बचपन के भी दो चेहरे

भारत की सड़क पर स्कूल जाते बच्चे और फुटपाथ पर बैठे गरीब बच्चे – बचपन के दो चेहरे का सामाजिक दृश्य

बचपन के भी दो चेहरे हैं.. यह तथ्य आपको तब सत्य होता दिखाई देगा, जब आप खुद के आवरण से बाहर आएँगे, और अपने आस-पास के लोगों पर भी ध्यान देंगे.. हमारे देश की चहल-पहल भरी सड़कों पर बच्चों की अलग ही दुनिया हमें देखने को मिलती है.. लेकिन, उन मासूमों के जीवन में जो प्रतिकूल स्थितियाँ देखने को मिलती हैं, वे हमारे सामूहिक अज्ञान और सामाजिक विफलता का मार्मिक आईना हमें दिखाती हैं।

एक तरफ, हम उन बच्चों को देखते हैं, जो रंग-बिरंगे बैग, साफ-सुथरी यूनिफॉर्म और हँसते-खेलते चेहरों के साथ हर दिन स्कूल जाते हैं। हर साल नई किताबों, स्टेशनरी और यूनिफॉर्म प्राप्त करने वाले ये बच्चे अपने होमवर्क, प्रोजेक्ट और आर्ट और क्राफ्ट क्लासेस के बारे में बड़े ही उत्साह से बातें करते हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता शायद आने वाली परीक्षा या फिर अब तक पूरा न हो सका होमवर्क हो सकता है। इन बच्चों को एक प्रगतिशील समाज के सृजन के लिए उम्मीद की किरण के रूप में समझा जाता है, एक ऐसा समाज, जो शिक्षा को महत्व देता है और अपने बेहतर भविष्य को लेकर बड़ा ही चिंतित रहता है।

दूसरी ओर, इन्हीं सड़कों के कोनों में मौजूद होते हैं एक और वर्ग के बच्चे, जिन पर अक्सर चाह कर भी किसी का ध्यान नहीं जाता.. या यूँ कह लें कि कोई ध्यान देना ही नहीं चाहता.. ये बच्चे अक्सर आपको नंगे पाँव और फटे-पुराने कपड़ों में किसी गली या नुक्कड़ पर बैठे हुए या घूमते हुए मिल जाएँगे। ये वही बच्चे हैं, जिनके पास भारी-भरकम स्कूल बैग तो नहीं होता, लेकिन उससे भी कई गुना अधिक से भी भारी उनके बचपन का बोझ है, जिसका उन्हें असली में बोध भी नहीं है। उनका जीवन स्कूल की घंटियों से नहीं, बल्कि जीवित रहने के अथक प्रयास से भरा होता है। उनकी कक्षाएँ स्कूल से अधिक सड़कों पर लगती हैं, उनके पाठ किताबी नहीं, बल्कि सहनशक्ति और धैर्य के होते हैं, और उनका होमवर्क उनकी मोटी-मोटी कॉपियाँ कम्प्लीट करना नहीं, बल्कि शाम के भोजन की तलाश करना होता है। उनके लिए, शिक्षा एक दूर का सपना है, जो भूख और निराशा की तत्काल जरूरतों से ढका होता है।

सच में इस अंतर में बहुत पीड़ा है.. यह तीव्र अंतर यह सवाल उठाता है कि क्या हम वास्तव में अपने देश को एक प्रगतिशील देश कहने के लायक हैं, वह भी तब, जब ऐसी प्रतिकूल वास्तविकताएँ और परिस्थितियाँ एक साथ अस्तित्व में होती हैं और हम अनजान बने इनका सामना किए जा रहे हैं? शिक्षा हर बच्चे का मौलिक अधिकार है, फिर भी हम इसे हर एक बच्चे तक पहुँचाने में असफल हो रहे हैं। हमारे देश का संविधान हर बच्चे को शिक्षा का वादा तो करता है, लेकिन सच से इसका कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि लाखों बच्चों के लिए यह वादा अधूरा ही रह जाता है।

एक बार सोचिएगा उन बच्चों के बारे में भी, जो झुग्गी-बस्तियों में रहते हैं। हर सुबह जब सूरज उगता है, तब सब बच्चे स्कूल जाते हैं, लेकिन वे नहीं। जाएँ भी तो कैसे, उन्हें अपने माता-पिता या भाई-बहनों के साथ हर सुबह कचरा इकट्ठा करने जो जाना होता है। दिन भर घूम-घूम कर कचरा इकठ्ठा करते हुए उनकी उम्मीद बस इतनी-सी ही होती है कि इसमें उन्हें कुछ मूल्यवान मिल जाए, जिसे बेच कर उनके हाथ कुछ पैसा लग सके। यह कुछ पैसा आपके लिए है, लेकिन उनके लिए यह उम्मीद है रात को घर का चूल्हा जलाने की।

उनके हाथ, जो इस उम्र में पेंसिल और किताबें पकड़ने के लिए बने हैं, कचरे में से कुछ बेहतर छाँटने को मजबूर हैं। उनकी आँखें, जो ज्ञान के प्रकाश से भरी होना चाहिए, गरीबी के कटु सत्य से ढकी-मुंदी होती हैं। जहाँ एक तरफ उनकी उम्र के बच्चे गणित के सवाल हल कर रहे होते हैं, वहीं ये मासूम जीवित रहने के सबसे कठिन समीकरण हल करने को बेबस होते हैं। हमारे समाज की उपेक्षा की वेदी पर उनके जैसे हजारों-लाखों मासूमों का हर दिन बलिदान हो रहा है।

एक तरफ, समृद्ध परिवार के बच्चों को दुनिया भर की सुख-सुविधाएँ मिलती हैं, जो समय के साथ ऐशो-आराम में तब्दील होती चली जाती हैं। यही ऐशो-आराम उनके बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण होता है। माता-पिता उन्हें हर तरह की सुविधाएँ इसलिए देते हैं कि उनके बच्चे सफलता के परचम लहराएँगे और उनका नाम रोशन करेंगे, लेकिन वास्तव में होता इसका विपरीत है, क्योंकि पैसों की आड़ में ये बच्चे अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं और यही पैसा उन्हें एक दिन निगल जाता है। शिक्षा और पैसों की महत्ता उन बच्चों से पूछी जाए, जिन्हें नसीब दर-दर भटकाता है।

कितनी अजीब बात है कि एक समाज के रूप में, हम इस भारी असमानता को बिना किसी शिकायत के स्वीकार कर लेते हैं। यह जानकर भी हम जा जाने कैसे चैन की नींद सो लेते हैं कि हमारे देश के कुछ बच्चे गर्म बिस्तरों में सोते हैं, वहीं कुछ फुटपाथों पर सोते हैं। न बरसात को उन पर दया आती है और न ही ठंड को.. वे मस्त रहते हैं अपने ईंट के तकिए के साथ।

यह बेहद शर्मनाक सच्चाई है कि हमारा समाज इन वंचित बच्चों की दुर्दशा पर आँखें मूँद कर बैठा हुआ है। हम यह मानने में आज भी विफल हैं कि हर बच्चा, चाहे उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कोई भी हो, शिक्षा और एक बेहतर जीवन का समान अवसर पाने का हकदार है।

किताबों और नोटबुक से भरे स्कूल बैग का बोझ वास्तव में भारी होता है, लेकिन यह उस बोझ के मुकाबले कुछ भी नहीं है, जो वंचित बच्चे उठाते हैं। वे टूटे सपनों और खोए अवसरों का वजन उठाते हैं। वे हमारी सामाजिक उदासीनता और सरकारी उपेक्षा का खामियाजा उठाते हैं।

क्या यह ही हमारे देश की प्रगति है? मैं मानता हूँ कि प्रगति का माप केवल तकनीकी प्रगति या आर्थिक विकास से नहीं होना चाहिए, बल्कि हमारे समाज के सबसे कमजोर सदस्यों को उठाने के तरीके से होना चाहिए। सच्ची प्रगति यह सुनिश्चित करने में निहित है कि हर बच्चे को शिक्षा, पोषण और सुरक्षित वातावरण में बढ़ने और पनपने का अवसर मिले।

इस अंतर को पाटने की जिम्मेदारी केवल सरकार के कँधों पर ही नहीं है। यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें चाहिए कि हम उन तमाम पहलों का समर्थन करें, जो वंचित बच्चों को शिक्षा और बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने के लक्ष्य से चलाई जा रही हैं। हमें अपना समय, संसाधन और कौशल उन संगठनों को देना चाहिए, जो इस उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण, हमें अपने समुदायों में सहानुभूति और समझ को बढ़ावा देना चाहिए।z

हम अपने समाज को वास्तव में समान तब ही बना पाएँगे, जब हम यह कब समझेंगे कि हमारे राष्ट्र की नियति हर बच्चे के भाग्य के साथ जुड़ी हुई है? अब समय आ गया है कि हम इस सच्चाई को पहचानें और निर्णायक कदम उठाएँ ताकि कोई भी बच्चा पीछे न छूटे। तभी हम गर्व से खुद को एक सच्चे प्रगतिशील राष्ट्र कहने के काबिल होंगे।

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