बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख

भारत में असमान बचपन की सच्चाई

बचपन जीवन का सबसे खूबसूरत दौर होता है। बचपन के वो खेल-खिलौने, वो यार-दोस्त ही तो जीवनभर की मीठी याद बन जाते हैं, जो जीवन के कठिन दौर में भी कभी याद आ जाए, तो मन को थोड़ा सुकून और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान दे जाती है। लेकिन, बचपन की मासूमियत और उसकी मिठास का एहसास हर किसी के नसीब में नहीं होता। कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो बचपन की इस मीठी यादों का आनंद कभी नहीं ले पाते हैं। उनका बचपन संघर्ष और अभाव की छाया में पलता है।

हमारे दो भागों में बंटे हुए समाज में एक तरफ ऐसे बच्चे हैं, जिनके लिए हर दिन किसी जादुई कहानी जैसा होता है, जहाँ उनके सपनों की उड़ान में कोई रुकावट नहीं आती। इन बच्चों के पास सब कुछ होता है, जैसे- खेलने के लिए खिलौने, पढ़ने के लिए किताबें, पहनने के लिए नए कपड़े और खाने के लिए पौष्टिक भोजन आदि। माता-पिता की ममता और सुरक्षा का घेरा भो होता है, जो उन्हें हर दुःख से बचाता है। वे जो चाहते हैं, उन्हें मिल जाता है। वहीं, दूसरी तरफ वे बच्चे हैं, जो हर सुबह सूरज के साथ जागते हैं, मगर उनका दिन भूख और संघर्ष की भयावह दास्तान में डूब जाता है। इनके पास न तो अच्छे कपड़े हैं, न पर्याप्त खाना, न ही पढ़ाई का साधन। वे बच्चे जिनके पास सब कुछ होते हुए भी वे उसकी कद्र नहीं करते, और दूसरी तरफ वे बच्चे जिनके पास कुछ भी नहीं होते हुए भी वे छोटी-छोटी चीजों में संसार की सबसे बड़ी खुशी पा जाते हैं।

मेरे एक परिचित के बेटे आर्यन की कहानी यहाँ उदाहरण के रूप में पेश करता हूँ। उसके माता-पिता उसके हर ख्वाब को पूरा करते हैं। नई साइकिल, महंगे वीडियो गेम्स, रंग-बिरंगे कपड़े, आर्यन को सब कुछ मिलता है। आर्यन के पास जो भी आता है, वह उसे जल्दी ही पुराना और बेमजा लगने लगता है। उसकी नई साइकिल अब कोने में पड़ी धूल खा रही है। उसके वीडियो गेम्स उसे बोर करने लगे हैं। आर्यन की आँखों में वह चमक ही नहीं है, जो उसकी उम्र के बच्चों में होना चाहिए। न ही इस बात की कद्र उसे है कि माता-पिता कितने लाड़-दुलार से उसकी हर इच्छा पूरी करते हैं। उसके पास सब कुछ है, फिर भी वह खुश नहीं है। उसके पास रोज नई माँगें और नई शिकायतें होती है। कभी बैटरी से चलने वाली कार चाहिए, क्योंकि पुरानी कारों में अब मजा नहीं आता, तो कभी नया वीडियो गेम चाहिए, क्योंकि उसके बाकी दोस्तों के पास है, लेकिन उसके पास नहीं है।

दूसरी ओर, एक छोटे-से गाँव में रहता है सुनील, जिसके घर में रोटियों की महक कम ही आती है। उसकी माँ बीमार है और पिता का कोई अता-पता नहीं है। वह कम उम्र में ही अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने लगा है। उसके पास न तो खेलने का समय है और न ही पढ़ाई की सुविधा। सुनील सुबह होते ही अपने छोटे-छोटे कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर निकल पड़ता है। वह सड़क किनारे एक चाय की दुकान पर काम करता है। सुनील की जिंदगी में खेलने-कूदने का समय नहीं है। उसके लिए हर दिन एक संघर्ष है। लेकिन जब कभी उसे एक छुट्टी मिलती है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उसके लिए एक पुरानी किताब, किसी के फेंके हुए खिलौने, या खाने के लिए कुछ मिल जाना भी बहुत बड़ी बात है। सुनील की आँखों में वह चमक है, जो आर्यन की आँखों में नहीं। उसकी मासूम मुस्कान उसके संघर्षों की कहानी कहती है।

इस असमानता को देखकर अंदर ही अंदर मेरा दिल टूट जाता है। दिल में एक टीस उठती है। एक तरफ वे बच्चे हैं, जिनके पास सब कुछ होते हुए भी वे संतुष्ट नहीं हैं, और दूसरी तरफ वे बच्चे हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं है फिर भी वे छोटी-छोटी चीजों में खुशियाँ ढूँढ लेते हैं। यह असमानता केवल हमारे समाज की बेरुखी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी भी है कि हमें इन बच्चों के लिए कुछ करना होगा। सरकार और समाज को मिलकर ऐसे उपाय करने होंगे, जिससे हर बच्चे को शिक्षा, भोजन, और एक सुरक्षित बचपन मिले। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी बच्चे को अपनी खुशियों के लिए संघर्ष न करना पड़े। बचपन का हर पल अनमोल है और हर बच्चे को इसका आनंद लेने का अधिकार है।

आखिर में, यह समाज और हम सब की जिम्मेदारी है कि हम अपने-अपने हिस्से की भूमिका निभाएँ और इन बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करें। जब तक समाज में इस तरह की असमानता रहेगी, तब तक हमारी जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी बच्चा आधारभूत जरूरतों से वांछित न रह पाए।

बस दो पल उन बच्चों के लिए दया दिखा देने से हमारी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि यह एक नई शुरुआत है। यह शुरुआत है एक ऐसे समाज की, जहाँ हर बच्चा अपनी मासूमियत और खुशियों का पूरा हकदार हो। यह एक ऐसी दुनिया की शुरुआत है, जहाँ हर बच्चे को, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में जन्मा हो, उसे सपने देखने, सीखने और बढ़ने का मौका मिले। जिस दिन हम यह कर पाएँगे, उस दिन हम सच में प्रगति की ओर अग्रसर हो पाएँगे।

हमारे देश में विडंबना यही है कि यहाँ लोग दिखावा करने में लगे हैं। किसने कितनी महँगी शादी की, किसकी शादी में ज्यादा व्यंजन थे? दिखावे की इस दौड़ में लोग यह भूल जाते हैं कि अधिकता हर चीज की बुरी होती है और जरुरत से ज्यादा बनवाया गया भोजन भी व्यर्थ ही जाता है।

मुझे लगता है जितना पैसा लोग दिखावे के लिए साजो-सज्जा में खर्च करते हैं, उतने पैसों का भोजन बनवाकर यदि गरीबों को खिलाया जाए तो देश से शायद भुखमरी जैसे राक्षस का सर्वनाश किया जा सकता है। उनकी दुआएँ लगेंगी, सो अलग। और हम सभी जानते हैं कि जहाँ दवा काम नहीं करती, वहाँ दुआ काम करती है। हम सभी को पाश्चात्य सभ्यता को भूलकर भारतीय सभ्यता के तौर-तरीके फिर से अपनाने चाहिए। व्यंजनों की प्रदर्शनी वाले भोजन के तरीके की जगह टेबल-कुर्सी पर बैठकर कराए जाने वाले तरीके को अपनाना चाहिए, ताकि लोग भर-पेट भोजन भी कर सकें और खाना व्यर्थ भी न हो। लोग इस विधि को अपनाकर ‘एक पंत दो काज’ जैसी कहावतों को सार्थक बना सकते हैं।

Share