बड़ा अभिशाप होता है। हमारे धर्मिक ग्रन्थ हमें बहुत सी ऐसी बातें बताते हैं, जिन्हें स्वयं अनुभव करना कोई नहीं चाहेगा। उन्हीं में से एक है, पराधीनता…. हर कोई स्वतंत्रता चाहता है फिर चाहे वह इंसान हो या पशु-पक्षी। बात जब पशु-पक्षी की चली है, तो मैं...

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दान-पुण्य के झूठे ढकोसलें

जीते जी उपेक्षित माता-पिता, मरने के बाद दान-पुण्य

संसार का यह नियम है, जो इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन अपना जीवन काल पूरा करके मृत्यु को प्राप्त करना ही है। लगभग सभी धर्मों की यह मान्यता है कि किसी के मरने के बाद उसके लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस व्यक्ति के मरने के बाद न जाने कितनी ही वस्तुओं का दान किया...

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क्वांटिटी ओवर क्वालिटी से बढ़ रही बेरोजगारी

डिग्री होने के बावजूद बेरोजगार युवा भारत में

आज के समय में हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने। भले ही वे खुद किसी भी पेशे से हो, फिर भी वे अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं। अब इस दौड़ में और दुनिया की होड़ में यह कैसे संभव है कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में...

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अपना दाम खोटा, परखैया का क्या दोष..?

पार्क में सुबह सैर करते स्वस्थ बुजुर्ग और मोबाइल में उलझे युवा

पहले के ज़माने में लोग ‘पहला सुख निरोगी काया’ को मानते थे। पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद शाम को चौपाल पर बैठकर किस्से-कहानियाँ सुनाया करते थे। उस समय मोबाइल और टीवी नाम के दानव नहीं हुआ करते थे। इसलिए लोग अपना समय बातों-बातों में बड़ी-बड़ी सीख देने वालीं ज्ञान की बातें एक-दूसरे से साझा किया करते थे। वह भी...

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क्या हम लौटने लगे हैं अपनी जड़ों की ओर?

मंदिर में आरती करते युवा और भारतीय संस्कृति से जुड़ती नई पीढ़ी

हर दिन के नियम की तरह कल शाम जब मैं मंदिर गया, तो कुछ लेट हो गया। तब तक आरती का समय हो चला था, तो मैं वहीं रुक गया। आरती के लिए जैसे ही शंख बजा, मंदिर में मौजूद सभी लोग एक जगह जमा हो गए। और फिर शंख और घंटी की मधुर आवाज के साथ आरती शुरू हुई।...

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इस बार चलते हैं उल्टी सैर पर..

पंगत में बैठकर खाना खाते लोग और आज की बुफे शादी का दृश्य

समय के पहिए के घूमने के साथ रहन-सहन के तरीके, परम्पराओं, अन्य तौर-तरीकों और यहाँ तक कि लोगों की विचारधाराओं में भी बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं। बड़े दिनों बाद कल एक परिचित के यहाँ शादी में जाना हुआ, तब मैंने यह बात गौर की, कि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है.. बड़ा ही शानदार माहौल था।...

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गरीबी का ब्रांड

सड़क किनारे मेहनत करते गुमनाम विक्रेता और कारीगर

ब्रांड वह शब्द है, जिसने दुनियाभर में तहलका मचा रखा है। यह सिर्फ एक लेबल नहीं है; यह एक धारणा है, जो हमारे विचारों को प्रभावित करती है। आज की दुनिया में हर कोई ब्रांडेड सामान की तलाश में रहता है। चाहे वह कपड़ा, खाना, इलेक्ट्रॉनिक्स या कोई अन्य दैनिक आवश्यकता की चीज़ हो, हर चीज़ को खरीदने से पहले...

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एक प्यारी-सी जिद…

बच्चों की जिद और फेरीवाले की मुस्कान

बचपन की वो सुनहरी यादें.. याद है जब हम अपनी छोटी-छोटी जिदें पूरी करने के लिए बड़ों से रूठ जाया करते थे। कभी गुलाबी रंग का गुब्बारा चाहिए, तो कभी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। घुँघरू वाले झुनझुने की खनक या फिर मुँह में मिठास घोलते गुलाबी-गुलाबी गुड़िया के बाल.. इन छोटी-छोटी चीज़ों के लिए की गई हमारी जिद, हमारे बचपन की उन...

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