कब खुलेंगे बुंदेलखंड के घरों में लटके पलायन के जंग लगे ताले?

बुंदेलखंड में पलायन और खाली होते गाँवों को दर्शाती तस्वीर

​बुंदेलखंड.. यह केवल एक नाम या क्षेत्र नहीं है, यह शौर्य और स्वाभिमान की वह धरती है, जिसने रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों को जन्म दिया। लेकिन, आज जब हम इस माटी की ओर देखते हैं, तो समझ आता है कि वर्तमान में इस वीर धरा की सबसे बड़ी त्रासदी कोई युद्ध नहीं, बल्कि वह खामोश ‘पलायन’ है, जो हमारे गाँवों को भीतर से खोखला कर रहा है। हमारे गाँव खाली हो रहे हैं, घरों पर जंग लगे ताले लटके हैं और बूढ़ी आँखों हर आहट पर दरवाजे की ओर तकती हैं कि शायद उनका बेटा इस बार त्यौहार पर घर लौट आए। आँकड़ें बताते हैं कि 2001 में जहाँ 25 प्रतिशत आबादी पलायन कर रही थी, वह अब बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है। हर साल करीब एक लाख लोग अपना घर-बार छोड़कर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों की गुमनाम गलियों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। जाने वालों में 60 प्रतिशत से ज्यादा युवा हैं, जिनके कँधों पर इस क्षेत्र के विकास का भार होना चाहिए था, पर वे परदेस में बोझ ढो रहे हैं। यह स्थिति हृदयविदारक है, लेकिन एक रणनीतिकार के अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि यह समस्या लाइलाज भी नहीं है। हमें बस अपनी जड़ों को फिर से सींचने की जरूरत है। 

बुंदेलखंड में पलायन रोकने का सबसे कारगर तरीका यह है कि हम गाँव की उपज को गाँव में ही उद्योग का रूप दें। यहाँ दाल, मसालें और अनाज की बेहतरीन पैदावार होती है, इसलिए हर पंचायत में छोटी प्रसंस्करण इकाइयाँ, जैसे दाल और आटा मिलें लगानी चाहिए। यदि प्रत्येक गाँव में 2-3 छोटी इकाइयाँ लग जाएँ, तो दर्जनों युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकता है। सरकार की नीतियों में भारी सब्सिडी और मात्र एक रुपए में जमीन का प्रावधान है, जिसका लाभ सीधे जमीन पर पहुँचना चाहिए। इसके साथ ही, मनरेगा जैसी योजनाओं को सिर्फ गड्ढे खोदने तक सीमित न रखकर इसे 200 दिनों तक बढ़ाया जाना चाहिए और इससे स्थायी सम्पत्तियाँ, जैसे तालाब और नहरें बनानी चाहिए। जब गाँव का पानी गाँव में रुकेगा, तभी किसान की फसल लहलहाएगी और उसे बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

जो भाई पहले ही पलायन कर चुके हैं, उनके लिए विशेष पुनर्वास योजना लाकर उन्हें डेयरी या छोटे व्यवसाय के लिए आर्थिक मदद और भारी सब्सिडी देनी चाहिए, ताकि वे सम्मान के साथ अपने वतन लौट सकें। ​गाँवों में स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी पलायन का एक बड़ा कारण है। जब तक हमारे गाँवों में अच्छे स्कूल और अस्पताल नहीं होंगे, लोग बेहतर भविष्य की तलाश में शहर भागते रहेंगे। हमें प्रत्येक ग्राम पंचायत में स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना होगा और जल जीवन मिशन के तहत प्रशिक्षित स्थानीय युवाओं को ही उनके रखरखाव का जिम्मा सौंपना होगा। साथ ही, युवाओं के लिए कौशल विकास केंद्र खोलकर उन्हें कम्प्यूटर, डिजिटल मार्केटिंग और प्लंबिंग जैसे आधुनिक कामों में माहिर बनाना होगा। 

आज के डिजिटल युग में अगर हम भारतनेट के जरिए गाँव-गाँव तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुँचा दें, तो हमारे युवा घर बैठे दुनिया भर की कंपनियों के लिए काम कर सकते हैं। इसके अलावा, किसानों को बिचौलियों से बचाने के लिए ई-नाम जैसी डिजिटल मंडियों और सोलर पंप जैसी योजनाओं पर 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी सुनिश्चित करनी होगी। जब किसान की लागत कम होगी और मुनाफा सीधा उसकी जेब में जाएगा, तब खेती घाटे का सौदा नहीं रहेगी।

कुल मिलाकर देखें, तो हमें प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत हेल्पलाइन और कानूनी सुरक्षा तंत्र बनाना होगा, ताकि शहरों में उनका शोषण न हो। स्थानीय उद्योगों जैसे ईंट भट्टों और स्टोन क्रशरों को भी विनियमित करना जरूरी है, ताकि वहाँ काम करने वाले मजदूरों को उचित मजदूरी और उनके बच्चों को शिक्षा मिल सके। मेरे बुंदेलखंडी भाइयों, पलायन सिर्फ घर छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी पहचान और संस्कृति से दूर जाना है। मेरी रणनीति बहुत स्पष्ट है कि खेत को पानी, हाथ को काम और हर चेहरे पर मुस्कान हो। 

यदि हम इन सुझावों पर पूरी ईमानदारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ अमल करें, तो वह दिन दूर नहीं जब बुंदेलखंड के खाली घरों के ताले खुलेंगे और आँगन में फिर से खुशियों की किलकारियाँ गूँजेंगी। जय हिंद, जय-जय बुंदेलखंड। 

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