आज की जेलें: सुधारगृह या बिगाड़गृह?
प्राचीन समय में किसी अपराधी के लिए कारावास की सज़ा को जरुरी माना जाता था। उसके पीछे तर्क यह था कि कैदियों को एकांत कारावास में रखने से उन्हें आत्म-मंथन का मौका मिले, जिससे अपराधियों में सुधार आए। हिंदू और मुगल शासन के दौरान, अपराधियों को कड़ी निगरानी में रखा जाता था और इसका मुख्य उद्देश्य अपराधियों और आम लोगों को क्रमशः अपराध दोहराने और अपराध करने से रोकना था और इस तरह जेल की भूमिका सामने आई। तब ऐसा माना जाता था कि यहाँ रहकर अपराधी दोबारा अपराध न करने का सबक लेते हैं, इसलिए इन्हें सुधारगृह कहा जाने लगा।
लेकिन, आज के परिदृश्य में देखा जाए, तो वर्तमान में हमारे देश की जेलें सिर्फ नाम की सुधारगृह रह गईं हैं। यहाँ रहकर कैदियों में कोई सुधार हो रहा हो या नहीं, लेकिन बिगाड़ जरुर हो रहा है। यहाँ रह रहे कैदी भीड़भाड़, भेदभाव, अमानवीय व्यवहार, भ्रष्टाचार, असमानता, स्वच्छता और भोजन संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऊपर से आज की जेलें सुधारगृह कम और नए अपराधियों को तैयार करने वाली यूनिवर्सिटीज़ ज्यादा बन गई हैं, जहाँ रह कर कोई अच्छा-भला इंसान भी खूँखार अपराधी बन जाए। ऐसे माहौल में, जहाँ आए दिन हिंसा और दंगे आम हो चले हैं, हमारी जेल प्रणाली सुधार करने के बजाए नए अपराधियों को जन्म दे रही है।
इसके साथ ही, अन्य समस्याएँ भी हैं, जैसे यहाँ रहकर कैदी समाज से अलग हो जाते हैं और सज़ा पूरी होने के बाद फिर से आम जीवन शुरू करने में उन्हें सामाजिक कलंक और परिवार द्वारा उपेक्षा जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनके पास समाज में फिर से जगह बनाने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए कोई रास्ता नहीं बचता है। सब तरफ से उपेक्षा की स्थिति में ये लोग फिर से अपराध की राह पर चल पड़ते हैं और यह चक्र यूँ ही चलता रहता है। इस तरह, हमारे तथाकथित सुधारगृह में रहकर किसी का जीवन पूरी तरह बिगड़ जाता है। इस चक्र को तोड़ने के लिए इन सुधारगृहों को सच में सुधारगृह बनाना बेहद जरुरी है, ताकि यहाँ रह रहे कैदियों का जीवन सुधर सके।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जेल के भीतर जो व्यक्ति अपराधी के रूप में कैद है, वह एक जीवित व्यक्ति है, जिसे सम्मान से जीने का अधिकार है। यह उसका अधिकार है कि उसे खाने के लिए भरपूर भोजन, रहने के लिए साफ सुथरी जगह और अच्छा माहौल मिल सके। अपनी सज़ा के दौरान वह ऐसा कोई कौशल सीख सके, जिससे सज़ा के दौरान वह कुछ कमा कर अपने परिवार की मदद कर सके और सज़ा पूरी होने के बाद उसी कौशल के सहारे फिर से समाज में अपनी जगह बना सके। जिस दिन हम यह कर पाएँगे, तब जाकर ही हमारे सुधारगृह सच में सुधारगृह बन पाएँगे।
इसके लिए जेलों की वर्तमान स्थिति को सुधारना होगा। जेलों में रहने की जगह, खाना, सुरक्षा, कानूनी सलाह और अलग-अलग कक्षाएँ, जैसी मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराना होगी। कैदियों के पुनर्वास के लिए उनके कौशल विकास पर ध्यान देना होगा, जिससे जेल से निकलने के बाद वह फिर से अपराध की और न जाए और एक सामान्य जीवन जी पाए। जब कोई कैदी अपनी सज़ा पूरी करने के बाद जेल से निकलते समय कुछ सीख कर निकलेगा, जब वह फिर से समाज में अपनी जगह बना पाएगा, जब वह अपराध की और फिर से नहीं जाएगा, मेरे हिसाब से तब जेलें सही मायने में सुधारगृह कहलाएँगी।