भारतीय राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी तो पूरी, लेकिन भागीदारी कम

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को दर्शाती महिला नेता और ग्रामीण चुनावी कार्यक्रम

कुछ समय पहले मुझे एक गाँव के चुनावी कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ की स्थानीय राजनीति के बारे में सुनने और समझने का मौका मिला। जब मैं कार्यक्रम में पहुँचा, तो सबसे पहले मेरी नज़र वहाँ उपस्थित लोगों की भीड़ पर पड़ी, जिनमें से ज्यादातर पुरुष थे। महिलाएँ भी थीं, पर उनकी संख्या नगण्य थी और जो थीं भी, वो चुपचाप बैठी थीं। इस स्थिति को देखकर एक सवाल मेरे मन में उठा, आखिर क्यों हमारे देश की महिलाएँ, जो हर क्षेत्र में इतना आगे बढ़ चुकी हैं, राजनीति में अब तक अपनी जगह नहीं बना पाई हैं? जिस देश में रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला और सुषमा स्वराज जैसी महान महिलाओं का इतिहास है, वहाँ आज भी राजनीति में महिलाओं की इतनी कमी क्यों है? 

भारत में महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए सरकार ने 33% आरक्षण का प्रावधान किया है, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्र में नेतृत्व कर सकें। फिर भी, हमारे संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। इस बार लोकसभा में चुनी गईं महिला प्रतिनिधि नई संसद का केवल 13.63 फीसदी हिस्सा हैं, जो कि बहुत ही निराशाजनक है। अब सवाल यह उठता है कि जब हमारे देश की आबादी का आधा हिस्सा, जो हर क्षेत्र में आगे है, तो फिर राजनीति में इनकी संख्या इतनी कम क्यों है?  

यदि हम भारत के इतिहास पर नज़र डालें, तो हमें कई महान महिला शासक और नेता दिखाई देती हैं। रानी लक्ष्मीबाई ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अहिल्याबाई होल्कर ने अपनी अद्वितीय प्रशासनिक क्षमता से पूरे राज्य का संचालन किया। वहीं, सावित्री बाई फुले जैसी समाज सुधारक ने स्त्रियों की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए। परन्तु, आज की स्थिति में राजनीति में महिलाओं की कमी स्पष्ट दिखाई देती है। हालाँकि आज भी अनुप्रिया पटेल, निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी, मायावती और ममता बनर्जी जैसी कुछ महिलाएँ अपनी मेहनत और दृढ़ता के दम पर राजनीति में जगह बना पाई हैं। 

हमने महिलाओं को उच्च पद पर भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाते हुए देखा है। फिर चाहे बात हमारी वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की हो, उत्तर प्रदेश की गवर्नर आनंदीबेन पटेल की हो या फिर देश की पहली महिला राष्ट्रपति रहीं प्रतिभा पाटिल की हों। महिलाओं ने हर पद पर खुद को साबित किया है। लेकिन, आज भी ज्यादातर महिलाएँ इस क्षेत्र में आने से कतराती हैं। जबकि, विदेशों में महिलाएँ बड़े-बड़े पदों पर हैं, चाहे वे जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल हों, न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न हों या इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी। ये महिलाएँ न केवल नेतृत्व कर रही हैं, बल्कि अपने देशों की नीतियों को भी सही दिशा में ले जा रही हैं। तो फिर भारत में ऐसी स्थिति क्यों नहीं है? 

इस स्थिति पर गहराई से विचार करने पर मुझे इस कमी के कई कारण दिखाई पड़ते है, जो विशेष कर हमारी सामाजिक संरचना और सोच से जुड़े हुए हैं। हमारे समाज में राजनीति को पुरुष प्रधान माना जाता है, वहीं महिलाओं को अक्सर घरेलू दायित्वों तक सीमित कर दिया जाता और इससे दूर रहने के लिए कहा जाता है। उन्हें सिखाया जाता है कि उनका काम परिवार की देखभाल करना है, और राजनीति जैसी जिम्मेदारी भरी चीजें पुरुषों के लिए हैं। इस सोच के कारण बहुत सी महिलाएँ राजनीति में आना ही नहीं चाहतीं। उन्हें बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि उनकी पहली जिम्मेदारी उनका घर परिवार होना चाहिए। इसके चलते कई बार वे राजनीति जैसे समय और समर्पण की माँग करने वाले क्षेत्र में उतर ही नहीं पाती हैं।   

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हमारे देश में राजनीति के क्षेत्र की नकारात्मक छवि बनी हुई है। राजनीति को अक्सर हिंसा, भ्रष्टाचार, षडयंत्र और झगड़ों से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए  महिलाओं के लिए यह क्षेत्र सुरक्षित नहीं माना जाता। खासकर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में यह धारणा और भी मजबूत होती है, जिससे महिलाएँ राजनीति में कदम रखने से हिचकिचाती हैं। 

महिलाओं के पीछे रहने का एक कारण भेदभाव भी है। आज भी कई राजनीतिक दलों में महिलाओं को टिकट देने और प्रमुख पदों पर बैठाने में हिचकिचाहट देखी जाती है। महिलाएँ यदि राजनीति में आती भी हैं, तो उन्हें अक्सर पुरुषों के मुकाबले कम महत्वपूर्ण भूमिकाएँ दी जाती हैं। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आज भी महिलाओं की शिक्षा का स्तर कम है। राजनीति में आने के लिए न केवल शिक्षा, बल्कि सही जागरूकता की भी आवश्यकता होती है, जिससे महिलाएँ राजनीति में अपनी भूमिका समझ सकें। 

हालाँकि, समस्या बड़ी है, लेकिन इसका समाधान असंभव नहीं है। कुछ कदम उठाकर हम इस स्थिति को बदल सकते हैं। इसका सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है महिलाओं को शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता प्रदान करना। यदि महिलाएँ शिक्षित होंगी और उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जानकारी होगी, तो वे राजनीति में आने का साहस कर पाएँगी। इसके लिए सरकार और सामाजिक संगठनों को जागरूकता अभियानों की शुरुआत करनी चाहिए, जिसमें महिलाओं को राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जाए। महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान तो है, लेकिन इसे सही ढंग से लागू करने की जरूरत है। पंचायत स्तर पर तो यह आरक्षण लागू है, लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है। इससे महिलाओं को राजनीति में प्रवेश के लिए एक मजबूत आधार मिलेगा। 

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उन्हें सुरक्षित और समर्थनपूर्ण माहौल देने की जरूरत है। राजनीतिक पार्टियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिलाओं को राजनीति में समान अवसर और सुरक्षा मिले। साथ ही राजनीतिक दलों को महिलाओं के प्रति अपनी नीति में बदलाव लाना होगा। उन्हें महिला नेताओं को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाना चाहिए और उनकी क्षमता पर भरोसा करना चाहिए। जब महिलाएँ नेतृत्व की भूमिकाओं में होंगी, तो यह समाज के अन्य महिलाओं के लिए भी एक प्रेरणा बनेगा। मीडिया को भी महिलाओं की राजनीति में भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए। जब मीडिया में महिला नेताओं की सफलता की कहानियाँ प्रमुखता से दिखाई जाएँगी, तो समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। 

भारत में महिलाओं की राजनीति में कमी एक गंभीर मुद्दा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमारे देश की महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, चाहे वह शिक्षा हो, विज्ञान हो या फिर खेल। तो राजनीति में उनकी नगण्य उपस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके लिए उचित उपाय करना बेहद आवश्यक है। आधी आबादी की नेतृत्वकर्ता को सिर्फ 14 फीसदी या 33 फीसदी आरक्षण देने से काम नहीं चलेगा। 50-50 का अनुपात यहाँ भी करने की जरूरत है। यदि हम महिलाओं को सही अवसर और समर्थन देंगे, तो वे राजनीति में भी उसी तरह चमकेंगी, जैसे वे अन्य क्षेत्र में जैसे किसी कंपनी की सीईओ, मैनेजर डायरेक्टर या फिल्मी सितारों के रूप में सफल हो रही हैं। यह समय है कि हम सभी, चाहे वह सरकार हो, राजनीतिक दल हों या फिर समाज के सदस्य, इस दिशा में ठोस कदम उठाएँ और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा दें। महिलाएँ सिर्फ परिवार नहीं, देश की भी नेतृत्वकर्ता बन सकती हैं, हमें सिर्फ उन्हें सही अवसर देने की जरूरत है। 

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