छात्र उपस्थित, शिक्षक अनुपस्थित

सरकारी स्कूल की खाली कक्षा में बैठे छात्र जहाँ शिक्षक की अनुपस्थिति भारत में शिक्षा संकट को दर्शाती है

‘बिना शिक्षक के कक्षा’, यह कुछ ऐसा है, जैसे बिना हवा और पानी के हमारी पृथ्वी

नई अटेंडेंस: बच्चे! प्रेज़ेंट टीचर.. टीचर! एब्सेंट बच्चों..

बिना शिक्षक के शिक्षा.. कितना अजीब लग रहा है न यह पढ़कर? ज़रा कल्पना करके देखिए एक ऐसे गुरुकुल की, जिसमें कोई गुरु ही न हो और फिर भी शिष्य उस गुरुकुल में शिक्षा या कोई विद्या सीखने के लिए उपस्थित हों, और तो और बिना यह जाने कि वह विद्या सीख सका या नहीं, अवधी पूरी होने पर उसे उत्तीर्ण होने का प्रमाण भी मिल जाए। क्या मेरी तरह ही इसकी कल्पना आप भी नहीं कर सके?

शिक्षक की परिभाषा सिर्फ प्रशिक्षक तक ही सीमित नहीं है, वे हमारा उचित मार्गदर्शन करते हैं, ताकि हम हमेशा ज्ञान के मार्ग पर चलें। बावजूद इसके आधुनिक भारत में शिक्षकों के महत्व को नज़रअंदाज करने का चलन दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। आज के नए दौर में भी शिक्षा के मामले में हम काफी पिछड़े हुए हैं और एक कठोर वास्तविकता का सामना कर रहे हैं, जहाँ बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के ढोल की तेज़ आवाज़ के पीछे शिक्षकों का मोल गूँगा हो गया है।

हमारे देश में कई छोटे गाँव और कस्बे ऐसे हैं, जहाँ स्थायी शिक्षकों का अभाव हमेशा ही बना रहता है। यह मुद्दा वहाँ जाकर दम तोड़ देता है, जब कुछ स्कूलों में पर्याप्त मात्रा में शिक्षक तो हैं, लेकिन स्कूल आकर बच्चों को पढ़ाना उचित नहीं समझते। या तो उन्हें अपनी सुख-सुविधाओं से बहुत अधिक मोह है, या फिर वे भी मान चुके हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, हमारे देश में शिक्षा का स्तर सुधर ही नहीं सकता है। देश में कई छोटे क्षेत्रों में ऐसे स्कूल हैं, जहाँ महीनों से शिक्षक स्कूल ही नहीं आए हैं। ऐसे में, इस बात का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है कि हमारे बच्चों का भविष्य किस अँधेरे गर्त में जा रहा है।

हमारे भारत का नालंदा, तक्षशिला और मिथिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों के लिए पूरी दुनिया में नाम और सबसे अलग पहचान है, आज वही भारत कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी का सामना कर रहा है। हमारी शैक्षिक विरासत की नींव कमजोर हो चली है, वह दिन दूर नहीं जब यह अपने साथ बेहतर भविष्य की पूरी ईमारत को अपने साथ ढहा ले जाएगी। आखिर, इस भयावह स्थति तक हम पहुँचे कैसे? उस समय को हम कहाँ दफ्न कर आए, जब कहा जाता था कि शिक्षक ही ज्ञान का अंतिम स्रोत हैं? यह समय आखिर आया कैसे, जहाँ न जाने कितने ही स्कूल पर्याप्त शिक्षकों या स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। ‘बिना शिक्षक के कक्षा’, यह कुछ ऐसा है, जैसे बिना हवा और पानी के हमारी पृथ्वी।

यह चिंताजनक प्रवृत्ति हमारी शिक्षा प्रणाली की प्राथमिकताओं और जिस दिशा में यह आगे बढ़ रही है, उस पर ढेरों सवाल उठाती है। हम हमेशा ही शिक्षा के क्षेत्र में अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों के ढोल पीटते रहते हैं, यह कब तक चलेगा? सच कहें, तो ऐतिहासिक उपलब्धियों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं, फिर किस बात की तारीफें? तारीफें करने का हमें इतना ही शौक है, तो क्यों हम पुरानी परंपरा को बरकरार नहीं रखते? क्या तारीफों से शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा? क्या तारीफों से शिक्षक स्कूलों में आने लगेंगे? क्या तारीफों से शिक्षकों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास हो जाएगा? हमारे देश में कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहाँ पर्याप्त और योग्य शिक्षकों तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक संसाधनों का भारी अभाव है। और जहाँ पर्याप्त शिक्षक हैं, वहाँ वे बच्चों के भविष्य और शिक्षा दोनों का गला घोंटने का कार्य कर रहे हैं।

एएसईआर की 2023 की रिपोर्ट ने बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इस रिपोर्ट की मानें, तो कई स्कूल शिक्षकों की थोड़ी बहुत नहीं, बल्कि 25% अनुपस्थिति दर का सामना कर रहे हैं। यह उन बच्चों के ऊपर बिना किसी गलती की जोरदार चपत है, जो उचित मार्गदर्शन और बेहतर शिक्षा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यही चलता रहा, तो आने वाले समय में शिक्षकों की जगह छात्रों को शिक्षकों की अटेंडेंस लेना पड़ेगी।

बतौर उदाहरण बात करूँ, तो गाजियाबाद के एक सरकारी स्कूल में 150 छात्र नियमित रूप से उपस्थित होते हैं, लेकिन विगत तीन वर्षों से यह स्कूल स्थायी शिक्षकों की अनुपस्थिति की मार झेल रहा है, जिसके कारण कक्षाएँ अक्सर जल्दी छूट जाती हैं। छात्रों के अनुसार, वर्ष 2022 से अब तक सात शिक्षकों को स्कूल में नियुक्त किया जा चुका है, लेकिन एक भी शिक्षक यहाँ तीन महीने से अधिक समय तक नहीं ठहरा। झारखंड के पाकुड़ में एक स्कूल ऐसा है, जहाँ एक मात्र पदस्थापित शिक्षक हैं। वे स्कूल ही नहीं जाते और कभी जाते भी हैं, तो किसी पिकनिक स्पॉट की तरह टहलकर वापस चले जाते हैं। उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता ही नहीं। शिक्षक के नहीं आने से बच्चे भी स्कूल नहीं आते हैं।

जयपुर की स्थिति भी उतनी ही चिंताजनक है। राजस्थान में लगभग 5,000 स्कूलों को उच्च कक्षाओं में अपग्रेड किया गया है, लेकिन किसी अतिरिक्त शिक्षक की नियुक्ति पर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया है। शिक्षकों की गंभीर कमी और कक्षाओं की अनियमितता इसके सबसे बुरे परिणामों में से एक के रूप में उभरे हैं। साथ ही, संबंधित स्कूलों में पढ़ने वाले बेगुनाह छात्र बेवजह इसकी सज़ा भुगतने को मजबूर हैं। राज्य के शिक्षा विभाग को 77,000 शिक्षकों की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में सिर्फ 26,000 शिक्षक ही कार्यरत हैं। इसे शिक्षकों का अकाल कहना गलत होगा क्या? मुझे नहीं लगता कि गलत होगा, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रों को यदि अपना आधे से अभी अधिक साल उचित शिक्षा के अभाव में बिताना पड़ रहा है, तो विषय बहुत गंभीर है, और इससे मिलने वाले परिणाम और भी अधिक गंभीर। बहुत शर्म की बात है कि छात्र शिक्षा लेने के लिए उपस्थित है, लेकिन उचित शिक्षा अनुपस्थित।

उत्तर प्रदेश भी इस संकट से पिछड़ा नहीं है। प्राथमिक विद्यालयों में 77 प्रतिशत शिक्षक पद रिक्त हैं और माध्यमिक विद्यालयों (कक्षा VI से VIII) में यह रिक्ति दर 40 प्रतिशत तक है। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के मानकों के अनुसार, राज्य के शहरों में 3,906 प्राथमिक विद्यालयों में 14,939 शिक्षक होने चाहिए, लेकिन केवल 3,390 शिक्षक ही कार्यरत हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों की बात करें, तो 1,198 विद्यालयों में 4,430 शिक्षकों के पद रिक्त हैं, लेकिन इसके मुकाबले लगभग आधे यानि केवल 2,630 शिक्षक ही कार्यरत हैं।

ये आँकड़ें महज़ आँकड़ों से कहीं अधिक हैं। ये उस कटु वास्तविकता को खींच-खींच कर हमारे सामने ला रहे हैं, जिससे ‘आधुनिक भारत’ आज जूझ रहा है। इन मासूम बच्चों की जिम्मेदारी कौन लेगा, जिनका स्कूलों में नामांकन तो है, इतना ही नहीं, वे हर दिन बेहतर शिक्षा की आस में स्कूल भी जा रहे हैं, लेकिन उनके हिस्से में सिवाए शिक्षक की अनुपस्थिति के कुछ भी नहीं आ रहा है। आखिर उनका कसूर क्या है? यह ठहराव और प्रणालीगत उपेक्षा की एक गंभीर तस्वीर को उजागर करता है।

शिक्षा कोई विलासिता नहीं है, बल्कि यह एक मौलिक अधिकार है। बावजूद इसके, भारत का सार्वजनिक शिक्षा व्यय, सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3% है, जो यूनेस्को की 6% की सिफारिश से काफी कम है। फंडिंग की इस भारी कमी का ही परिणाम है कि भीड़भाड़ वाली कक्षाएँ, अपर्याप्त शिक्षण सामग्री और शिक्षक गैर-शिक्षण कर्तव्यों से अभिभूत हो जाते हैं।

एक तरफ, तो हम आधुनिक कक्षाओं और डिजिटल शिक्षा की बड़ी-बड़ी बाते करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, छात्र एक उचित शिक्षक खोजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कारण कि छोटे क्षेत्रों के शिक्षा स्तर से किसी को लेना-देना ही नहीं है।

हालात ये हैं कि कई स्कूलों में, एक ही शिक्षक 50 से अधिक छात्रों का प्रबंधन अकेले करता है। इसी स्थिति में, प्रभावी शिक्षा की परछाई भी मुझे दूर तलाक नज़र नहीं आती।

भले ही हम वर्ष 2030 तक शिक्षा के स्तर में सुधार करके इसे गुणवत्तापूर्ण बनाने की बात करते हैं, लेकिन हमारे देश शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति बिल्कुल विपरीत कहानी बयाँ करती है। निवेश और समर्थन की कमी का सबब यह है कि यह धीरे-धीरे देश में एक संकट का विकराल रूप ले रहा है, जहाँ शिक्षा की बुनियादी जरुरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। यह हमारी प्राथमिकताओं के गंभीर पुनर्मूल्यांकन का समय है।

ज़रा सोचिए, बिना पढ़े और बिना आधारभूत जानकारी प्राप्त किए इन बच्चों को उत्तीर्ण की मार्कशीट मिल रही है। इस स्थिति में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद ये बच्चे नौकरी आदि के लिए कैसे इंटरव्यू फेस करेंगे और कभी इसमें निकल भी गए, तो बिना ज्ञान के आगे काम कैसे करेंगे?

हमारे शैक्षिक लक्ष्यों और स्कूलों की वास्तविकता के बीच का अंतर बहुत बड़ा है और यह लगातार बढ़ रहा है। इस अंतर को खत्म करने और यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त आवश्यकता है इस पर काम करने की कि भारत में प्रत्येक बच्चे को वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, जिसका वह हकदार है। यह मुद्दा महज़ शिक्षा का नहीं है, बल्कि यह मुद्दा है सामाजिक न्याय और देश की प्रगति का।

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