# Atul Malikram Blog > Dil se ## Posts - [कब खुलेंगे बुंदेलखंड के घरों में लटके पलायन के जंग लगे ताले?](https://blog.amg24x7.com/2026/08/06/bundelkhand-palayan-sankat/): ​बुंदेलखंड.. यह केवल एक नाम या क्षेत्र नहीं है, यह शौर्य और स्वाभिमान की वह धरती है, जिसने रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों को जन्म दिया। लेकिन, आज जब हम इस माटी की ओर देखते हैं, तो समझ आता है कि वर्तमान में इस वीर धरा की सबसे बड़ी त्रासदी कोई युद्ध नहीं, बल्कि वह खामोश ‘पलायन’ है, जो हमारे गाँवों... - [मेरी व्यथा.. — एक उद्योगपति की अनकही कहानी](https://blog.amg24x7.com/2026/08/04/meri-vyatha-udyogpati-ki-kahani/): दफ्तर की खामोशी बहुत कुछ कहती है। दिनभर की चहल-पहल के बाद जब कुर्सियाँ खाली हो जाती हैं, कंप्यूटर स्क्रीन्स बंद हो जाती हैं और बालकनी में सन्नाटा फैल जाता है, तब एक उद्योगपति का मन अक्सर सवालों से भर जाता है। क्या यह वही सपना है, जिसे कभी शून्य से शुरू किया था? क्या यह वही संस्थान है, जिसे... - [बुंदेलखंड की बदहाली को बदलने का दस सूत्रीय रोडमैप](https://blog.amg24x7.com/2026/08/02/bundelkhand-vikas-roadmap/): बुंदेलखंड की धरती, जो कभी अपनी वीरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात थी, आज गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के अभिशाप से कराह रही है। यहाँ के गाँवों में फैली भुखमरी और अभाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार शायद इस चीख को सुनने में असमर्थ है। नीति आयोग का बहुआयामी... - [पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर 'कार्बन क्रेडिट'](https://blog.amg24x7.com/2026/07/30/carbon-credit-bharat-vikas-avsar/): आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में ‘कार्बन क्रेडिट’ शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन, आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह है क्या? और इसका हमसे क्या संबंध है? सरल शब्दों... - [कहाँ चले नेता जी? — चुनावी मौसम और गायब होते नेताओं पर व्यंग्य](https://blog.amg24x7.com/2026/07/28/kahan-chale-neta-ji-vyangya-lekh/): गाँव के नुक्कड़ से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, एक सवाल हमेशा ट्रेंड करता है, जैसे चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे मुफ्त में ट्रैंड करते हैं- “कहाँ चले नेता जी?” क्योंकि नेता जी तो लुकाछिपी के खेल में व्यस्त हो जाते हैं। जब नेता जी दिख नहीं रहे हों, तब समझ जाइए कि या तो चुनाव बहुत दूर... - [दिग्विजय से शिवराज, कमलनाथ से मोहन यादव तक, ऐसा रहा मध्य प्रदेश का सियासी उठा-पटक](https://blog.amg24x7.com/2026/07/26/madhya-pradesh-ki-rajniti-ka-safar/): मध्य प्रदेश की सियासत का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से जरा जुदा है। 1956 में राज्य के गठन के बाद से इस धरती ने राजनीति के कई रंग देखे हैं। कभी कांग्रेस का एकछत्र राज, तो कभी भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला, लेकिन पिछले तीन दशकों का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहाँ की सत्ता कभी... - [दो दलों के बीच घूमता छत्तीसगढ़ का राजनीतिक चक्रव्यूह](https://blog.amg24x7.com/2026/07/24/chhattisgarh-ki-rajniti-ka-safar/): छत्तीसगढ़ की राजनीति का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से बिल्कुल जुदा है। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक करवटें बदली हैं। यहां के शांत दिखने वाले मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे किसी भी दल... - [मुलायम, मायावती से योगी तक, कैसा रहा दिल्ली की गद्दी का रास्ता तय करने वाले उत्तर प्रदेश की सियासत का अब तक का सफर](https://blog.amg24x7.com/2026/07/22/uttar-pradesh-ki-rajniti-ka-safar/): भारतीय राजनीति में एक कहावत बहुत मशहूर है कि देश के प्रधानमंत्री का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती, क्योंकि 80 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य देश की सत्ता का मुख्य केंद्र रहा है। आजादी के बाद से देश को मिले 15 प्रधानमंत्रियों में से 9 इसी मिट्टी से निकले हैं। लगभग... - [यूपीए का दशक: मनमोहन की मौन सरकार और उपलब्धियों-विवादों की कहानी](https://blog.amg24x7.com/2026/07/20/upa-ka-dashak-manmohan-sarkar-ki-kahani/): भारतीय राजनीति में 2004 से 2014 का दशक एक ऐसा विरोधाभासी और जटिल अध्याय है, जिसका मूल्यांकन एकतरफा नहीं किया जा सकता। एक राजनीतिक रणनीतिकार के चश्मे से देखने पर महसूस होता है कि यह वह ऐतिहासिक दौर था, जब भारत ने इतिहास की सबसे तेज आर्थिक विकास दर दर्ज की और अभूतपूर्व लोक-कल्याणकारी सामाजिक सुधारों की नींव रखी, लेकिन... - [वर्ष 2026 के बाद किस दिशा में जाएगा भारतीय लोकतंत्र का भविष्य](https://blog.amg24x7.com/2026/07/18/2026-ke-baad-bhartiya-loktantra-ka-bhavishya/): भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से भविष्य की राहें पहले से कहीं अधिक जटिल और रोमांचक नजर आ रही हैं। वर्ष 2026 केवल कैलेंडर का एक नया पन्ना नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज है, जो आने वाले दशकों के लिए भारत की लोकतांत्रिक दिशा निर्धारित करेगा। वर्ष 2014 के... - [क्या 2047 तक भारत सच में विश्वगुरु बन पाएगा?](https://blog.amg24x7.com/2026/07/16/2047-viksit-bharat-vishwaguru/): जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफर का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक्की की, कितनी सड़कें बनीं या कितनी गगनचुंबी इमारतें खड़ी... - [अनुप्रिया पटेल की राजनीति और जनसेवा का सफर](https://blog.amg24x7.com/2026/07/14/anupriya-patel-ki-rajniti/): भारतीय राजनीति में कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो अक्सर मंत्रियों को उनके मंत्रालय तक ही सीमित देखा जाता है। लेकिन, केंद्रीय राज्य मंत्री और अपना दल (एस) की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल को उन अपवादों में ही शामिल किया जा सकता है, जो मंत्रालय की जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में भी पहली पंक्ति में खड़ी नजर... - [लंबे कद वाले भारतीय नेताओं की प्रभावशाली पहचान](https://blog.amg24x7.com/2026/07/12/lambe-kad-wale-bharatiya-neta/): भारतीय राजनीति में कद का तात्पर्य सिर्फ शारीरिक ऊँचाई से नहीं होता, राजनेताओं के विचार, फैसले, संघर्ष और जनता के मन में बनी उनकी छवि, उनके कद को असल मायने में बयान करती है। हालाँकि, इसमें भी कोई दो राय नहीं कि जब कोई नेता मंच पर खड़ा होता है, तो उसकी लंबी कद-काठी, सधा हुआ आत्मविश्वास और दमदार उपस्थिति... - [भारत की सबसे शक्तिशाली महिला राजनेताओं की कहानी](https://blog.amg24x7.com/2026/07/10/bharat-ki-shaktishali-mahila-rajneta/): भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता, समावेशिता और निरंतर विकास है। इस लोकतंत्र की आत्मा में महिलाओं का नेतृत्व एक ऐसी सशक्त धारा के रूप में उभरा है, जो न केवल सत्ता के शीर्ष पदों पर काबिज है, बल्कि समाज के हर वर्ग को न्याय, अवसर और सम्मान प्रदान करने में अग्रणी भूमिका भी निभा रही है। आज... - [राजनीति के निर्माता बनें भारत के युवा](https://blog.amg24x7.com/2026/07/08/bharatiya-yuva-aur-rajniti/): वर्ष 2026 के वैश्विक परिदृश्य में, जब दुनिया अमेरिका–चीन के बीच शक्ति-संघर्ष, जलवायु संकट, डिजिटल आधिपत्य और सामाजिक असंतोष के दौर से गुजर रही है, तब भारत का युवा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आज का भारतीय युवा पश्चिम की तकनीकी प्रगति, नवाचार और आर्थिक अवसरों से प्रभावित है, लेकिन उसकी चेतना भारत की सांस्कृतिक जड़ों, सामूहिक सोच और... - [मोदी के बाद बीजेपी का भविष्य क्या होगा?](https://blog.amg24x7.com/2026/07/06/modi-ke-baad-bjp-ka-bhavishya/): भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर को यदि मोदी युग कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में न केवल देश की सत्ता संभाली, बल्कि राजनीति के व्याकरण को ही बदल दिया। गुजरात के वडनगर की साधारण गलियों से निकलकर विश्व पटल पर छा जाने वाले मोदी का सफर संघर्ष और दूरदर्शिता की एक... - [भारतीय राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व की बदलती भूमिका](https://blog.amg24x7.com/2026/07/04/muslim-leadership-in-indian-politics/): भारतीय लोकतंत्र की मूल शक्ति उसकी विविधता, विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, विचारधाराओं और समूहों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संरचना में निहित है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए नेता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आकार देते हैं। इस व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय का योगदान केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि नीति-निर्माण, संगठनात्मक राजनीति, विदेश नीति, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय... - [भारतीय राजनीति में उपनामों की अनोखी परंपरा](https://blog.amg24x7.com/2026/07/02/bharatiya-rajniti-mein-upnamo-ki-parampara/): भारत हो या विश्व का कोई भी देश, राजनीति में राजनेताओं को दिए जाने वाले उपनाम केवल संबोधन के लिए नहीं होते, बल्कि जनता के मन में बसे उनके व्यक्तित्व, योगदान और छवि का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। आज़ादी के पहले या बाद में, यह परंपरा निरंतर चलती रही है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बच्चे प्यार से... - [छोटे कद के बड़े नेताओं ने कैसे रचा इतिहास](https://blog.amg24x7.com/2026/06/30/chhote-kad-ke-bade-neta/): भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ नेतृत्व की ऊँचाई कभी सेंटीमीटर या फीट में नहीं नापी जाती, बल्कि यह जनता के विश्वास की गहराई और दूरदर्शी फैसलों की स्पष्टता से तय होती है। आज सोशल मीडिया के दौर में जहाँ नेता की मंचीय उपस्थिति, बॉडी लैंग्वेज और शारीरिक हाइट को बहुत महत्व दिया जाता है, वहाँ... - [दिव्यांगता को ताकत बनाकर राजनीति बदलने वाले नेता](https://blog.amg24x7.com/2026/06/28/divyangta-ko-taqat-banakar-rajniti/): भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ नेतृत्व कभी शारीरिक क्षमता या रंग-रूप से नहीं नापा जाता, बल्कि जनता के विश्वास और संघर्ष की भावना के साथ दूरदर्शी सोच से तय होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे अनेक और महान नेता हुए हैं, जो नेत्रहीनता, पैरालिसिस या अन्य गंभीर शारीरिक स्थितियों का सामना करते हुए... - [क्या नीतीश कुमार होंगे देश के अगले राष्ट्रपति?](https://blog.amg24x7.com/2026/06/26/nitish-kumar-agle-rashtrapati/): भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहाँ सत्ता के शीर्ष पर होने वाली नियुक्तियाँ केवल योग्यता का पैमाना नहीं होतीं, बल्कि वे भविष्य के दशकों की राजनीति तय करने वाले सुनियोजित समीकरण होते हैं। वर्ष 2027 में वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल पूर्ण होने जा रहा है। जैसे-जैसे यह समय निकट आ रहा है, दिल्ली के सियासी... - [तेल के लिए रावण जैसा हरण या वैश्विक रणनीति?](https://blog.amg24x7.com/2026/06/24/tel-ke-liye-ravan-jaisa-haran/): वैश्विक राजनीति में एक नया, बेहद विवादास्पद तथा इतिहास बनाने वाला अध्याय जुड़ गया है। 3 जनवरी, 2026 की रात अमेरिका ने दक्षिण अमेरिकी देश वेनेज़ुएला की राजधानी कराकास पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया और मात्र आधे घंटे के भीतर वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया। इस ऑपरेशन ने दुनिया... - [जेन-ज़ी की सियासी भाषा को कैसे समझें दल?](https://blog.amg24x7.com/2026/06/22/gen-z-ki-siyasi-bhasha/): भारतीय गणराज्य की सबसे निर्णायक ताकत उसकी युवा आबादी में है। 18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के करोड़ों युवा वोटर आज चुनावी नतीजों का सबसे बड़ा, सबसे प्रभावशाली तथा सबसे परिवर्तनकारी फैक्टर बन चुके हैं। जेन-ज़ी की यह नई, ऊर्जावान, जागरूक तथा महत्वाकांक्षी पीढ़ी पुरानी राजनीतिक भाषा, पुरानी शैली, पुरानी रणनीतियों तथा पुरानी सोच से पूरी तरह अलग,... - [कैसे झारखंड की राजनीति की धुरी बना सोरेन परिवार](https://blog.amg24x7.com/2026/06/20/soren-parivar-ki-rajniti-jharkhand/): 15 नवंबर, 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में झारखंड का उदय महज़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सदियों पुराने आदिवासी संघर्ष और अस्मिता नई जान मिलने जैसा था। तत्कालीन बिहार के 18 जिलों को काटकर बने इस खनिज समृद्ध राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा से... - [इंदिरा से राहुल तक कितनी बदल गई कांग्रेस](https://blog.amg24x7.com/2026/06/18/congress-ka-badalta-rajnitik-safar/): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास केवल एक राजनीतिक दल की यात्रा नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और उसकी लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने तक, कांग्रेस देश की राजनीति की धुरी बनी रही। आजादी के बाद के शुरुआती दशकों को यदि कांग्रेस का स्वर्णिम कालखंड कहा जाए, तो... - [राजनीतिक पुनरुत्थान की रणनीति के सात सूत्र](https://blog.amg24x7.com/2026/06/16/political-revival-strategy-india/): भारतीय लोकतंत्र में कोई भी हार अंतिम नहीं होती। यहाँ जनता किसी दल को हमेशा के लिए खारिज नहीं करती, बल्कि समय-समय पर उसे आईना दिखाती है। इतिहास गवाह है कि जो दल इस आईने में खुद को ईमानदारी से देख लेता है, वही दोबारा सत्ता के शिखर तक पहुँचता है। कांग्रेस की 1980 की वापसी हो, तृणमूल कांग्रेस का... - [मंडल बनाम कमंडल: भारतीय राजनीति का निर्णायक दौर](https://blog.amg24x7.com/2026/06/14/mandal-vs-kamandal-politics-india/): भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ दशक ऐसे रहे हैं, जिन्होंने आने वाली सदियों की दिशा तय की है। 1990 का दशक भी ऐसा ही एक प्रस्थान बिंदु था। यदि हमें समकालीन भारत की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट को समझना है, तो हमें दो शब्दों की गहराई में उतरना होगा, मंडल और कमंडल। यह केवल दो विचारधाराओं का टकराव नहीं... - [संघर्ष से सत्ता तक भाजपा के उदय की कहानी](https://blog.amg24x7.com/2026/06/12/jansangh-se-bjp-ka-safar/): भारतीय राजनीति के पन्नों में भारतीय जनता पार्टी का उदय यूँ तो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, लेकिन इसके पीछे दशकों का पसीना और वैचारिक तपस्या है। आज जो पार्टी दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में खड़ी है, उसकी नींव संघर्षों की ऐसी ठोस जमीन पर रखी गई थी, जहाँ जीत की उम्मीद कम और... - [क्या कम हो रही है पीएम मोदी की लोकप्रियता?](https://blog.amg24x7.com/2026/06/10/pm-modi-ki-kam-hoti-lokpriyata/): हमने पिछले डेढ़ दशक के दौरान भारतीय राजनीति को कई परिदृश्यों में बदलते देखा है। कैसे कुछ बेहतर सोशल मीडिया कैंपेन्स के दम पर एक राज्य तक सीमित राजनेता राष्ट्रीय चेहरा बन गया और सत्ता के केंद्र में स्थापित हो गया। जाहिर है, बात पीएम मोदी की हो रही है, जिन्होंने लगातार तीन बार न केवल देश का प्रधानमंत्री बनने... - [क्या 2047 तक भारत सच में विश्वगुरु बन पाएगा?](https://blog.amg24x7.com/2026/06/08/vikasit-bharat-2047-vishwaguru-rajniti/): जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफर का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक्की की, कितनी सड़कें बनीं या कितनी गगनचुंबी इमारतें खड़ी... - [क्लाइमेट चेंज और ग्रीन राजनीति की नई रणनीति](https://blog.amg24x7.com/2026/06/06/green-rajniti-aur-climate-change/): भारतीय राजनीति में चुनावी मुद्दे समय के साथ बदलते रहे हैं। कभी विकास, कभी महँगाई, कभी रोजगार तो कभी सुरक्षा जैसे मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहे हैं। लेकिन, अब राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे केवल वैश्विक बहस तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे आम नागरिक के जीवन,... - [भारी-भरकम कद-काठी वाले मशहूर भारतीय नेता](https://blog.amg24x7.com/2026/06/04/bhari-bharkam-bhartiya-rajneta/): भारतीय राजनीति एक ऐसा जीवंत और विशाल रंगमंच है, जहाँ नेता का व्यक्तित्व हर कोण से परखा जाता है। यहाँ कद-काठी का अर्थ केवल शारीरिक वजन या भारी-भरकम बनावट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह विश्वसनीयता और जनता के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है। भारतीय लोकतंत्र की गौरवशाली परंपरा में ऐसे कई कद्दावर नेता हुए, जिनकी मजबूत... - [भारत के सबसे वरिष्ठ और सक्रिय राजनेता](https://blog.amg24x7.com/2026/06/02/bharat-ke-varishth-aur-sakriya-rajneta/): भारतीय राजनीति में अनुभव और आयु का कुछ ऐसा समन्वय देखने को मिलता है, जहाँ राजनीतिक कद या प्रभाव केवल चुनावी सफलताओं तक सीमित नहीं रहता बल्कि समय और उम्र के साथ धीरे-धीरे गढ़ा जाता है। दशकों के अथक और जटिल संघर्ष के बाद एक नेता वरिष्ठ नेता की श्रेणी में आता है। भारतीय लोकतंत्र के समृद्ध और प्रेरणादायक सफर... - [2047 का भारत और सिमटती सफेद पट्टी की चेतावनी](https://blog.amg24x7.com/2026/05/31/2047-ka-bharat-safed-patti-chetavni/): भारत जब 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विकास का गहन आत्ममंथन भी कर रहा होगा। 2047 कोई दूर की तारीख नहीं, बल्कि वह दर्पण है, जिसमें आज की प्रवृत्तियाँ, जैसे हमारी भाषा, हमारे राजनीतिक निर्णय और हमारे सामाजिक व्यवहार,... - [77वें गणतंत्र दिवस के बाद संविधान पर पुनर्विचार](https://blog.amg24x7.com/2026/05/29/samvidhanik-adhikar-aur-nagrik-jimmedari/): वर्ष 2026 में देश ने अपना 77वाँ गणतंत्र दिवस मनाया। परेड, सांस्कृतिक झांकियाँ, राष्ट्रपति का संबोधन और राष्ट्रगान की गूँज, ये सभी दृश्य एक बार फिर हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा बने। हर वर्ष की तरह इस बार भी 26 जनवरी ने हमें गर्व का अनुभव कराया, लेकिन गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं होता। यह वह अवसर होता... - [1977 से 2026 तक भारत की राजनीति कैसे बदली](https://blog.amg24x7.com/2026/05/27/bharat-ki-rajniti-me-badalav-1977-2026/): जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसे आने वाले पाँच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के रूप में देश को पहला... - [सपनों से दूर करती यह कैसी पढ़ाई.......](https://blog.amg24x7.com/2026/03/25/education-skills-gap-india-youth-employment/): किताबी ज्ञान तक सीमित हमारी शिक्षा नीति और इंडस्ट्री के लिए जरुरी कौशल के बीच की खाई भारत के हलचल और महत्वाकांक्षाओं से भरे एक शहर में, आन्या रहती है। आन्या 20-22 साल की एक होनहार बालिका है, जिसने हाल ही में अपना ग्रेजुएशन पूरा किया है। ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद अब वह एक अच्छी-सी नौकरी चाहती है। पढ़ाई... - [छात्र उपस्थित, शिक्षक अनुपस्थित](https://blog.amg24x7.com/2026/03/25/students-present-teachers-absent-india-education-crisis/): ‘बिना शिक्षक के कक्षा’, यह कुछ ऐसा है, जैसे बिना हवा और पानी के हमारी पृथ्वी नई अटेंडेंस: बच्चे! प्रेज़ेंट टीचर.. टीचर! एब्सेंट बच्चों.. बिना शिक्षक के शिक्षा.. कितना अजीब लग रहा है न यह पढ़कर? ज़रा कल्पना करके देखिए एक ऐसे गुरुकुल की, जिसमें कोई गुरु ही न हो और फिर भी शिष्य उस गुरुकुल में शिक्षा या कोई... - [यह इत्र सबसे महँगा](https://blog.amg24x7.com/2026/03/24/most-expensive-perfume-is-education/): फूलों का स्वभाव होता है खुद के साथ ही साथ अपने आसपास के वातावरण को भी महकाना और अपनी महक से सराबोर कर देना हर उस शख्स को, जिसने इसे छुआ है। फूलों से बने इत्र में खूबियाँ और भी बढ़ जाती हैं। बात महक की चली है, तो इसी पर आगे बढ़ते हैं। क्या महक का नाता सिर्फ फूलों... - [बचपन के भी दो चेहरे](https://blog.amg24x7.com/2026/03/24/two-faces-of-childhood-in-india/): बचपन के भी दो चेहरे हैं.. यह तथ्य आपको तब सत्य होता दिखाई देगा, जब आप खुद के आवरण से बाहर आएँगे, और अपने आस-पास के लोगों पर भी ध्यान देंगे.. हमारे देश की चहल-पहल भरी सड़कों पर बच्चों की अलग ही दुनिया हमें देखने को मिलती है.. लेकिन, उन मासूमों के जीवन में जो प्रतिकूल स्थितियाँ देखने को मिलती... - [हर निवाले की बचत जरुरी....](https://blog.amg24x7.com/2026/03/23/%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%a4-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80/): “भोजन का सही सम्मान उसकी बर्बादी न करके और उसे प्रेम से ग्रहण करके किया जाता है।” भूख हमारे देश की एक बड़ी समस्या है, जिससे आजादी के 78 सालों बाद भी हम पूरी तरह निजात नहीं पा सके हैं। हमारे देश में रोज करीब 20 करोड़ लोग भूखे सोने को मजबूर हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, हर दिन... - [मौन पीड़ाओं की नज़रअंदाजी..](https://blog.amg24x7.com/2026/03/23/silent-hunger-and-poverty-in-india/): हमारे शहरों की हलचल भरी सड़कों पर, हॉर्न बजाती कारों के शोर और भागदौड़ के बीच, हम अक्सर ऐसे लोगों की खामोश चीखें सुनते हैं, जो हर दिन जीवन के लिए संघर्ष करते हैं। कभी रास्तों पर हमें बुजुर्ग पुरुष और महिलाएँ, कमजोर और समय से थके हुए, हाथ फैलाकर बैठे मिलते हैं। कभी खोखली आँखों वाले बच्चे, अपने छोटे-छोटे... - [बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख](https://blog.amg24x7.com/2026/03/22/childhood-inequality-poor-children-india/): बचपन जीवन का सबसे खूबसूरत दौर होता है। बचपन के वो खेल-खिलौने, वो यार-दोस्त ही तो जीवनभर की मीठी याद बन जाते हैं, जो जीवन के कठिन दौर में भी कभी याद आ जाए, तो मन को थोड़ा सुकून और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान दे जाती है। लेकिन, बचपन की मासूमियत और उसकी मिठास का एहसास हर किसी के नसीब... - [एक अनदेखा संकट….](https://blog.amg24x7.com/2026/03/22/child-malnutrition-hidden-crisis-india/): हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ का हर कोना खान-पान की एक संपन्न विरासत लिए हुए है। एक ऐसा देश, जहाँ कहीं आपको मसालों की सुगंध मिलेगी, तो कही हवाओं में मिठास घुली होगी। अलग-अलग कोने में अलग-अलग जायका मिलेगा। यह खान-पान तो हमारी पहचान है, लेकिन खाने के शौकीन इस देश की एक सच्चाई और है, जहाँ... - [इंसानियत की समझ से परे टीस भूख की](https://blog.amg24x7.com/2026/03/21/hunger-beyond-humans-animal-bird-hunger-india/): भूख और भुखमरी ये ऐसे मुद्दे हैं, जो हमें हमारी इंसानियत की गहराइयों में झाँकने पर मजबूर करते हैं। जब हमारा अपना बच्चा भूखा सोता है, तो हमारी आत्मा भीतर तक कचोट जाती है। दया बेशक हमें सिर्फ अपने लोगों पर ही आती है। कुछ स्थितियों में बाहर किसी व्यक्ति को देखकर भी आ ही जाती है, लेकिन हम में... - [डस्टबिन खा रहा लोगों का खाना](https://blog.amg24x7.com/2026/03/21/dustbin-eating-food-while-children-starve-india/): कल दोपहर मैं एक होटल में खाना खाने गया था। मेरी टेबल के पास बैठे कुछ लोग दिखाई दिए, जिन्होंने बहुत सारा खाना मंगवाया था। लेकिन जब वे लोग होटल से गए, तो उनकी प्लेटों में ढेर सारा खाना बचा हुआ था। मेरा दिल बड़ा दुखा, जब मैंने देखा कि वेटर बिना सोचे-समझे उस सारे खाने को कूड़ेदान में फेंक... - [भूख की चीख](https://blog.amg24x7.com/2026/03/20/hunger-cry-poverty-india/): पेट से निकली हुई बेबाक भूख की चीख कानों से सुनाई नहीं, बल्कि दिखाई देती है आँखों से भूख से जिस समय पेट बिलखता है, उस स्थिति में दुनिया की कोई भी बात ज़हन में नहीं आती। बात बहुत बड़ी है, जरुरत है, पेट की इस गुहार को सुनने की और इसे महसूस करने की। उस पेट में उठती दलील,... - [खून को पसीने के रूप में बहाता है किसान, तब जाकर आप तक पहुँचता है अन्न](https://blog.amg24x7.com/2026/03/20/farmer-hardwork-food-wastage-india/): “खून को पसीने के रूप में बहाता है किसान, तब जाकर आप तक पहुँचता है अन्न” यह वाक्यांश सटीक रूप से इस तथ्य को उजागर करता है कि किसानों का श्रम और संघर्ष ही हमारे जीवन का आधार है। यदि वे मेहनत और हमारी फिक्र करना बंद कर दें, तो मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि हम चंद ही... - [मजबूरियों में दम तोड़ता बचपन....](https://blog.amg24x7.com/2026/03/19/child-labour-dying-childhood-india/): एक सर्द सुबह बस स्टेशन पर बैठा मैं अपनी बस का इंतज़ार कर रहा था। तभी दो छोटे बच्चे मेरे पास आए। उनकी मासूम आँखों में थकान और समस्याओं से जूझते बचपन की कहानी साफ झलक रही थी। उनके नन्हें हाथों में पेन के कुछ पैकेट थे। वे मेरे पास आए और मुझसे पेन खरीदने की गुजारिश करने लगे। उनकी... - [गरीबी: स्थिति या मानसिक सोच?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/19/poverty-is-a-mental-mindset-india/): गरीबी, हमारे देश में एक ऐसी समस्या है, जिसे खत्म करने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किए गए। इसके लिए हर प्रकार की योजनाएँ, कार्यक्रम और अभियान चलाए गए, फिर भी इस समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सका। इसका एक कारण यह है कि इस समस्या को केवल एक आर्थिक स्थिति मानकर ही इसका हल खोजा जाता रहा, जबकि... - [गरीबी और अशिक्षा का भंवर](https://blog.amg24x7.com/2026/03/18/poverty-and-illiteracy-cycle-in-india/): विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भी आज देश में आन्तरिक तौर पर देखा जाए, तो हजारों समस्याएँ देखने को मिल जाएँगी। कहने को तो हम आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुके हैं, लेकिन आज भी देश में करीब 53 करोड़ लोग गरीबी और अभाव का जीवन जी रहे हैं, आज देश में जितने... - [मजाल है कि टस से मस हो जाए गरीबी](https://blog.amg24x7.com/2026/03/18/india-poverty-reality-and-government-schemes/): ‘भारत में गरीबी’ एक ऐसा विषय है, जिस पर आज भी बात की जाती है। यह सोचने वाली बात है कि दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करने के बाद भी हम गरीब देशों की रेस से बाहर नहीं आ पा रहे हैं, या फिर यूँ कह लें कि इस तराजू में बैठना हमें इतना भा रहा है कि अब... - [गरीब का सामना संघर्ष से ही क्यों?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/17/poor-struggle-rural-india/): कल्पना कीजिए एक माँ की, जो एक छोटे-से गाँव में रहती है। दिन भर की भागदौड़ से हुई थकान की वजह से सुबह उठने में कहीं देर न हो जाए, इस वजह से सारी रात खिड़की की संद से रोशनी के आने के इंतज़ार में बिता देती है। हर दिन तड़के उठकर, उसकी पहली चिंता होती है अपने परिवार के... - [तमाम तथ्यों में से सत्य माना किसे जाए?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/17/poverty-data-truth-india/): इंटरनेट पर गरीबी की खबरों और इससे जुड़े आँकड़ों की बाढ़ आई पड़ी है। कुछ खबरें दावा करती हैं कि भारत से गरीबी बीते कुछ सालों या दशकों में अच्छी खासी मात्रा में कम हुई है, जबकि कुछ खबरें लम्बे-चौड़े आँकड़ों के साथ इस बात की पुष्टि करती हैं कि देश से भुखमरी गुड़ पर मक्खी की तरह चिपकी बैठी... - [माथे पर मक्कारी का ठप्पा लगातीं सरकारी योजनाएँ](https://blog.amg24x7.com/2026/03/16/free-government-schemes-laziness/): मदद एक हद तक ही अच्छी लगती है, यदि बार-बार और लगातार मदद मिलती रहे, तो मदद लेने वाला व्यक्ति इसका आदी बन जाता है। उसमें काम करने की लगन का गला तो घुटने लगता ही है, साथ ही साथ मक्कारी का ठप्पा भी उस व्यक्ति के माथे पर लग जाता है। भारत सरकार जरूरतमंदों को राहत देने के उद्देश्य... - [अज्ञानी पर ही सदा, करे गरीबी वार.....](https://blog.amg24x7.com/2026/03/16/agyaani-par-hi-sada-gareebi-war/): क्या आपने कभी सोचा है बचपन में हमें अ से ज्ञ ही क्यों सिखाया गया, ज्ञ को पहले अ को बाद में क्यों नहीं सिखाया गया? दरअसल अ से ज्ञ तक पढ़ना, अज्ञान से ज्ञानी बनाने तक का पूरा सफर है। इस बात को समझने में लोगों की पूरी उम्र निकल जाती है और कई बार उम्र निकलने के बाद... - [पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं.......](https://blog.amg24x7.com/2026/03/15/paradheen-sapnehu-sukh-nahi/): रामचरित मानस की यह चौपाई बताती है कि किसी के अधीन रहना कितना बड़ा अभिशाप होता है। हमारे धर्मिक ग्रन्थ हमें बहुत सी ऐसी बातें बताते हैं, जिन्हें स्वयं अनुभव करना कोई नहीं चाहेगा। उन्हीं में से एक है, पराधीनता…. हर कोई स्वतंत्रता चाहता है फिर चाहे वह इंसान हो या पशु-पक्षी। बात जब पशु-पक्षी की चली है, तो मैं... - [दान-पुण्य के झूठे ढकोसलें](https://blog.amg24x7.com/2026/03/15/parents-care-vs-fake-daan-punya/): संसार का यह नियम है, जो इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन अपना जीवन काल पूरा करके मृत्यु को प्राप्त करना ही है। लगभग सभी धर्मों की यह मान्यता है कि किसी के मरने के बाद उसके लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस व्यक्ति के मरने के बाद न जाने कितनी ही वस्तुओं का दान किया... - [बेरोजगारी की गर्त में जा रहे हैं युवा, तो फिर सरकारी नौकरियाँ कौन ले रहा..??](https://blog.amg24x7.com/2026/03/14/youth-unemployment-and-government-jobs-reality/): सरकार तो पर्याप्त नौकरियाँ दे रही है, लेकिन आज के युवा उन नौकरियों को पाने के लिए बनाए गए मापदंडों को पार कर पाने में सक्षम ही नहीं हैं बेरोजगारी एक ऐसा विषय बन गया है, जिसकी चर्चा बरसों से ज्यों की त्यों बनी रहती है, कम होने के बजाए उल्टा यह दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जाती है। आज के... - [अपना दाम खोटा, परखैया का क्या दोष..?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/14/modern-lifestyle-causing-diseases-in-india/): पहले के ज़माने में लोग ‘पहला सुख निरोगी काया’ को मानते थे। पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद शाम को चौपाल पर बैठकर किस्से-कहानियाँ सुनाया करते थे। उस समय मोबाइल और टीवी नाम के दानव नहीं हुआ करते थे। इसलिए लोग अपना समय बातों-बातों में बड़ी-बड़ी सीख देने वालीं ज्ञान की बातें एक-दूसरे से साझा किया करते थे। वह भी... - [क्या हम लौटने लगे हैं अपनी जड़ों की ओर?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/13/india-returning-to-ancient-culture-and-gurukul-system/): हर दिन के नियम की तरह कल शाम जब मैं मंदिर गया, तो कुछ लेट हो गया। तब तक आरती का समय हो चला था, तो मैं वहीं रुक गया। आरती के लिए जैसे ही शंख बजा, मंदिर में मौजूद सभी लोग एक जगह जमा हो गए। और फिर शंख और घंटी की मधुर आवाज के साथ आरती शुरू हुई।... - [इस बार चलते हैं उल्टी सैर पर..](https://blog.amg24x7.com/2026/03/13/reverse-walk-into-old-indian-life-and-relationships/): समय के पहिए के घूमने के साथ रहन-सहन के तरीके, परम्पराओं, अन्य तौर-तरीकों और यहाँ तक कि लोगों की विचारधाराओं में भी बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं। बड़े दिनों बाद कल एक परिचित के यहाँ शादी में जाना हुआ, तब मैंने यह बात गौर की, कि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है.. बड़ा ही शानदार माहौल था।... - [गरीबी का ब्रांड](https://blog.amg24x7.com/2026/03/12/brand-of-poverty-untold-stories-of-street-artisans/): ब्रांड वह शब्द है, जिसने दुनियाभर में तहलका मचा रखा है। यह सिर्फ एक लेबल नहीं है; यह एक धारणा है, जो हमारे विचारों को प्रभावित करती है। आज की दुनिया में हर कोई ब्रांडेड सामान की तलाश में रहता है। चाहे वह कपड़ा, खाना, इलेक्ट्रॉनिक्स या कोई अन्य दैनिक आवश्यकता की चीज़ हो, हर चीज़ को खरीदने से पहले... - [मेरा काम ही मेरी पहचान है....](https://blog.amg24x7.com/2026/03/12/my-work-my-identity-street-food-story/): एक शाम मैं अपने घर की बालकनी में अपने कुछ मित्रों के साथ बैठा था कि अचानक तेज बारिश आ गई। सुहावनी शाम और तेज बारिश में याद आई गरमा-गर्म चाय और पकौड़ों की.. बात जब पकौड़ों की चली, तो हर कोई शहर में सबसे स्वादिष्ट पकौड़े कहाँ मिलते हैं, इस पर अपनी राय परोसने लगा.. कोई कहता कि पकौड़े... - [लोगों का भला भी करते चलें..](https://blog.amg24x7.com/2026/03/11/people-welfare-true-richness-humanity-story/): जीवन की आपाधापी में ऐसे न जाने कितने ही काम हैं, जो बेशक हमें जिम्मेदारी के साथ करने होते हैं, लेकिन हमारी शान-ओ-शौकत के नीचे कुचलकर वे दम तोड़ देते हैं.. आलिशान बंगले, महँगी गाड़ियाँ, संभाले न संभले ऐसी धन-दौलत, नाम, रुतबा और भी न जाने कितने ही भारी-भरकम शब्द घोंट देते हैं गला उन लोगों का, जिनके जीवन के... - [कठिनाइयों के बीच खड़ी उम्मीद……](https://blog.amg24x7.com/2026/03/11/indian-street-vendors-struggle-and-hope/): शहर की हलचल भरी सड़कों पर, हॉर्न बजाते शोर और तेज़ कदमों की आवाज़ के बीच, हमारे दैनिक जीवन के गुमनाम नायक मौजूद होते हैं। ये लोग, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है और कम ही सराहा जाता है, हमारे शहरी जीवन के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। फिर भी, उनकी चुनौतियों और बाधाओं से भरी यात्रा पर शायद ही कभी... - [चंद रुपयों का सौदा....](https://blog.amg24x7.com/2026/03/10/bargaining-with-street-vendors-india/): आजकल की दिखावे की दुनिया में यह देखना वाकई निराशाजनक है कि मानव स्वभाव कितना उथला हो सकता है। हम अक्सर वास्तविक मायने रखने वाली चीजों के बजाए चमक-दमक वाली चीजों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। दिखावे का यह जुनून हमारे समाज की प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह दर्शाता है कि हम अक्सर इस बात... - [एक प्यारी-सी जिद...](https://blog.amg24x7.com/2026/03/10/childhood-innocent-demands-street-vendors-india/): बचपन की वो सुनहरी यादें.. याद है जब हम अपनी छोटी-छोटी जिदें पूरी करने के लिए बड़ों से रूठ जाया करते थे। कभी गुलाबी रंग का गुब्बारा चाहिए, तो कभी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। घुँघरू वाले झुनझुने की खनक या फिर मुँह में मिठास घोलते गुलाबी-गुलाबी गुड़िया के बाल.. इन छोटी-छोटी चीज़ों के लिए की गई हमारी जिद, हमारे बचपन की उन... - [समाज पानी तो फिल्टर कर पीता है लेकिन खून नहीं](https://blog.amg24x7.com/2026/03/10/society-view-on-prisoners-india/): कैदियों के प्रति समाज का नज़रिया अपराधी या पीड़ित के बीच नहीं बंटा हुआ है। यह एक कटु सत्य है कि समाज के लिए एक कैदी सिर्फ अपराधी हो सकता है पीड़ित नहीं। यही सोच समाज पर भारी पड़ रही है और न केवल अपराध बल्कि अपराधियों को भी जन्म दे रही है। भारतीय समाज में कैदियों के प्रति नज़रिया... - [बिना सज़ा के ही सज़ा काट रहे हैं विचाराधीन कैदी..](https://blog.amg24x7.com/2026/03/09/undertrial-prisoners-india-justice-crisis/): भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ हर किसी को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है। भारत के संविधान और न्यायपालिका का भी यही मानना है कि भले ही कोई अपराधी सज़ा पाने से बच जाए, लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा न हो। लेकिन, विडंबना यह है कि इस लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना... - [अब जरुरत, जेलों को बनाया जाए](https://blog.amg24x7.com/2026/03/09/prison-reform-not-crime-factory/): बिगाड़गृह से सुधारगृह आज की जेलें: सुधारगृह या बिगाड़गृह? प्राचीन समय में किसी अपराधी के लिए कारावास की सज़ा को जरुरी माना जाता था। उसके पीछे तर्क यह था कि कैदियों को एकांत कारावास में रखने से उन्हें आत्म-मंथन का मौका मिले, जिससे अपराधियों में सुधार आए। हिंदू और मुगल शासन के दौरान, अपराधियों को कड़ी निगरानी में रखा जाता... - [एक गुनाह की कितनी सज़ा?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/08/prison-not-reform-house-india/): समाज की दिखावटी सुविधाओं की ऊँची-ऊँची दीवारों के पीछे, दर्द और पीड़ा की एक छिपी हुई दुनिया है। यह दुनिया है जेल के कैदियों की, जो एक गलती के लिए सज़ा के अंतहीन चक्र में फंसे हुए हैं। समाज के मायने में एक अपराध के लिए एक ही सज़ा होती है। हमें भी बस इतना ही दिखता है कि किसी... - [जिंदगियों को खत्म करता अपराध का जाल..](https://blog.amg24x7.com/2026/03/08/indian-prisons-crime-cycle-reality/): उभरते हुए भारत की एक अनदेखी वास्तविकता है भारतीय जेलों की दमनकारी दुनिया…. जेलों की शुरुआत करने का मूल उद्देश्य सुधार और पुनर्वास करना था, लेकिन दुःखद रूप से यह अपराध को जन्म देने वाले केंद्र में तब्दील हो चुकी हैं। ऊँची-ऊँची दीवारों के भीतर की परिस्थितियाँ न केवल आपराधिक व्यवहार को कायम रखती हैं, बल्कि लोगों को अपराध के... - [समाज के लिए नुकसानदेह 50 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों के पुनर्वास और कल्याण की नज़रअंदाजगी](https://blog.amg24x7.com/2026/03/07/rehabilitation-of-elderly-prisoners-in-india/): एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार भारतीय जेलों में 50 वर्ष से अधिक उम्र के 73 हजार से ज्यादा कैदी हैं। ऐसे कैदियों की स्थिति और उनकी रिहाई के बाद का जीवन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर जेल प्रशासन और केंद्र सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आज के समय में, जब भारत सामाजिक न्याय और समावेशी विकास... - [क्या सच में पढ़ाई से ज्यादा जरुरी है शादी?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/07/education-vs-costly-wedding-india/): कुछ समय पहले गुजरात के जामनगर में हुए एक भव्य आयोजन की चर्चा आपने जरूर सुनी होगी। देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी के बेटे की प्री-वेडिंग सेरेमनी थी। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस तीन दिवसीय भव्य आयोजन पर करीब 1200 करोड़ रुपए खर्च हुए। हमारे देश में अक्सर ऐसी खबरें सुनने में आती हैं कि फलाने की शादी... - [जेल: एक अनकही यूनिवर्सिटी में बुलंद होते](https://blog.amg24x7.com/2026/03/06/prison-university-of-criminals/): नामी क्रिमिनल्स के हौंसले जेल एक अनोखी यूनिवर्सिटी है। जेल एक कैदी को इतना सिखा देती है कि हम और आप उस बारे में सोच भी नहीं सकते। अगर यूँ कहा जाए कि जेल, जिंदगी की भूख बढ़ा देती है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। आप हर एक चीज़ के लिए भूखे होते हैं। आईपीएस दिनेश एमएन, जिन्होंने... - [कैदी के गुनाहों का दोषी कौन?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/06/child-crime-responsibility-parents/): गलती हर इंसान से होती है, बचपन में गलती करने पर बच्चे को बेशक एहसास नहीं होता कि उसने आखिर किया क्या है, लेकिन गाल पर लगा जोरदार तमाचा इतना डर तो बैठा ही जाता है कि यह काम दोबारा नहीं करना है, क्योंकि यदि किया, तो फिर से मार घल जाएगी। मेरी नज़रों में सुधार के लिए मारी गई... - [दूसरा मौका सभी के लिए महत्वपूर्ण](https://blog.amg24x7.com/2026/03/06/guru-shishya-education-system/): कितना अच्छा लगता है न, जब एक बार असफल होने के बाद, सफलता पाने के लिए दूसरा मौका मिल जाए। व्यक्ति हमेशा अपने अनुभव से कुछ न कुछ सीखता रहता है। मैंने अक्सर देखा है कि कहीं भी हमें यदि दूसरा मौका मिलता है, तो हम पहले से बेहतर प्रदर्शन करते हैं। मैं यहाँ मेले में खेले जाने वाला निशानेबाजी... - [पाठ्यक्रम के साथ पाठशाला का रास्ता](https://blog.amg24x7.com/2026/03/05/rural-school-infrastructure-india/): सुगम होना भी जरुरी जैसा कि आप सभी जानते हैं, देश की शिक्षा नीति में लगभग 34 वर्ष बाद परिवर्तन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना और शैक्षणिक ढाँचे को मजबूत बनाना है। नई शिक्षा नीति में पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियों और छात्र परिणामों पर विशेष बल दिया गया है, जिससे छात्रों के बीच एकाग्रता, सहयोग... - [महँगी होती शिक्षा की लगातार गिरती गुणवत्ता](https://blog.amg24x7.com/2026/03/05/costly-education-falling-quality/): अब न तो पहले जैसी शिक्षा रही है और न ही पहले जैसे शिक्षक एक सुबह मैं ताजी हवा खाने के लिए टहलने निकला था, रोज की तरह ही सड़कों पर पीली स्कूल बसें आती जाती दिखाई पड़ रही थीं। चौराहों पर छोटे-छोटे बच्चे स्कूल की यूनिफॉर्म पहने कँधे पर बड़ा-सा बस्ता टांगे अपनी स्कूल बसों की राह देख रहे... - [लगातार अभ्यास मूर्ख व्यक्ति को](https://blog.amg24x7.com/2026/03/04/power-of-practice-inspiration/): भी बना देता है बुद्धिमान “करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निशान॥” कवि वृंद रचित ”वृंद सतसई” का यह दोहा पुराने समय से ही काफी प्रचलित है, जो बच्चों को स्कूल हो या घर सभी जगह सिखाया जाता है, जिसका अर्थ है कि निरंतर अभ्यास करने से मुर्ख व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है।... - [किताबी ज्ञान के साथ-साथ](https://blog.amg24x7.com/2026/03/04/practical-knowledge-for-students/): व्यावहारिक ज्ञान भी जरुरी.. एक व्यक्ति को तब तक सफल नहीं माना जा सकता, जब तक वह पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ दुनियादारी की समझ न रखे एक बार किसी काम से मेरा बैंक जाना हुआ, बैंक में भीड़ ज्यादा होने के कारण लम्बी लाइन लगी हुई थी। मैं भी लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करने लगा, तभी मेरी... - [गुरु कुम्हार और शिष्य घड़ा](https://blog.amg24x7.com/2026/03/03/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%98%e0%a4%a1%e0%a4%bc-2/): गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥ कबीर के इस दोहे का अर्थ नई पीढ़ियाँ शायद ही जानती हों। गुरु और शिष्य के उदाहरण को हम इस दोहे से बखूबी समझ सकते हैं। जिस प्रकार कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मारकर मटके तथा बर्तनों को गढ़ता है,... - [खोखला बीज भला क्या काम का?](https://blog.amg24x7.com/2026/03/03/hollow-education-system-india/): इंसान की आधारभूत जरूरतों में से पहली जरूरत रोटी होती है, जिसके लिए किसान दिन-रात मेहनत करके फसल उगाता है, लेकिन सिर्फ मेहनत कर देने से अच्छी फसल नहीं उग जाती, इसके लिए जरूरत होती है गुणवत्ता वाले बीज की, क्योंकि जब बीज अच्छा होगा, तभी अच्छी फसल होगी और तब सही मायने में किसान की मेहनत रंग लाएगी। किसी... - [भ्रष्टाचार और पेपर लीक](https://blog.amg24x7.com/2026/03/02/paper-leak-corruption-indian-education/): की आग की लपटों में झुलसते छात्र भारत की शिक्षा प्रणाली एक भयानक तूफान के चपेट में आ बैठी है। एक ऐसा तूफान, जो धूल-मिट्टी के रूप में अपने साथ भ्रष्टाचार और पेपर लीक का बवंडर साथ लिए चल रहा है। एक ऐसा तूफान, जो अनगिनत छात्रों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को निगलता ही चला जा रहा है। इन तमाम... - [शिक्षा व्यवस्थाओं के किए-कराए](https://blog.amg24x7.com/2026/03/02/exam-centric-education-system-crisis-india/): पर पानी फेरने का काम कर रहीं परीक्षाएँ भारत में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा से उठते पेंचीदे सवाल शायद ही कभी खत्म हो सकेंगे। निरंतर आगे बढ़ते देश में शिक्षा का स्तर ऊपर जा रहा है या नीचे? क्या वास्तव में हमारे देश की शिक्षा व्यवस्थाएँ छात्रों के भविष्य को समृद्ध बनाने के काबिल हैं? ऐसे तमाम सवालों का... - ["ओल्ड इज़ गोल्ड" कहावत एकदम खरी](https://blog.amg24x7.com/2026/03/01/old-is-gold-indian-culture-parenting/): आज के समय में देखा जाए तो संस्कार और शिक्षा दोनों ही बदल चुके हैं। प्राचीन समय में लोग अपने बच्चों को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा करते थे, जहाँ वे शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। फिर धीरे-धीरे समय बदला और अंग्रेजी सभ्यता ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को जकड़ लिया।... - [शिक्षक तो पढ़ा रहे हैं,](https://blog.amg24x7.com/2026/03/01/are-children-really-learning-in-india/): लेकिन क्या बच्चे सीख भी रहे हैं? शिक्षा का मतलब कभी-भी किसी खाली पात्र में जल भरने तक ही सीमित नहीं रहा है। महान अर्थशास्त्री तथा नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन एवं अभिजीत बनर्जी भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि किसी भी अन्य की तुलना में शिक्षा एकमात्र ऐसा साधन है, जो जीवन के अवसरों में वृद्धि... - [एक निवाले की कीमत……](https://blog.amg24x7.com/2026/02/28/price-of-a-single-bite-in-india-2/): बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से... - [एक निवाले की कीमत……](https://blog.amg24x7.com/2026/02/28/price-of-a-single-bite-in-india/): बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से... - [नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं](https://blog.amg24x7.com/2026/02/27/poverty-hunger-and-food-wastage-in-india/): तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की यह चौपाई आज के समय को देखते हुए बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ गरीबी से बड़ा कोई दुःख ही नहीं है। आज अमीर और अमीर होता जा रहा, जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है। पहले के समय में लोग कहते थे, दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन आज के समय... - [जानवरों के लिए भोजन निकालने की](https://blog.amg24x7.com/2026/02/27/first-roti-for-cow-last-for-dog/): प्रथा भी अब विलुप्ति की कगार पर भारत की संस्कृति बहुत विराट है। यह हर उस जीव के बारे में सोचती है, जो पृथ्वी पर रहता है। संस्कृति हमारे बारे में ही सोचती है, अफसोस हम संस्कृति के बारे में कभी नहीं सोच सके और शायद कभी सोच भी नहीं सकेंगे। सबसे बड़ी सीखों में से एक हमारी संस्कृति ने... - [क्या हम 'अतिथि देवो भवः' और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का असली अर्थ जान पाए हैं?](https://blog.amg24x7.com/2026/02/26/atithi-devo-bhava-and-vasudhaiva-kutumbakam/): क्या ‘अतिथि देवो भवः’ वाक्यांश में इंसानों की ही बात कही गई है, जानवरों की नहीं? समय के पहिए के घूमने के साथ संस्कृति और परम्पराओं में कई बदलाव देखने को मिले हैं। पहले के समय में घर के दरवाज़े पर कोई याचक आया करता था, तो उसे कभी-भी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता था। अतिथि आया करता था, तो... - [दुनियादारी की होड़ में अब दया भी बिकाऊ](https://blog.amg24x7.com/2026/02/25/compassion-for-sale-social-reality/): दो मासूम.. एक की उम्र लगभग 5 या 6 वर्ष.. और एक की मुश्किल से 1 वर्ष.. शरीर पर आधे-अधूरे कपड़े.. चेहरे पर बेबसी.. आँसूओं से लबालब भीगी हुईं आँखें.. एक नहीं, दोनों की.. कौड़ियों के दाम बिकता बचपन.. भूख की असहनीय पीड़ा.. तड़प रोटी की.. अपनी उम्र से लगभग 50 वर्ष अधिक जी लेने वाला वह 5 वर्षीय बच्चा... - [एक भूखी भूख..](https://blog.amg24x7.com/2026/02/25/hungry-hunger-starving-child-story/): जब भी जोरों की भूख लगती है और खाना बनने में तनिक भी देरी होती है, तो थाली-चम्मच पीटने की आवाज़ से पूरा घर गूँज उठता है, “मम्मी-मम्मी खाना दो..” और फिर क्या, कुछ ही देर में उस थाली में माँ रूपी फरिश्ता गर्म-गर्म खाना परोस देता है और इतना ही नहीं, बड़े ही प्रेम से अपने बच्चों और पूरे... - [थाली से नाली तक का सफर](https://blog.amg24x7.com/2026/02/24/plate-to-drain-food-wastage-india/): शान दिखाना नहीं, बल्कि पेट भरना है भोजन का असली मतलब भारत, एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ किसानों के श्रम और समर्पण से लाखों-करोड़ों लोगों को भर पेट भोजन मिलता है। सही मायने में किसान हमारे देश की रीढ़ हैं, जो अपने खून-पसीने से अपने जीवन के दिन-रात एक करके अन्न उगाते हैं। सिर्फ इसलिए, ताकि हम भूखे न... - [छोटा-सा योगदान भी बड़े मायने रखता है…](https://blog.amg24x7.com/2026/02/24/small-contribution-for-poverty-free-india/): आज सुबह से ही हल्की-हल्की बारिश हो रही है, और हो भी क्यों न बरसात का मौसम जो चल रहा है। यह मौसम अक्सर लोगों को बड़ा पसंद होता है, क्योंकि इस समय धरती हरियाली की चादर ओढ़े, पेड़-पौधों पर आई नई पत्तियाँ खुशी से झूमती हुई, बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। इस लुभावने मौसम और... - [गरीबी या मक्कारी?](https://blog.amg24x7.com/2026/02/23/poverty-or-cunning-free-scheme-mentality/): गरीबी एक ऐसा शब्द है, जो सुनने में जितना साधारण लगता है, वास्तविकता में उतना ही भयावह और गंभीर है। यह एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसने न केवल व्यक्ति विशेष बल्कि पूरे समाज, देश और यहाँ तक की वैश्विक स्तर पर मानवता को जकड़ रखा है। गरीबी को सही मायनों में एक अभिशाप कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति... - [फायदेमंद गरीबी](https://blog.amg24x7.com/2026/02/23/beneficial-poverty-government-schemes-fraud/): एक समय था जब स्वयं को गरीब बताना हीन भावना को जन्म देता था, लेकिन अब स्वयं को गरीब दर्शाना फायदेमंद हो गया है…. स्वतंत्रता के बाद देश में जातिगत भेदभाव और गरीबी से उत्थान के लिए छात्रवृत्ति, अनुदान और विभिन्न योजनाओं इत्यादि के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए सरकार ने विभिन्न योजनाएँ लागू कीं, ताकि पिछड़े... - [आपके मायने में आशियाने की परिभाषा क्या?](https://blog.amg24x7.com/2026/02/22/definition-of-aashiyana-and-urban-poor-housing/): अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता….. शाम का समय, गोधूलि बेला में घर की बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेने का जो आनंद है, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मुश्किल है। मेरा पेड़-पौधों और खुले वातावरण से विशेष लगाव है, इसलिए मैं अक्सर शाम का समय घर की बालकनी में ही बिताता हूँ। एक शाम मैं बालकनी में... ## Pages - [परिचय](https://blog.amg24x7.com/introduction/): अतुल मलिकराम एक भारतीय राजनीतिक रणनीतिकार, पीआर कंसल्टेंट, लेखक और समाजसेवी हैं। मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में जन्में अतुल मलिकराम ने 2006 में पीआर 24×7 की नींव रखी। उनकी मध्य प्रदेश में सिंधिया खेमे के बीजेपी में शामिल होने से लेकर, “छत्तीसगढ़ और राजस्थान” में कांग्रेस के कमान संभालने जैसी संभावनाएं सही सिद्ध हुई हैं। वह फरवरी 2022 में... - [Sample Page](https://blog.amg24x7.com/sample-page/): This is an example page. It’s different from a blog post because it will stay in one place and will show up in your site navigation (in most themes). Most people start with an About page that introduces them to potential site visitors. It might say something like this: Hi there! I’m a bike messenger by day, aspiring actor by... [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)