आज के समय में हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने। भले ही वे खुद किसी भी पेशे से हो, फिर भी वे अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं। अब इस दौड़ में और दुनिया की होड़ में यह कैसे संभव है कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में...
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अपना दाम खोटा, परखैया का क्या दोष..?
पहले के ज़माने में लोग ‘पहला सुख निरोगी काया’ को मानते थे। पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद शाम को चौपाल पर बैठकर किस्से-कहानियाँ सुनाया करते थे। उस समय मोबाइल और टीवी नाम के दानव नहीं हुआ करते थे। इसलिए लोग अपना समय बातों-बातों में बड़ी-बड़ी सीख देने वालीं ज्ञान की बातें एक-दूसरे से साझा किया करते थे। वह भी...
Continue reading...क्या हम लौटने लगे हैं अपनी जड़ों की ओर?
हर दिन के नियम की तरह कल शाम जब मैं मंदिर गया, तो कुछ लेट हो गया। तब तक आरती का समय हो चला था, तो मैं वहीं रुक गया। आरती के लिए जैसे ही शंख बजा, मंदिर में मौजूद सभी लोग एक जगह जमा हो गए। और फिर शंख और घंटी की मधुर आवाज के साथ आरती शुरू हुई।...
Continue reading...इस बार चलते हैं उल्टी सैर पर..
समय के पहिए के घूमने के साथ रहन-सहन के तरीके, परम्पराओं, अन्य तौर-तरीकों और यहाँ तक कि लोगों की विचारधाराओं में भी बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं। बड़े दिनों बाद कल एक परिचित के यहाँ शादी में जाना हुआ, तब मैंने यह बात गौर की, कि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है.. बड़ा ही शानदार माहौल था।...
Continue reading...गरीबी का ब्रांड
ब्रांड वह शब्द है, जिसने दुनियाभर में तहलका मचा रखा है। यह सिर्फ एक लेबल नहीं है; यह एक धारणा है, जो हमारे विचारों को प्रभावित करती है। आज की दुनिया में हर कोई ब्रांडेड सामान की तलाश में रहता है। चाहे वह कपड़ा, खाना, इलेक्ट्रॉनिक्स या कोई अन्य दैनिक आवश्यकता की चीज़ हो, हर चीज़ को खरीदने से पहले...
Continue reading...एक प्यारी-सी जिद…
बचपन की वो सुनहरी यादें.. याद है जब हम अपनी छोटी-छोटी जिदें पूरी करने के लिए बड़ों से रूठ जाया करते थे। कभी गुलाबी रंग का गुब्बारा चाहिए, तो कभी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। घुँघरू वाले झुनझुने की खनक या फिर मुँह में मिठास घोलते गुलाबी-गुलाबी गुड़िया के बाल.. इन छोटी-छोटी चीज़ों के लिए की गई हमारी जिद, हमारे बचपन की उन...
Continue reading...मेरा काम ही मेरी पहचान है….
एक शाम मैं अपने घर की बालकनी में अपने कुछ मित्रों के साथ बैठा था कि अचानक तेज बारिश आ गई। सुहावनी शाम और तेज बारिश में याद आई गरमा-गर्म चाय और पकौड़ों की.. बात जब पकौड़ों की चली, तो हर कोई शहर में सबसे स्वादिष्ट पकौड़े कहाँ मिलते हैं, इस पर अपनी राय परोसने लगा.. कोई कहता कि पकौड़े...
Continue reading...लोगों का भला भी करते चलें..
जीवन की आपाधापी में ऐसे न जाने कितने ही काम हैं, जो बेशक हमें जिम्मेदारी के साथ करने होते हैं, लेकिन हमारी शान-ओ-शौकत के नीचे कुचलकर वे दम तोड़ देते हैं.. आलिशान बंगले, महँगी गाड़ियाँ, संभाले न संभले ऐसी धन-दौलत, नाम, रुतबा और भी न जाने कितने ही भारी-भरकम शब्द घोंट देते हैं गला उन लोगों का, जिनके जीवन के...
Continue reading...कठिनाइयों के बीच खड़ी उम्मीद……
शहर की हलचल भरी सड़कों पर, हॉर्न बजाते शोर और तेज़ कदमों की आवाज़ के बीच, हमारे दैनिक जीवन के गुमनाम नायक मौजूद होते हैं। ये लोग, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है और कम ही सराहा जाता है, हमारे शहरी जीवन के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। फिर भी, उनकी चुनौतियों और बाधाओं से भरी यात्रा पर शायद ही कभी...
Continue reading...चंद रुपयों का सौदा….
आजकल की दिखावे की दुनिया में यह देखना वाकई निराशाजनक है कि मानव स्वभाव कितना उथला हो सकता है। हम अक्सर वास्तविक मायने रखने वाली चीजों के बजाए चमक-दमक वाली चीजों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। दिखावे का यह जुनून हमारे समाज की प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह दर्शाता है कि हम अक्सर इस बात...
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