जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफर का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक्की की, कितनी सड़कें बनीं या कितनी गगनचुंबी इमारतें खड़ी...
Continue reading...भारतीय राजनीति
क्लाइमेट चेंज का चुनावी मुद्दा ‘ग्रीन राजनीति की रणनीति’
भारतीय राजनीति में चुनावी मुद्दे समय के साथ बदलते रहे हैं। कभी विकास, कभी महँगाई, कभी रोजगार तो कभी सुरक्षा जैसे मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहे हैं। लेकिन, अब राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे केवल वैश्विक बहस तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे आम नागरिक के जीवन,...
Continue reading...अपनी भारी-भरकम कद-काठी के लिए मशहूर हुए भारतीय राजनेता
भारतीय राजनीति एक ऐसा जीवंत और विशाल रंगमंच है, जहाँ नेता का व्यक्तित्व हर कोण से परखा जाता है। यहाँ कद-काठी का अर्थ केवल शारीरिक वजन या भारी-भरकम बनावट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह विश्वसनीयता और जनता के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है। भारतीय लोकतंत्र की गौरवशाली परंपरा में ऐसे कई कद्दावर नेता हुए, जिनकी मजबूत...
Continue reading...अनुभव, ऊर्जा और राष्ट्रभक्ति से सराबोर भारत के सबसे वरिष्ठ एवं सक्रिय राजनेता
भारतीय राजनीति में अनुभव और आयु का कुछ ऐसा समन्वय देखने को मिलता है, जहाँ राजनीतिक कद या प्रभाव केवल चुनावी सफलताओं तक सीमित नहीं रहता बल्कि समय और उम्र के साथ धीरे-धीरे गढ़ा जाता है। दशकों के अथक और जटिल संघर्ष के बाद एक नेता वरिष्ठ नेता की श्रेणी में आता है। भारतीय लोकतंत्र के समृद्ध और प्रेरणादायक सफर...
Continue reading...सन् 1977 से 2026 तक, 50 वर्षों में कैसे बदली भारत की राजनीतिक विचारधारा
जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसे आने वाले पाँच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के रूप में देश को पहला...
Continue reading...घुमंतू समाज को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए जरुरी केंद्र व राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति
भारत की सांस्कृतिक विविधता में घुमंतू समाज एक अनमोल रत्न की तरह है, जो अपनी अनूठी जीवनशैली और परंपराओं के साथ देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहा है। लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से यह समाज, दशकों से अपनी खानाबदोश प्रकृति के कारण मुख्यधारा से कटा हुआ है और आज भी मूलभूत सुविधाओं व अधिकारों से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य,...
Continue reading...सरकारें घुमंतू समाज को ओबीसी का दर्जा देकर करें मुख्यधारा में जोड़ने की पहल
भारतीय संस्कृति और सभ्यता की असली ताकत इसकी विविधिता में बसती है। लेकिन, यही विविधिता कई बार कुछ समुदायों को हाशिए पर धकेलने का कारक बन जाती है। देश के घुमंतू समाज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यह समाज दशकों से उपेक्षा और असमानता का शिकार रहा है। जन्मजात अपराधी की दृष्टि से देखे गए या यूँ कहें,...
Continue reading...बुंदेलखंड की बदहाली को बदलने का दस सूत्रीय रोडमैप
बुंदेलखंड की धरती, जो कभी अपनी वीरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात थी, आज गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के अभिशाप से कराह रही है। यहाँ के गाँवों में फैली भुखमरी और अभाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार शायद इस चीख को सुनने में असमर्थ है। नीति आयोग का बहुआयामी...
Continue reading...कहाँ चले नेता जी? — चुनावी मौसम और गायब होते नेताओं पर व्यंग्य
गाँव के नुक्कड़ से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, एक सवाल हमेशा ट्रेंड करता है, जैसे चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे मुफ्त में ट्रैंड करते हैं- “कहाँ चले नेता जी?” क्योंकि नेता जी तो लुकाछिपी के खेल में व्यस्त हो जाते हैं। जब नेता जी दिख नहीं रहे हों, तब समझ जाइए कि या तो चुनाव बहुत दूर...
Continue reading...दो दलों के बीच घूमता छत्तीसगढ़ का राजनीतिक चक्रव्यूह
छत्तीसगढ़ की राजनीति का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से बिल्कुल जुदा है। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक करवटें बदली हैं। यहां के शांत दिखने वाले मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे किसी भी दल...
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