मेरा काम ही मेरी पहचान है….

एक शाम मैं अपने घर की बालकनी में अपने कुछ मित्रों के साथ बैठा था कि अचानक तेज बारिश आ गई। सुहावनी शाम और तेज बारिश में याद आई गरमा-गर्म चाय और पकौड़ों की.. बात जब पकौड़ों की चली, तो हर कोई शहर में सबसे स्वादिष्ट पकौड़े कहाँ मिलते हैं, इस पर अपनी राय परोसने लगा.. कोई कहता कि पकौड़े तो शर्माजी के होते हैं, तो कोई कहता कि शहर के सबसे स्वादिष्ट पकौड़े खाने हैं, तो एलआईजी के खाइए और इस तरह यह चर्चा पकौड़ों से शुरू होकर कचोरी और जलेबी तक जा पहुँची…..

इस चर्चा में मैं एक अलग ही दुनिया में जा पहुँचा.. मेरे मन में एकाएक ही एक विचार घूमने लगा कि कितनी अजीब बात है कि जिन एलआईजी वाले के पकौड़ों की बात चल रही थी, उसे बनाने वाले व्यक्ति का न तो हम नाम जानते हैं और न ही उसका कोई बहुत बड़ा प्रतिष्ठान है, जिसके कारण वह इतना मशहूर है, लेकिन फिर भी जैसे ही बात एलआईजी के पकौड़ों की आई, वैसे ही इस चर्चा के बीच बैठा हर व्यक्ति समझ गया कि बात चौराहे पर लगे उस छोटे से ठेले की हो रही है, जहाँ बारिश के मौसम में गरमा-गर्म और स्वादिष्ट पकौड़े मिलते हैं। तो उस भले मानुष के पास ऐसा क्या है, जो उसे इतना मशहूर बना देता है? उसके पास सबसे खास है उसके पकौड़ों का वह स्वाद, जो लोगों के बीच उसकी पहचान बन चुका है।

आपके और मेरे शहर में न जाने ऐसे कितने ही स्ट्रीट वेंडर्स होंगे, जो छोटे-छोटे ठेलों पर स्वाद का खजाना लिए चलते हैं और यही स्वाद अब उनकी पहचान बन चुका है। जबकि न ही उनके पास ग्राहकों को लुभाने के लिए कोई चमक-दमक है और न ही कोई विज्ञापन या प्रचार की बाद-बड़ी योजनाएँ, फिर भी पूरे शहर में इनकी एक अलग ही लोकप्रियता रहती है।

हम यार-दोस्तों के बीच बैठकर बात भी इनकी खूब करते हैं, इनके द्वारा पेश किए जाने वाले व्यंजनों को याद कर-कर के मुँह में पानी भी ले आते हैं, जैसा कि हम दोस्तों के बीच ही अभी चल रही थी.. लेकिन, जहाँ बात बड़े लोगों के बीच उठने-बैठने की आती है, वहाँ शुरू हो जाती है दिखावा करने की प्रक्रिया, बस फिर क्या, हम उन्हें इन ठेलों पर नहीं, बल्कि शहर के बड़े-बड़े होटलों और महँगे-महँगे कैफे में ले जाते हैं.. यहाँ के व्यंजन महँगे जरूर होते हैं, लेकिन स्वाद का अता-पता तक नहीं रहता।

क्या आपको नहीं लगता कि जो इज्जत हमने इन होटलों और कैफे को दे रखी है, वही हमारे इन स्वाद के जादूगरों को भी मिलना चाहिए? क्या आपको नहीं लगता कि इन्हें भी इनकी मेहनत और प्रतिभा के आधार पर वही सम्मान दिया जाना चाहिए?

कम संसाधन और सुविधाओं के अभाव में अगर यह लोग इतना बेहतरीन काम कर रहे हैं, तो सोचिए यदि इन्हें इनकी प्रतिभा के अनुसार इज्जत और अवसर दिए जाएँ, तो फिर ये क्या नहीं कर सकते? जरुरत है हमे यह समझने की, कि जिस प्रकार हम अपने साथ बड़े-बड़े नामों को जोड़ने से नहीं हिचकिचाते, उसी तरह इन छोटे स्ट्रीट वेंडर्स को भी वही सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए इन्हें सरकार के सहयोग के साथ-साथ हमारी और से भी साथ और सम्मान की जरुरत है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वे अपनी प्रतिभा को बड़े स्तर पर ले जा सकें। इससे न सिर्फ उनका काम बढ़ेगा, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। क्या पता आज गली का जो हलवाई अपनी जलेबियों के लिए जाना जाता है, कल उसके कारण आपके शहर को जाना जाए…..

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